डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चमोली जिले के जिस गांव में ग्लेशियर टूटा है, उसका नाम इतिहास में दर्ज है। दरअसल, रेणी गांव में ही पर्यावरण सरंक्षण के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। रेणी गांव के गौरा देवी के नेतृत्व में पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन शुरू हुआ था। इस आंदोलन में गांव की महिलाएं पेड़ों को बचाने के लिए उससे चिपक कर खड़ी हो गई थी। इस आंदोलन ने पूरी दुनिया में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। चिपको आंदोलन ने पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण का अनोखा और जरूरी संदेश दिया था। चिपको आंदोलन की एक मुख्य बात थी कि इसमें महिलाओं ने भारी संख्या में भाग लिया था। इस आंदोलन की शुरुवात 1970 में गौरा देवी के नेतृत्व मंे हुआ था। जिसे भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डीप्रसाद भट्ट के नेत्रत्व में आगे बढ़ाया गया।
चिपको आंदोलन वनों का अव्यावहारिक कटान रोकने और वनों पर आश्रित लोगों के वनाधिकारों की रक्षा का आंदोलन था। पहले भी केदारनाथ में भयंकर त्रासदी आ चुकी है, जिसे लोग अब तक नहीं भूल पाए हैं। चमोली में हुए इस भयंकर हादसे ने एक बार फिर कई सवालों को जन्म दे दिया है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने और हिमालयी क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ने के कारण इस तरह के आपदा का खतरा और बढ़ गया है। पर्यावरण की लड़ाई को चिपको आंदोलन के माध्यम से धार देने वालीं गौरा देवी के रैणी गांव से प्रकृति के तांडव की जो खबरें निकली हैं, उन्होंने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। चमोली जिले के इस इलाके में बहुत कम फासले पर दो.दो पावर प्रोजेक्ट होने पर अब नए सिरे से बहस शुरू हो गई है। ऋषिगंगा और एनटीपीसी के तपोवन प्रोजेक्ट दोनों ही प्रकृति के कहर से इस बार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
2013 की आपदा में भी इन दोनों ही प्रोजेक्ट को नुकसान हुआ था। इस बार तय है कि नुकसान ज्यादा और बड़ा होगा। रैणी गांव की पहचान पर्यावरण संरक्षण के शानदार और अनूठे चिपको आंदोलन के लिए है। जंगलों के ठेकेदार जब वहां पर पेड़ काटने पहुंचे थे तब स्थानीय महिला गौरा देवी की अगुवाई में तमाम महिलाएं पेड़ों पर चिपक गई थीं और चेतावनी दी थी कि पेड़ काटने से पहले उन्हें काटना होगा। पेड़ पर चिपककर पेड़ और जंगल को बचाने का यह अभियान चिपको आंदोलन के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट बाद में इस आंदोलन को और आगे तक ले गए।
ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ से सबसे बुरी तरह से ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट प्रभावित हुआ है, जिसकी बिजली उत्पादन की क्षमता 13 मेगावाट है। इस प्रोजेक्ट का स्थानीय लोगों ने काफी विरोध किया है। खूब आंदोलन हुए हैं। यह प्रोजेक्ट 2011 में स्वीकृत हुआ था, लेकिन 2016 में प्रोजेक्ट के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण यहां पर बिजली उत्पादन बंद हो गया था। प्रोजेक्ट पिछले साल जून में दोबारा चालू हुआ था। इससे पहले, 2013 की आपदा में भी इसे नुकसान हुआ था। तपोवन में धौलीगंगा पर स्थित एनटीपीसी का पावर प्रोजेक्ट की बात करें तो यह ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट के मुकाबले काफी ज्यादा क्षमता का है। इससे 520 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। साल 2019 में एक रिसर्च हुई और उस रिपोर्ट में दावा किया गया कि रिसर्च की रिपोर्ट में बताया गया कि 21 वीं सदी यानी की मौजूदा समय में हिमालय के ग्लेशियरों की पिघलने की रफ्तार पहले के 25 साल के मुकाबले दोगुनी हो चुकी है। पहाड़ों से सटे ग्लेशियरों पर बर्फ की परत पिघल रही है। जब भी तापमान बढ़ता है तो ग्लेशियर को नुकसान पहुंचता है। पानी की कमी से ग्लेशियर तबाह हो जाता है और तबाही मचा देता है। जैसा की आज उत्तराखंड के चमोली में हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगले कुछ दशक में हम और ग्लेशियर खो देंगे और फिर इन ग्लेशियर से पैदा होने वाले बिजली, पानी से करोड़ों लोगों को फायदा मिलना बंद हो जाएगाण्यानी की ग्लेशियर से और भी नुकसान उठाने को तैयार रहना पड़ सकता है। भारत में ग्लैशियर के पिघलने से अधिक नुकसान होता है, क्योंकि यहां पर पहले से ही नदियों की लंबाई और चौड़ाई को कम रखा गया है। ऊपर से नदियों के रास्तों पर ही बांध का निर्माण किया गया है। ऐसे में ग्लेशियर के पिघलने से नदियों में पानी अधिक मात्रा में पहुंच जाता है और फिर इस बहाव से नदीयों के किनारे बसे गांवों पर खतरा मंडराता रहता है। ग्लेशियर को बचाया जाना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की जीविका निर्भर हैण् ग्लेशियर को बचाकर रखने के लिए दुबई और हांगकांग जैसे देशों ने काम करना भी शुरू कर दिया है हालांकि यह बेहद महंगा प्रोजेक्ट है लेकिन ग्लेशियर को बचाकर रखना भी ज़रूरी हैण् चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी के गांव रैणी वालों ने जताई थी तबाही की आशंका, ऋषि गंगा प्रोजेक्ट का किया विरोध था। कंपनी पर्यावरण मानकों को ताक पर रखकर नदी तट पर विस्फोटक से पत्थर तोड़ रही है, साथ ही आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी व साथियों के जंगल में प्रवेश करने के लिए बनाए गए ऐतिहासिक मार्ग को भी बंद कर दिया है। तब इस याचिका पर सख्ती रुख दिखाते हुए हाई कोर्ट ने इसे कंपनी की ओर से की गई अंधेरगर्दी करार दिया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने मामले को लेकर केंद्र व राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे।