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अश्वगंधा भारतीय जिनसेंग कहते हैं: डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

12/09/24
in उत्तराखंड
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 देहरादून। अश्वगंधा यह एक काष्ठीय झाड़ी है जिसकी ऊंचाई 170 सेंटीमीटर तक होती है। यह टमाटर की तरह होता है, जो उसी के परिवार का सदस्य है। इसमें लाल और पीले रंग के फूल लगते हैं। हालांकि इसे फल आकार में बेरी की तरह होते हैं। अश्वगंधा, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश में ऊगाए जाते हैं। मध्यप्रदेश में इसकी व्यवसायिक खेती होती है। आयुर्वेद में अश्वगंधा को रसायन माना जाता है, जिसका उपयोग शारीरिक क्षमता और आरोग्यवृद्धि में किया जाता है। यह एक विषनाशी बूटी है जो स्नायुतंत्पर कार्य करता है। आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसकी जड़ और फलों का इस्तेमाल होता है। आयुर्वेद में इससे अवांछनीय घटकों को अलग करने के लिए इसे दूध में उबालकर सुखा लिया जाता है। इसके फलों का इस्तेमाल पनीर बनाने के लिए दूध जमाने में भी किया जाता है। संस्कृत में अश्वगंधा का अर्थ अश्व घोड़े का गंधवाला होता है। इसका यह नाम शायद इसलिए हैं कि इसकी जड़ का गंध घोड़े के मूत्र की गंध के जैसा होता है। यह सोमनीफेरा प्रजाति के अंतर्गत आता है। सोमनीफेरा का अर्थ निद्रा-पैदा करने वाला होता है। लेकिन इसके इस्तेमाल बलवर्द्धन, यौनक्षमता में वृद्धि और शरीर में प्रतिरोधक क्षमता वृद्धि के लिए होता है। इसलिए कुछ लोग इसे भारतीय जिनसेंग कहते हैं। चीन में जिनसेंग का इस्तेमाल यौनक्षमता में वृद्धि के लिए किया जाता है।रसायनिक घटक अश्वगंधा की जड़ में उपस्थित रहते है, जब तक अन्यथा न कहा जाए. इसलिए इसकी जड़ का इस्तेमाल ज्यादा होता है। एनाफेरीन एल्केलॉइड, एनाहाइग्रीन एल्केलॉइड, बीटा-सिस्टेरॉल, क्रोजेनिक एसिड सिर्फ पत्तियों में, सिस्टेन फलों में, कस्कोहाइग्रीन एल्केलॉइड, लौह-तत्व, सियूडो-ट्रोपिन एल्केलॉइड, स्कोपोलेटिन, सोमिनिफेरीनीन एल्केलॉइड सोमनीफेरीनीन एल्केलॉइड, ट्रोपैनॉलस, विथेफेरीन-ए स्टेरॉइडल लैक्टिन, वेथेनीन, विथेनेनीन, वेथेनॉलाइड्स, ए-वाई स्टेरॉइडल लैक्टिन, एनाफेरीन, एनाहाइग्रीन, सिस्टरॉल, क्लोरोजेनिक एसीड पत्ती में आदि. अश्वगंधा के मुख्य अवयव एल्केलॉइड्स और स्टेरॉइडल लैक्टॉन है। अन्य घटकों में विथनीन. अश्वगंधा की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति, उसकी उगाई जाने वाली किस्म, फसल की देखभाल पर निर्भर करती है यदि अश्वगंदा की खेती उन्नत ढंग से की जाये तो प्रति हेक्टेयर ३-४ क्विंटल सूखी जङें और ५०-७५ किलोग्राम बीज की प्राप्ति हो जाती है इसकी जङें 400-500 की 100 गा्म दर से बिकती हैं, जबकि इसका बीज ५० रूपये प्रति किलोग्राम बिक जाता हैअश्वगंधा की बीस से ज्यादा प्रजातियां, भारत, उत्तरी अफ्रीका, मध्यपूर्व और भूमध्यसागरीय क्षेत्र को सूखे वाले भागों में पाई जाती है। जलवायु: अश्वगंधा के फसल उत्पादन के लिए शुष्क जलवायु उत्तम रहती है जिसे ६५० से ७५० मिमी वर्षा वाले क्षेत्रों में भली-भाँति उगाया जा सकता है। ऐसे क्षेत्रों में इसकी जड़ें उच्च गुणवत्ता वाली मिलती हैं जाङों में इसकी जड़ों का विकास तीव्र गति से होता है पतंजलि योगपीठ के संचालक स्वामी रामदेव जी के सहयोगी आचार्य बाल कृष्ण का जन्म दिवस मंगलवार को जड़ी बूटी दिवस के रूप में मनाया गया। वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने के साथ-साथ मानव शरीर को भी रोग मुक्त बनाने की क्षमता रखते हैं। शरीर के लिए जरूरी विटामिन उपलब्ध करवाने तथा प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए ये पौधे अपनी विशेष पहचान रखते हैं अश्वगंधा के जरिए डायबिटीज से भी बचा जा सकता है. इसमें मौजूद हाइपोग्लाइमिक गुण, ग्लूकोज की मात्रा को कम करने में मदद कर सकता है. यह डायबिटीज के लक्षणों को भी कम करता है. यह इम्यूनिटी मजबूत करता है. इम्यूनिटी बेहतर करने के लिए अश्वगंधा का सेवन किया जा सकता है. इसमें मौजूद इम्यूनमॉड्यूलेटरी गुण शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, जिससे रोगों से लड़ने में मदद मिलती है. अश्वगंधा में एंटी-इंफ्लेमेट्री गुण होता है जो अर्थराइटिस (जोड़ों की बीमारी) के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद होता है. इस गुण की वजह से अश्वगंधा की जड़ के रस का प्रयोग