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दुर्लभ लोक परम्पराओं को सहेजने का समर्पण भाव

13/02/21
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय आदि काल से ही मानव की चेतना का स्रोत रहा है। पावन बद्री.केदार एवम् पुण्यसलिला गंगा.यमुना ने सदियों से मानव मन में प्राणों का स्पन्दन किया है। हिमालय क्षेत्र की लोककला व संस्कृति ने पर्वतवासियों के अभाव भरे जीवन में सत्यनिष्ठा व मोक्षवाद की सोच को आधार प्रदान किया है। आज से हजारों वर्ष पूर्व आदि मानव ने अपनी विकास यात्रा मुक्त प्रकृति की गोद में आरम्भ की। कोई भाषा नहीं थी लेकिन संवेदनशील हृदय अवश्य थाए जो प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ था। वह जलए वायुए अग्निए पृथ्वीए आकाश व दृश्यमय जगत के प्रति श्रद्धा से नत होए उन्हें देवता स्वरूप मानकर उनकी हृदय से पूजा करने लगा। यही परम्परा आज तक चली आ रही है। उसने अपनी आंखों से सृष्टि का सम्पूर्ण सौन्दर्य समेट लिया था। वह उसी सौन्दर्य रस में डूबकर प्रकृतिमय हो गया। दृश्यजगत के मोहक स्वरूप को अपने निर्विकार हृदय में आत्मसात् कर मनुष्य ने ब्रह्माण्ड की रचना के मूल में अविछिन्न रूप से विद्यमान कलाए संगीत नृत्य आदि से परिचय घनिष्ट किया।

हिमालय के पावन शिखरों से फूटते जीवन संगीत को आदियोगी भगवान शंकर के डमरू ने तालबद्ध किया। सदावाहिनी गंगा.यमुना.सरयू.गोमती ने इस जीवन संगीत में रस की धारा प्रवाहित की। बसंत की तूलिका ने फ्यूॅंली.बुरॉंस के असंख्य रंगों से मानव जीवन में रंग भर दिए। प्रकृति के रूप में मौजूद संगीत के असीम स्रोत ने लोकगीतए लोक संगीत व लोक परम्पराओं को जन्म दिया। मनुष्य की विकास यात्रा के साथ ही विविध कलाओं का विकास हुआ और लोक संस्कृति समृद्ध हुई। आज हमारी पुरातन लोक संस्कृति को भौतिकवाद की चुनौती मिल रही है एक तरफ लोकसंस्कृति को पहचान दिलाने वाले लोक वाद्य लोगों से दूर होते जा रहे हैं वहीं उत्तराखंड के दुर्लभ पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों को सहेजने के काम में ग्राम पेटशाल निवासी रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली ने जीवन के बहुमूल्य कई साल लगा दिए। ढोलए नगाड़ाए बिणाईए हुड़काए रणसिंहए नागफनीए भौंकरए अलगोजा जैसे करीब तीन दर्जन लोकवाद्यों को चितई स्थित लोक वाद्य यंत्र संग्रहालय में सहेजने के साथ ही रंगकर्मी पेटशाली ने लोकवाद्यों की जानकारी आम लोगों को देने के मकसद से किताब भी लिखी हैप्रेमगाथा पर आधारित राजूला मालूसाही महाकाव्य बनाने के बाद जयशंकर प्रसाद सम्मान प्राप्त करने वाले राज्य के एकमात्र रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली बताते हैं कि 1980 से पहले तक वह पूरी तरह राजनीतिज्ञ रहेए लेकिन उसके बाद से वह उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने के अभियान में जुटे हैं।
वाद्ययंत्रों के प्रति लगाव या लोकवाद्य यंत्रों को बचाने के लिए उन्होंने 2003 से लोकवाद्यों को सहेजना शुरू कर दिया था। परिणाम स्वरूप आज उनके पास 35 दुर्लभ वाद्ययंत्रों समेत प्रख्यात नृत्य सम्राट उदयशंकर से जुड़ी सामग्री भी संकलित है।यही नहीं उनके पास 1925 से 1930 के रिकॉर्डेड सुरमाली कौतिक लागो मार झपैका जैसे कुमाऊंनी गीत भी संकलित हैं। उनका कहना है कि प्रदेश सरकार लोक वाद्यों और उन्हें बजाने वाले कलाकारों के प्रति संजीदा नहीं है। को जब मुख्यमंत्री चितई पहुंचे थे तो उन्होंने चितई स्थित लोक वाद्य यंत्र संग्रहालय को राज्य संग्रहालय के रूप में पहचान दिलाने का आश्वासन दिया था।साथ ही संस्कृति विभाग को जुगल किशोर पेटशाली की साझीदारी में संग्रहालय का संचालन करने के भी निर्देश दिए थेए लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ है।संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर जी ने पेटशाली में पर्वतीय वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय स्थापित कर रखा है। कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन इनके द्वारा किया गया है।

पहाड़ के गीत.संगीत की वर्तमान स्थिति को देख वह बेहद खिन्न हैं और कहते हैं कि ग्राम्य पृष्ठभूमि में लोक संस्कृति होती है और अब मंचों पर जो कुछ दिखाई.सुनाई दे रहा है अधिकतर वह जानकारी से अनभिज्ञ लोगों का तमाशा है। लोकविधा की जानकारी इन स्टार कलाकारों को नहीं होती है।उनका मानना है कि जब तक सरकारें संस्कृतिए कलाकारों और लोकविधाओं को बचाने में पहल नहीं करेंगी आने वाली पीढ़ी विलुप्त हो रही सांस्कृतिक धरोहरोंए लोककलाओं के बारे में कभी नहीं जान सकेगी। उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर अनूठी है और क्षेत्र के युवाओं को संस्कृति को संजोने में अग्रणी भूमिका निभाने को आगे आना होगा।

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