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कुली बेगार के विरोध ने दी कुमाऊं के स्वतंत्रता आंदोलन को नई पहचान

11/01/21
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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कुली बेगार के शताब्दी वर्ष पर एसण्एसण्जेण्परिसर, अल्मोड़ा के इतिहास विभाग में हुई गोष्ठी’
अल्मोडा। कुली बेगार आंदोलन, उत्तराखंड का महत्वपूर्ण आंदोलन रहा है। कुमाऊं क्षेत्र से उठा यह आंदोलन आज भी कुली बेगार की कुप्रथा का स्मरण कराता है। ऐसी सामाजिक कुप्रथा से जुड़ा कुली बेगार प्रथा का शताब्दी वर्ष पर एस एस जे परिसर के इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व विभाग में गोष्ठी आयोजित हुई। गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नरेंद्र सिंह भंडारी और अतिथि रूप में कर्नल रवि पांडे, सुधीर पांडे, मृदुला जोशी, सुशील जोशी, वसुधा पंत, प्रोफेसर विद्याधर सिंह नेगी, प्रोफेसर अनिल जोशी आदि ने गोष्ठी की शुरुआत की।

गोष्ठी की रूपरेखा रखते हुए प्रोफेसर अनिल जोशी ने विस्तार से कुली बेगार आंदोलन के विषय में विस्तार से रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि कुली बेगार आंदोलन से जुड़ने के लिए कई महान हस्तियां बागेश्वर के सरयू बगड़ में पहुंचे। उन्होंने आंदोलन की पृष्ठभूमि रखी और बद्रीदत्त पांडे के संबंध में विस्तार से ऐतिहासिक जानकारियाँ दी।

एस एस जे परिसर के इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व विभाग के विभागाध्यक्ष और कार्यक्रम संयोजक प्रोफेसर वी डी एस नेगी ने कहा कि कुली बेगार आंदोलन के कारण कुमाऊं का नाम विश्वपटल पर गया है। इस क्षेत्र के आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय पटल पर प्रतिनिधित्त्व किया। यहां के मेले में भी उनका प्रभाव दिखता है। उत्तरायणी मेला उसका उदहारण है। इस आंदोलन ने समाज को राजनीतिक रूप से जागृत किया।

कर्नल रवि पांडे बद्री दत्त पांडे के नवासे, ने कहा कि विसपा अभियान बहुत चर्चित रहा। उत्तरायणी मेले के अवसर पर रजिस्टर को बहाया जाना, बहुत बड़ी घटना थी। उन्होंने बद्री दत्त पांडेय से संबंधित जानकारी दी।

मुख्य वक्ता के तौर पर साहित्यकार सुशील जोशी ने कहा कि स्वर्गीय बद्रीदत्त पांडे के संबंध में कहा कि एक समाजसेवी, पत्रकार के तौर पर वह रहे। उनके सहयोगियों के संबंध में भी जानकारी दी। और कहा कि बुद्धि बल्लभ पंत ने बद्रीदत्त पांडेय के सहयोग से फॉर्मल एजुकेशन के लिए काम किया और उन्होंने इल्बर्ट बिल का विरोध भी उस समय नंदादेवी में उन्होंने किया, जो ब्रिटिश अधिकारियों का विरोध था। बद्री दत्त पांडे ने अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से राष्ट्रीयता से संबंधी क्रांतिकारी लेख लिखे, निर्भीक होकर उन्होंने कई लिखे। जिसके तेवर देखकर यह अखबार ब्रिटिश दबाव में यह अखबार बंद हो गया। समाज की कुरीतियों, जैसे नायक प्रथा को बंद करवाया। कुली बेगार प्रथा को बंद कराया। उनके नेतृत्त्व में कुली बेगार के रजिस्टर सब प्रवाहित कर दिए। ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों को ललकार कर इस प्रथा का अंत किया। वह स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़े रहे। जेल भी वह गए। उनको काल कोठरी में बंद तक कर दिया। राजनीतिज्ञ रूप में भी वह शुरू से शामिल रहे।