करने से आर्थराइटिस से जुड़े लक्षण कम हो सकते हैं और दर्द से भी आराम मिल सकता है. यह जड़ी-बूटी अर्थराइटिस के लक्षणों को भी कम करता है. यह वजन भी कंट्रोल करता है. इसकी निरन्तर बढ़ती मांग को देखते हुए इसके उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। एक हेक्टेयर में अश्वगंधा पर अनुमानित व्यय रुपये 10000/- आता है जबकि लगभग 5 क्विंटल जड़ों तथा बीज का वर्तमान विक्रय मूल्य लगभग 78,750 रुपये होता है। इसलिए शुद्ध-लाभ 68,750 रुपये प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। उन्नत प्रजातियों में यह लाभ और अधिक हो सकता है। कैंसर और मानसिक रोगों के लिए असरदार औषधीय गुणों से भरपूर अश्वगंधा की खेती अब सूबे के किसान कर सकेंगे। हिमाचल में समुद्रतल से 14 सौ मीटर से नीचे वाले क्षेत्रों में पारंपरिक खेती से हटकर विकल्प के तौर पर अश्वगंधा की खेती अपनाई जा सकती है। आयुर्वेदिक औषधीय पौधे को बिलासपुर, ऊना, मंडी, कांगड़ा, सोलन, सिरमौर, हमीरपुर और कुल्लू में आसानी से उगाए जा सकेगा। रिसर्च के बाद इसका खुलासा राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) के अंतर्गत राज्य औषधीय पादप बोर्ड क्षेत्रीय और सुगमता केंद्र उत्तर भारत जोगिंद्रनगर के अधिकारियों ने किया है। बोर्ड के माध्यम से खेती करने पर किसानों को वित्तीय सहायता भी मिलेगी। जिसमें प्रति हेक्टेयर लगभग 11 हजार रुपये का प्रावधान किया गया है। किसान व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर अश्वगंधा की की खेती अपना सकते हैं। क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय और सुगमता केंद्र उत्तर भारत डॉ. अरुण चंदन ने इसकी पुष्टि की है। एक एकड़ से 12 हजार तक शुद्ध आय रिसर्च के दौरान आंकड़े सामने आए हैं कि 7-8 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है और इसकी रोपाई जून-जुलाई नर्सरी के दो महीने बाद की जा सकती है। पौधों को 4-6 इंच की दूरी पर प्रत्यारोपित किया जाता है। अश्वगंधा की फसल मात्र 5-6 महीने में ही तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ इसकी उपज 250 से 300 किलोग्राम तक रहती है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अश्वगंधा की माँग इसके अधिक गुणकारी होने के कारण बढ़ती जा रही है। उत्तरखंड में भी इसकी खेती की जाती है जड़ी-बूटियों की खेती सिर्फ किसानों को मालदार ही नहीं बना रही, बल्कि इससे कई बार अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को भी बल मिल रहा है। मसलन, हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य से नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियों की तुलना करते हुए वहां की धरोहर जड़ी बूटियों और जैविक खेती के माध्यम से रोजगार को बढ़ावा देने की पहल की है। औषधीय जड़ी-बूटियों की खेती किसानों को हरित क्रांति का एहसास करा रही है। इसकी सफलता को देखते हुए ही अब जड़ी-बूटियों की खेती पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग होने लगी है। वैज्ञानिक औषधीय पादपों के संवर्धन और संरक्षण के लिए औषधीय पादपों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर दे रहे हैं। उनका मानना है कि इसे आजीविका से जोड़कर ग्रामीणों की आर्थिकी मजबूत की जा सकती है। पूरे विश्व का रुझान आज आयुर्वेद की  प्राकृतिक जैव.संसाधनों व पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण मानव जाति को सतत विकास की राह प्रदर्शित करता है। ये संसाधन, अनुसंधान हेतु आवश्यक व महत्त्वपूर्ण आगत के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। अतः विकास की अंध.आंधी से पूर्व इनका संरक्षण करना चाहिए। दोहन खेती करने के बाद ही किया जा सकता है। ताकि इस बहुमूल्य सम्पदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिकी का जरिया बनाया जा सके। अश्वगंधा का उत्तराखंड में न तो इसका उत्पादन किया जाता है और न ही खेती की जाती है। उत्तराखंड में इसका इस्तेमाल न तो दवा के तौर पर भी किया जाता है। ऐसी को यदि बागवानी रोजगार से जोड़े तो अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी उनकी इसलिए भारत का इलाज करने के लिए लाइलाज होते गांवों के इलाज को प्राथमिकता देनी होगी। इस लेख में दिए गए विचार लेखक के हैं। लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में हैं

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