डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
शिलाजीत एक गाढ़ा भूरे रंग का, चिपचिपा पदार्थ है जो मुख्य रूप से हिमालय की चट्टानों से पाया जाता है। इसका रंग सफेद से लेकर गाढ़ा भूरा के बीच कुछ भी हो सकता है अधिकांशतः गाढ़ा भूरा होता है। शिलाजीत का उपयोग आमतौर पर आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता है। आयुर्वेद ने शिलाजीत की बहुत प्रशंसा की है जहाँ इसे बलपुष्टिकारक, ओजवर्द्धक, दौर्बल्यनाशक एवं धातु पौष्टिक अधिकांश नुस्खों में शिलाजीत के प्रयोग किये जाते हैयह बहुत प्रभावी और सुरक्षित है, जो आपके संपूर्ण स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
शिलाजीत कम टेस्टोस्टेरोन भूलने की बीमारी अल्जाइमर, क्रोनिक थकान सिंड्रोम, आयरन की कमी से होने वाला रक्ताल्पता, पुरुष प्रजनन क्षमता में कमी पुरुष बांझपनअथवा हृदय के लिए लाभदायक है ।शिलाजीत मई और जून की कड़ी गर्मी में पहाड़ों के पसीने के रूप में निकलता हैं, जो मूलतः हिमालय के पहाड़ भारत नेपाल पाकिस्तान तिब्बत जैसे सात देशों में फैले हुए हैं से बहता हैं शिलाजीत कड़वा, कसैला, उष्ण, वीर्य शोषण तथा छेदन करने वाला होता है। शिलाजीत देखने में तारकोल के समान काला और गाढ़ा पदार्थ होता है जो सूखने पर चमकीला हो जाता है। यह जल में घुलनशील है, किन्तु एल्कोहोल, क्लोरोफॉर्म तथा ईथर में नहीं घुलता। शिलाजीत के फायदे शिलाजीत को इंडियन वियाग्रा कहा जाता है। शीघ्र स्खलनऔर ऑर्गेज्मसुख से वंचित लोगों में यह कामोत्तेजना बढ़ाने का काम करता है।
शिलाजीत के सेवन से नर्वस सिस्टम सही से काम करता है। मानसिक थकावट, अवसाद, तनाव और चिंता से लड़ने के लिए शिलाजीत का सेवन करना चाहिए। शिलाजीत का एक और महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह विभिन्न शरीर प्रणालियों को नियंत्रित करता है, जैसे कि आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली और हार्मोन का संतुलन। इसके सेवन से महिलाओं के माहवारी की अनियमितता खत्म हो जाती है। अध्ययनों से पता चलता है कि इसमें विशेष न्यूरोप्रोटेक्टेव क्षमता है। यह अविश्वसनीय पोषक तत्व अल्जाइमर रोग के हल्के मामलों का इलाज करने के लिए भी इस्ते शुद्ध शिलाजीत निरंतर सेवन करने से शरीर पुष्ट तथा स्वास्थ्य बढ़िया रहता है। आयुर्वेद में ऐसे कई योग हैं, जिनमें शुद्ध शिलाजीत होती है जैसे सूर्यतापी शुद्ध शिलाजीत बलपुष्टिदायक है, शिलाजत्वादि वटी अम्बरयुक्त मधुमेह और शुक्रमेह नाशक है, शिलाजतु वटी आयुवर्द्धक है, वीर्यशोधन वटी स्वप्नदोष और धातु क्षीणता नाशक है, चंद्रप्रभावटी मूत्र विकार और स्वप्नदोष नाशक है, प्रमेहगज केसरी मधुमेह नाशक है, आरोग्य वर्द्धिनी वटी उदर विकार नाशक है और ब्राह्मी वटी मस्तिष्क को बल देने वाली और स्मरण शक्तिवर्द्धक है।
शिलाजीतयुक्त से सभी औषधियां बनी बनाई औषधि विक्रेता की दुकान पर इन्हीं नामों से मिलती है। शिलाजीत चार प्रकार की होता है। इस की गंध दो तरह कपूर गंदी व् गोमूत्र गन्धी होता है। आयुर्वेदा में औषधीय दृष्टि से इसे श्रेष्ठ रसायन माना गया है। गोमूत्र गंधी शिलाजीत को श्रेष्ठ माना जाता है। यह त्रिदोष शामक है। इसे कई प्रकार की व्याधियों में प्रयोग किया जाता है। एक किलो शिलाजीत बाजार में करीब 15 से 20 हजार रुपये का बिकता है। अंदरूनी ताकत से लेकर, तनाव भगाना, मस्तिष्क को तेज और पोषण देना, शुगर, हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल स्तर और एनीमिया जैसी बीमारियों का ये बेजोड़ इलाज है। डायबिटीज की बीमारी को शिलाजीत नियंत्रित करता है।जिसे पाने के लिए दुनिया बेकरार हैपहाड़ में कुदरत का करिश्मा धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक उत्तरायणी मेला इस साल सादगी के साथ आयोजित होगा।