इस अवसर पर प्रोफेसर एसण्एण् हामिद ने कहा कि कुली बेगार आंदोलन नॉन वायलेंट मूवमेंट रहा है। उन्होंने कहा कि हम ऐसी कई कुरीतियों से घिरे हुए हैं। स्वतंत्रता के भी कई दायरे होते हैं। अब हम बंधन मुक्त हो रहे हैं। डॉ चंद्र प्रकाश फुलोरिया ने कहा कि कुली बेगार आंदोलन इस कुमाऊं की पहचान है। डॉ कपिलेश भोज ने कहा कि वह जननायक थे। इतिहास न जानना बहुत खतरनाक है। यहां के जननायक बाहर से ज्ञान लेकर आते थे और उसका समाज में संचार करते थे। डॉ वसुधा पंत, गिरीश मल्होत्रा, प्रेमा बिष्ट, किरण तिवारी आदि ने भी विस्तार से बात रखी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नरेंद्र सिंह भंडारी ने कहा कि रक्तहीन क्रांति के तौर पर यह कुली बेगार आंदोलन जाना गया। सामाजिक आंदोलन के रूप में इन आंदोलनों ने कुरूतियों पर प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि बद्रीदत्त पांडे के परिवार के सदस्यों का इन गोष्ठी में शामिल होना प्रशंसनीय है।

उन्होंने कहा कि 1900 के दौर के आंदोलनों ने समाज के हितों की परवाह की और उन समस्याओं को दूर करने के लिए एकजुटता दिखाई। इन सामाजिक आंदोलनों में कुली बेगार आंदोलन प्रमुख है। उस समय के अधिकतर आंदोलन इसलिए सफल रहे हैं कि उन आंदोलनों को दिशा देने के लिए ऐसे लोग शामिल रहे। जो तन मन से समर्पित रहे थे।

इन आंदोलनों और इनसे जुड़े लोगों को सामने लाने के लिए शोध कियी जाने की जरूरत है। विगत के बिना विकास अधूरा है। इसलिए कुली बेगार आंदोलन से सीखकर आगे काम किये जाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि इतिहास विभाग कुली बेगार आंदोलन को लेकर एक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित कर आंदोलन और आंदोलन से जुड़े लोगों का दस्तावेजीकरण भी करे। ताकि कुली बेगार आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाये।

इससे पूर्व इतिहास विभाग के संग्रहालय में कुमाऊं के इतिहास चर्चित और चंदशासन में कूटनीतिज्ञ रहे हरकदेव जोशी के द्वारा प्रयुक्त हथियारों को उनके वंशज मनोज कुमार जोशी ने दान स्वरूप दिया गया हैएजिनका लोकार्पण भी अतिथियों द्वारा किया गया। संग्रहालय के प्रभारी डॉ चंद्र प्रकाश फूलोरिया ने अतिथियों को संग्रहालय से संबंधित सामग्री से परिचय कराया गोष्ठी का संचालन प्रोफेसर वीण्डीण् एसण्नेगी ने और प्रोफेसर अनिल जोशी ने आभार जताया।इस अवसर पर एस ए हामिद, प्रोफेसर के इन पांडेय, प्रोफेसर एच बी कोठारी, परीक्षा नियंत्रक प्रोफेसर सुशील जोशी, डॉ नवीन भट्ट, डॉ भास्कर चौधरी, विश्वविद्यालय के विशेष कार्याधिकारी डॉ देवेंद्र सिंह बिष्ट, डॉ चंद्र प्रकाश फुलोरिया, डॉ भगवती प्रसाद पांडे, डॉ ललित जोशी, कमल जोशी, कपिलेश भोज, गोकुल देवपा, वसुधा पंत, रवि कुमार, पार्थ तिवारी, गिरीश चंद्र मल्होत्रा, आस्था नेगी, माला आर्या, जीवन भट्ट, नरेंद्र कुमार, रवि कुमार, दीपा भंडारी, कमला आदि शिक्षक, शोधार्थी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

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