डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
नेपाल सीमा से लगे गांवों में चैतोला मेले को लेकर लोगों में खासा उत्साह बना हुआ। क्षेत्र के लोग अपनी तैयारियों में जुटे हुए। साथ ही देश विदेशों में रोजी रोजगार के लिए गए लोगों का आने घर आने का सिलसिला शुरू हो गया है। चैत्र मास की नवमी से शुरू होने वाले मेले को लेकर विभिन्न गांवो से चमू देवता की परिक्रमा के लिए आने वाले जत्थे अपनी तैयारियों में जुटे है।भ़गवती के देव डांगर ने बताया कि आदि काल में नेपाल सीमा क्षेत्र में बकासुर नाम के राक्षस का आतंक रहता था वह नर बली लेता था एक दिन कोकिला नाम की आमा व उसके ़पोते की बारी आई तो आमा भगवान भोले के मंदिर में आराधना करने लगी। कि हमें बचाओ आज्ञात वास का समय था कुंती के पांच पुत्र इस क्षेत्र के भ्रमण में थे। ब्रहाम्ण रूप में जब भिक्षा मांगने आए तो आमा ने सारी आप बीती बताई। इतने में चमू देवता ने आमा को दर्शन दिए तुम्हारी रक्षा हम करेगें। केदार नाथ के गण रूद्र, लाटा, भगराड़ा ने बाकासुर का वध किया। राक्षस के आतंक को खत्म करने के उपलक्ष्य चमू देवता के मंदिर में पापड़ के प्रसाद का भोग लगाया। आदि काल से ही मंदिर में घर के खेतों स्वयं पैदा किए गए चावलों के पापड़ तैयार कर पहले चमू देवता़ के मंदिर में भोग लगाया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। चेतौला मेले का मुख्य आकर्षण आज मड़ गांव से आने वाला चमू देवता का डोला होगा। इससे पूर्व 12 गांवों के जत्थे आकर्षक परिधानों व ढोल नगाड़ों के साथ मंदिर की परिक्रमा करेंगे, इन जत्थों में कई लोग शामिल होंगे। क्षेत्रवासी इन दिनों खान पान में पूरी शुद्धता बरत कर पूजा-अर्चना में लगे हुए हैं। देश के विभिन्न प्रांतों एवं विदेश में रह रहे यहां के लोग मेले में शिरकत होने के लिए पहुंच गए हैं। शांति व्यवस्था के लिए पीएससी, एसएसबी के अलावा पुलिस फोर्स तैनात की गई है। मध्यकाल में लगभग शत-प्रतिशत पहाड़ कृषि खेतीबाड़ी पर ही जीवनयापन करता था. जीवन प्रकृति के समीप था, आचार व्यवहार हर प्रसंग में ईश्वर भगवान अदृश्य अलौकिक शक्तियों पर अटल विश्वास आस्था थी. कदाचित इसी परिपेक्ष में सामान्य जन जीवन के रीति रिवाजों को भी दैवीय शक्तियों से जोड़ा गया होगापहाड़ में एक परंपरा रही है भिटौली. चैत्र माह को भेटौलिया माह के नाम से भी जाना जाता है. प्रचलित विश्वास कहें या मान्यता जिसके अनुसार सोरघाटी के प्रमुख लोकदेवता देवल समेत महाराज (जिनको शिवरुप जाना जाता है) अपनी बहिनों, माता भगवती के अनेक रुपों को भिटौली देने बाईस गांवों का भ्रमण करते हैं. उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति और यहां की सभ्यता और संस्कृति इसे अन्य राज्यों से अलग बनाती है. उत्तराखंड के कण-कण में देवी-देवताओं का निवास माना जाता है. राज्य के तमाम लोकपर्व यहां की भौगोलिक स्थिति और देवताओं के प्रति आस्था को समर्पित हैं. माना जाता है कि पहाड़ों में देवताओं का राज है और समय-समय पर देवता अपनी प्रजा के बीच अवतरित होते हैं. यहां कोई भी शुभ काम करने से पहले देवताओं की पूजा होती है, तो वहीं तमाम दुख-परेशानी में भी लोग अपने कुलदेवता को याद करते हैं. पिथौरागढ़ की सोर घाटी में मनाया जाने वाला एक लोकपर्व है चैतोल. इस दिनदेवताओं की शक्ति और जनता की अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा देखने को मिलती है.चैतोल पर्व में शिव के रूप में देवताओं को पूजा जाता है. अलग-अलग गांवों के अलग-अलग देवता होते हैं, जिन्हें ईष्टदेव बोला जाता है. ईष्टदेव का अपने स्थान में राज होता है. जनता रूपी प्रजा उनके हर आदेश का पालन करती है. चैत्र महीने में देवता अपनी बहनों से मिलने जाते हैं और उन्हें उपहार भेंट करते हैं. यह परंपरा कुमाऊं में ‘भिटौली’ नाम से जानी जाती है.देवतागण अपनी प्रजा के साथ दूसरे गांवों में अपनी बहनों, जो भगवती के रूप में विराजमान रहती हैं, उनको भिटौली देने जाते हैं. जनता द्वारा देव डांगरों को देव डोलों में बैठाया जाता है और उनकी भव्य यात्रा की शुरुआत होती है. पूरे सोर में हर गांवों से देवताओं के जयकारे गूंजते हैं.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












