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पहाड़ का कल्पवृक्ष च्यूरा

12/01/21
in उत्तराखंड, चम्पावत, पिथौरागढ़
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
यह बहुमूल्य वृक्ष कुमाऊँ और पिथौरागढ़ जनपद तथा भारत नेपाल की सीमा पर काली नदी के किनारे 3000 फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। वहां उसे ज्यादा तादाद में उगाने का प्रयास किया जा रहा है। यह वृक्ष यहां की जलवायु में ही पनपता है, अतः वहां के लोगों के लिए यह कल्पवृक्ष के समान है। उन लोगों के लिए घी का यही एकमात्र साधन है, जिसके पास फल देने वाले 3-4 वृक्ष होते हैं। उसे साल भर बाजार से वनस्पति घी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। यह एक छायादा वृक्ष होता है, फूल आने का समय अक्टूबर से जनवरी होता है तथा जुलाई-अगस्त में इसके फल पक जाते हैं। पके हुए फल पीले रंग के होते हैं, खाने में काफी स्वादिष्ट और सुगंधित होते हैं। वातावरण में फैली इस फल की मीठी महक से ही मालूम पड़ जाता है कि फल पकने लगा है। गांव के लोग इन फलों को बड़े चाव से खाते हैं और एक भी बीज फेंकते नहीं है। च्यूरा के जितने अधिक पेड़ होंगे भविष्य में उतना ही अधिक उत्पादन होगा। च्यूरा का वानस्पतिक नाम डिप्लोनेमा बुटीरैशिया है।

तीन हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र तक इसके पेड़ 12 से 21 मीटर तक ऊंचे होते हैं। पहाड़ के घाटी वाले क्षेत्रों में इसके जब फूल खिलते हैं तब शहद का काफी उत्पादन होता है। इसकी पत्तियां चारे व भोजन पत्तल के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग में लाई जाती हैं। च्यूरे की खली मोमबत्ती, वैसलीन और कीटनाशक बनाने के काम आती है। जिन क्षेत्रों में च्यूरे के पेड़ पाये जाते हैं उन क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन भी किया जाता है। च्यूरे के पुष्प मकरंद से भरे रहते हैं जिससे उच्च कोटि का शहद तैयार होता है इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर और चम्पावत जिलों के काली, सरयू, पूर्वी रामगंगा और गोरी गंगा नदी घाटियों में पाया जाता है। इसका फल बेहद मीठा होता है। फल के बीज से घी बनाया जाता है। अब तक कुछ गांवों में लोग इससे सीमित मात्रा में घी बनाकर उपयोग में लाते थे। इसके गुणों को देखते हुए लंबे समय से इसको रोजगार से जोड़ने की कोशिशें की जा रही थी च्यूरा से घी और साबुन तैयार किया जाता है। च्यूरा से तैयार किए गए एक साबुन की कीमत 80 से 150 रुपये तक होती है। घी लगभग 200 रुपया प्रति किलो तक बेचा जाता है।

जड़ से लेकर पत्तियों तक बहुउपयोगी इस वृक्ष को अभी तक सरकारी संरक्षण नहीं मिला है। प्रकृति में उगे हर वृक्ष की अपनी विशेषताएं होती हैं, काली और सरयू नदी घाटी में नाप और बेनाप भूमि पर पाया जाने वाला च्यूरा वृक्ष कई विशेषताओं को समेटे है। विशाल आकार के च्यूरा के फल, फूल, पत्ती, छाल, लकड़ी सभी उपयोगी हैं। सदियों से इनका उपयोग होता आया है। च्यूरा स्थानीय आस्था से भी जुड़ा है। गृह प्रवेश से लेकर अन्य मांगलिक कार्यो में च्यूरा के पत्तों की माला बनाकर मकान के चारों तरफ लगाने की परंपरा रही है। आज भी गांवों में इस परंपरा का पालन किया जाता है। च्यूरा वृक्ष विशाल होते हैं। इसकी जड़ें भी गहरी होती हैं जिसके चलते यह भू क्षरण रोकने में सहायक रहता है।

च्यूरा बहुतायत वाले क्षेत्रों में भू कटाव का अनुपात अन्य स्थानों की अपेक्षा काफी कम रहता है। इस वृक्ष की पत्तियां जानवरों के लिए सर्वोत्तम चारा होती हैं। च्यूरा की खली के चूरे को लॉन, गोल्फ मैदान और अन्य खेलों के मैदान में कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें सैपोनिन होता है, जिसका उपयोग साबुन, सौदंर्य प्रसाधन और औषधीय उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। कहीं कहीं इसका उपयोग मैदान में खाद के विकल्प के रूप में भी किया जाता है। बागवानी फसलों के लिए स्वदेशी खाद के साथ प्रयोग के लिए यह उपयोगी मानी जाती है।

आजकल अनेकों सरकारी एवं गैर.सरकारी संस्थाओं द्वारा इसके संरक्षण.संवर्धन के साथ ही आधुनिक तकनीक से इसके प्रसंस्करण.उत्पादन के प्रयास किये जाने के समाचार अवश्य प्राप्त हो रहे हैं। वर्ष पिथौरागढ़ के कुछ युवाओ की एक अच्छी पहल के अंतर्गत दिवाली के अवसर पर घर के अनुपयुक्त सामान का सदुपयोग कर एक गिफ्ट.पैक तैयार किया गया था, जिसमें च्युरा.घी से जलने वाली जुगनू लाइट मुख्य आकर्षण थी। दावा किया गया था की यह साधारण दीये या मोमबत्ती के मुकाबले काफी देर तक लगभग दो से ढाई घंटे जलने के लिए तैयार की गयी है। पिथौरागढ़ के मूनाकोट ब्लॉक में प्रसंस्करण यूनिट स्थापित की जा रही है। इस यूनिट में अक्तूबर से दोनों उत्पादों का उत्पादन शुरू हो जाएगा। च्यूरा से तैयार किए गए एक साबुन की कीमत 80 से 150 रुपया होगी। घी लगभग 200 रुपया प्रति किलो बेचा जाएगा। इंडियन बटर ट्री के नाम से जाना जाने वाला च्यूरा पिथौरागढ़ के काली, सरयू, पूर्वी रामगंगा और गोरी गंगा नदी घाटियों में पाया जाता है। इसका फल बेहद मीठा होता है। फल की बीज से घी बनाया जाता है। अब तक कुछ गांवों में लोग इससे सीमित मात्रा में घी बनाकर उपयोग में लाते थे।

शीघ्र ही च्यूरा की नर्सरियां तैयार की जाएंगी। इसकी पौध लगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा। च्यूरा के जितने अधिक पेड़ होंगे भविष्य में उतना ही अधिक उत्पादन होगा।शीघ्र ही च्यूरा की नर्सरियां तैयार की जाएंगी। इसकी पौध लगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाए। च्यूरा के जितने अधिक पेड़ होंगे भविष्य में उतना ही अधिक उत्पादन होगा।

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