मेले में केवल धार्मिक अनुष्ठान के साथ गंगा स्नान और जनेऊ संस्कार ही चिह्नित स्थानों पर किए जा सकेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम और व्यापारिक गतिविधियां नहीं होंगी। विकास प्रदर्शनीए स्टॉल आदि नहीं लगाए जाएंगे।जिसका उपयोग स्वतंत्रा संग्राम के दौरान राजनैतिक और राष्ट्रीय चेतना फैलाने के लिए किया जाता था कुमाऊं की काशी में मकर संक्रांति पर्व पर आयोजित होने वाला उत्तरायणी मेला इस बार शायद हो पाएगा। कोरोना संक्रमण के कारण मेले की तैयारियों को लेकर अभी तक एक बैठक भी नहीं हो सकी है। यह मेला 14 जनवरी से शुरू होता है। दस दिनों तक चलने वाले मेले में लगभग सात करोड़ रुपये का व्यापार होता है। 55 लाख रुपये की धनराशि पालिका निर्माण और अन्य कार्यो में व्यय करती है। अलबत्ता मेले से जहां व्यापारियों को लाभ मिलता है वहीं स्थानीय लोगों के लिए भी सालभर में कमाई का साधन है। उत्तरायणी मेला कुमाऊं का सुप्रसिद्ध मेला है, जिसकी पहचान देश.विदेश तक है।
कुमाऊं.गढ़वाल के अलावा मेले में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, कलकत्ता, मुंबई से लेकर अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में व्यापारी, कलाकार आदि लोग यहां आते हैं। स्थानीय लोगों को भी मेले का वर्षभर इंतजार रहता है। इस साल कोरोना संक्रमण के कारण मेले की तैयारियां अभी शुरू नहीं हो सकी हैं। जबकि दिसंबर तक पालिका निर्माण कार्यो को अमलीजामा पहना देती थी। झूले, चर्खे, घाटों की सफाई, सरयू नदी पर अस्थाई पुलों का निर्माण समेत आधे से अधिक काम धरातल पर उतर जाते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तय हो जाती थी और कलाकारों को भी आमंत्रण पहुंच जाता था। इसके अलावा बाहर से आने वाले व्यापारियों का पंजीकरण आदि शुरू हो जाता था। गत वर्षो के उत्तरायणी मेले के अनुसार पालिका विभिन्न निर्माण कार्यो में 55 लाख रुपये से अधिक धनराशि का व्यय करती थी, जिससे स्थानीय ठेकेदार, मजदूरों का इसका सीधा लाभ मिलता था। इसके अलावा बाहर से आने वाले व्यापारी लगभग सात करोड़ रुपये का यहां व्यापार करते थे।
जोहर, व्यास, चौंदास, दानपुर से आए जड़ी बूटी व कालीन व्यापारियों के सामानों की भोटिया बाजार में जबरदस्त मांग हो रही है। पेट, सिर, घुटने आदि दर्द के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली गंदरेणी, जम्बू, कुटकी, डोला, गोकुलमासी, ख्यकजड़ी आदि जड़ी बूटी को अचूक इलाज माना जाता है। इसके साथ ही रिंगाल से बने सूपे, डलियों की भी खूब बिक्री हो रही है।
बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में पिथौरागढ़ जिले के धारचूला, मुनस्यारी, जोहार, दारमा, व्यास और चौंदास आदि क्षेत्रों के व्यापारी हर साल व्यापार के लिए आते हैं। हिमालयी जड़ी.बूटी को लेकर आने वाले इन व्यापारियों का हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। हिमालय की जड़ी.बूटियां ऐसी दवाइयां हैं जो रोजमर्रा के उपयोग के साथ ही बीमारियों में दवा का भी काम करती हैं। दारमा घाटी के बोन गांव निवासी बताते हैं कि जंबू की तासीर गर्म होती है। इसे दाल में डाला जाता है। गंदरायण भी बेहतरीन दाल मसाला है। यह पेट, पाचन तंत्र के लिए उपयोगी है। कुटकी बुखार, पीलिया, मधुमेह, न्यूमोनिया में, डोलू गुम चोट में, मलेठी खांसी में, अतीस पेट दर्द में, सालम पंजा दुर्बलता में लाभ दायक होता है।
उत्तरायणी मेले में जंबू, गंदरायण, डोलू, मलेठी आदि दस ग्राम 30 रुपये मेंए कुटकी 30 रुपये तोला के हिसाब से बिक रहा है। इसके साथ ही भोज पत्र, रतन जोत सहित कई प्रकार की धूप गंध वाली जड़ी बूटियां भी काफी बिकते थे। हिमालयी इलाकों में पैदा होने वाली कीमती जड़ी.बूटियां सदियों से परंपरागत मेलों के जरिए विभिन्न इलाकों तक जाती रही हैं। मेले में मुनस्यारी के दन और थुलमों की भी काफी मांग है। उत्तरायणी मेले में इन उत्पादों के खरीददार भी काफी खुश रहते हैं। खरीददार भी इनके द्वारा लाए गए सामान की अहमियत को जानते थे। कुमाउं की काशी कहे जाने वाले बागेश्वर में उत्तरायणी मेले में हिमालयी क्षेत्रों से जड़ी बूटी लाने वाले व्यापारियों का सालभर बेसब्री से इंतजार करते थे।