डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मंगल पांडे का जन्म सन् 1827 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नागवा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कुछ सूत्रों के अनुसार उनका जन्म फैजाबाद के पास अकबरपुर में हुआ था। वे एक साधारण परिवार में पले-बढ़े और परिवार से अच्छे संस्कार सीखे। कम उम्र से ही वे कर्तव्य और जिम्मेदारी का अर्थ समझते थे।1849 में मंगल पांडे बंगाल सेना में भर्ती हुए। वे 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में सैनिक बने, जहाँ विभिन्न जातियों और समुदायों के सैनिक शामिल थे। सेना में अपने शुरुआती वर्षों में उन्होंने देखा कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारतीय सैनिकों के साथ कितना अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता था। इन अनुभवों ने उन्हें मजबूत और साहसी बनाया। इनसे अन्याय के खिलाफ खड़े होने की उनकी इच्छा भी मजबूत हुई, जो बाद में अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष में दिखाई दी। ईस्ट इंडिया कंपनी, जो कि भारत में व्यापारियों के रूप में आई थी, उसने जब भारत को अपने अधीन कर लिया तो लंदन में बैठे उनके आकाओं ने शायद यह उम्मीद भी नहीं की होगी कि एक दिन मंगल पांडेय रूपी कोई तूफान ऐसी खलबली मचा देगा, जो इतिहास में भारत की आजादी की पहली लड़ाई कही जाएगी।देश में 1857 की क्रांति में मंगल पांडेय का अहम स्थान है। आठ अप्रैल को उनका बलिदान दिवस है। वह बलिया के लाल थे। उनके बलिदान दिवस पर जिले के लोग इतराने में कोई कमी नहीं रखते। उनके पिता का नाम सुदिष्ट पांडेय और माता का नाम जानकी देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव की पाठशाला में हुई। 1849 में वह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से जुडे़।कोलकाता के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में वह 1446 नंबर के सिपाही थे। मंगल पांडेय ने ऐसे विद्रोह को जन्म दिया जो जंगल में आग की तरह संपूर्ण उत्तर भारत और देश के दूसरे भागों में भी फैल गई थी। अंग्रेजी हुकुमत ने उन्हें गद्दार और विद्रोही घोषित कर दिया। तब तक मंगल प्रत्येक भारतीय के लिए महानायक बन चुके थे। इस घटना के बाद ही 1857 की क्रांति का जन्म हुआ। एक ऐसी क्रांति जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। मंगल पांडेय का कोर्ट मार्शल कर मुकदमा चलाया गया। छह अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई। फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित तिथि से 10 दिन पूर्व ही आठ अप्रैल सन 1857 को फांसी पर लटका दिया उस वक्त अंग्रेजी सेना द्वारा लांच की गई एनफील्ड राइफल पी-53 में जानवरों की चर्बी से बने एक खास तरह के कारतूस का इस्तेमाल होता था। उसे राइफल में डालने से पहले मुंह से छीलना पड़ता था। अंग्रेज इस कारतूस में गाय और सूकर की चर्बी का इस्तेमाल करते थे। इस बात की जानकारी होने पर मंगल पांडेय आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। इसके बाद वह साथी सैनिकों को भी यह जानकारी दिए कि अंग्रेज अधिकारी हिन्दुस्तानियों का धर्म भ्रष्ट करने पर आमादा हैं। ये हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए नापाक था। इसके बाद 29 मार्च 1857 को जब नया कारतूस पैदल सेना को बांटा जाने लगा तो मंगल ने उसे लेने से इनकार कर दिया। इससे नाराज अंग्रेजों ने उनके हथियार छीन लिए। वर्दी उतार लेने का हुक्म दिया। उनकी राइफल छीनने के लिए जब अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन आगे बढे तो मंगल ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बाब को भी मार डाला। उसी के बाद देश में 1857 की क्रांति का जन्म हुआ। भारत में मंगल पांडे को कई तरीकों से याद किया जाता है और सम्मानित किया जाता है। उनकी वीरता को स्मारकों, डाक टिकटों और उद्यानों के माध्यम से दर्शाया जाता है। उनकी मृत्यु वीरता और बलिदान का प्रतीक बन गई, जिसने अन्य सैनिकों और आम लोगों को भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए प्रेरित किया। बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मंगल पांडे की 34वीं रेजिमेंट को सामूहिक सज़ा के तौर पर सन 1857 में भंग कर दिया। वहीं स्वाधीनता की इस क्रांति को कुछ समय के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने दबा तो दिया लेकिन वो भारतीयों के भीतर सुलग रही क्रांति को खत्म नहीं कर सके और आगे चलकर उन्हें भारत छोड़कर जाना ही पड़ा। भारत सरकार ने वर्ष 1984 में वीर मंगल पांडे के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था। इसके साथ ही उनके जीवन पर फिल्म और नाटक प्रदर्शित हुए हैं व कई पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं। आजादी की लड़ाई की पहली हुंकार भरने वाले महान क्रांतिकारी मंगल पांडे ने सन 1857 में आज ही के दिन अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी और उनकी ओर से शुरू की गई स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी पूरे देश में फैल गई। भारत की एकता और अखण्डता के लिए मंगल पांडे की ओर से किया गया त्याग और बलिदान सम्पूर्ण राष्ट्र को अनंतकाल तक स्मरण रहेगा।”
बैरकपुर में बना मंगल पांडे का ओजमय समाधि स्थल दर्शनार्थियों में देशभक्ति, त्याग एवं बलिदान का भाव भरते हुए देश के सर्वांगीण विकास का आह्वान कर रहा है।. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












