डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर एक महीने पहले किए गए अचानक हमलों से शुरू हुआ टकराव अब लंबी खींचतान वाले गतिरोध में बदल गया, जिसका फिलहाल कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है।फरवरी को हुए शुरुआती हमलों में तेहरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, जिसमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर वर्षों से चल रहा तनाव अब खुले संघर्ष में बदल गया है, जबकि कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ते दिख रहे हैं और दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हैं।ईरान में जमीनी स्थिति भी लगातार बिगड़ रही है। वहां से आ रही खबरों में क्षतिग्रस्त रिहायशी इलाकों, दबाव में काम कर रहे अस्पतालों और हमलों से बचने के लिए पलायन करते लोगों की तस्वीरें सामने आ रही हैं। दक्षिणी ईरान के मीनाब में एक स्कूल पर अमेरिकी हवाई हमले में दर्जनों लड़कियों की मौत की घटना ने इस संघर्ष की भयावहता और इसके जटिल कानूनी पहलुओं को उजागर किया है।भविष्य में संभावित युद्ध अपराधों की जांच करने वालों के सामने कई अहम सवाल होंगे—क्या स्कूल पूरी तरह नागरिक क्षेत्र था, क्या उसका सैन्य उपयोग हो रहा था, हमले से पहले क्या सावधानियां बरती गईं और क्या नागरिकों को हुआ नुकसान सैन्य लाभ की तुलना में अत्यधिक था। इन सवालों के जवाब के बाद ही जिम्मेदारी तय हो सकेगी, लेकिन फिलहाल ऐसी स्पष्टता दूर की बात लगती है।कई विशेषज्ञों ने इस संघर्ष के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाए हैं। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र को लिखे पत्र में आत्मरक्षा और इज़राइल की सुरक्षा का जो तर्क दिया है, वह कमजोर है। वहीं कुछ का मानना है कि यदि हमलों का उद्देश्य शासन परिवर्तन था, तो यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है।हालांकि, इस संघर्ष में कथित अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही तय होना फिलहाल मुश्किल नजर आता है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के पास स्वतः अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि अमेरिका, इज़राइल और ईरान इसके संस्थापक समझौते ‘रोम संधि’ के पक्षकार नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा इस मामले को आईसीसी को भेजे जाने की संभावना भी कम है, क्योंकि स्थायी सदस्य देश वीटो का इस्तेमाल कर सकते हैं।ऐसी स्थिति में संबंधित देशों द्वारा आंतरिक जांच की संभावना भी अनिश्चित है, क्योंकि ये जांच अक्सर गोपनीय होती हैं या सीमित दायरे में की जाती हैं। स्वतंत्र जांचकर्ताओं को उपग्रह तस्वीरों, प्रमाणित वीडियो, सामूहिक कब्रों, हथियारों के अवशेष और चिकित्सा रिकॉर्ड के आधार पर साक्ष्य जुटाने पड़ते हैं, जिससे घटनाओं की पुष्टि तो हो सकती है, लेकिन जिम्मेदार व्यक्तियों का पता लगाना और उनकी मंशा साबित करना कठिन होता है।विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कानून स्पष्ट हैं-नागरिकों और लड़ाकों में अंतर करना, नागरिकों को अनावश्यक नुकसान से बचाना और हमले से पहले सावधानियां बरतना अनिवार्य है। लेकिन इन नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करना अक्सर मुश्किल होता है।अतीत में भी ऐसी स्थितियां देखी गई हैं। 2014 में सीरिया में कथित युद्ध अपराधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मामला आईसीसी को भेजने का प्रयास रूस और चीन के वीटो के कारण विफल रहा था। 2021 में यमन में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र समिति का कार्यकाल भी समाप्त कर दिया गया था।गाजा संकट में भी अंतरराष्ट्रीय कानून के क्रियान्वयन की चुनौती सामने आई है। आईसीसी ने जांच शुरू कर गिरफ्तारी वारंट जारी किए, लेकिन इनके पालन के लिए देशों के सहयोग की कमी बनी हुई है।विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान से जुड़े मौजूदा संकट में भी जवाबदेही का अभाव बना रहने की आशंका है, जिससे यह संघर्ष न केवल मानवीय बल्कि कानूनी दृष्टि से भी जटिल बना हुआ है।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।












