डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में देववृक्ष पद्म विलुप्ति की कगार पर है। धार्मिक महत्व वाले इस पेड़ को लोग बहुत ही पवित्र मानते हैं। अब इस पेड़ की गिनती संरक्षित श्रेणी के वृक्षों में होने लगी है। इस पेड़ के फूल, पत्ते ही नहीं बल्कि छाल भी लाभकारी है। इसके छाल से रंग व दवा का निर्माण किया जाता है। इस प्रकार यह पेड़ मानव के लिए कुदरत का अनोखा उपहार है। इस पेड़ की विशेषता यह है कि पर्वतीय अंचल में जब पौष माह में सभी पेड़ों की पत्तियां गिर जाती हैं व प्रकृति में फूलों की कमी हो जाती है उस दौरान यह पेड़ हरा भरा हो जाता है। इसके वितरीत अन्य सभी पेड़ों में वसंत ऋतु में फूल व पत्ते आते हैं। पौष माह में प्रत्येक रविवार को सूर्य की उपासना इसी पवित्र पेड़ की पत्तियां चढ़ाकर की जाती है। यज्ञोपवीत व जागर तथा बैसी के आयोजन में भी इसका डंठल किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाया जाता है। धार्मिक आयोजनों में बजाए जाने वाले पहाड़ी वाद्य यंत्र इसी पेड़ की टहनियों से बजाए जाते हैं। मानव को शहद जैसी औषधि प्रदान करने वाली मधुमक्खियों के लिए भी यह पेड़ लाभकारी है।
शीतकाल में यह पेड़ उनके लिए भोजन का मुख्य आसरा होता है। इस काल में इस पेड़ के फूल ही उनके आहार का मुख्य आधार होता है। यह पथरी में भी उपयोगी होती हैं यही कारण है कि शहद में कार्तिकी शहद को विशेष लाभकारी माना गया है। इसकी लकड़ी काफी मजबूत होने से यह कृषि यंत्रों के दस्ते वगैरह बनाने के भी काम आता है। मानव के लिए काफी लाभकारी इस पेड़ का वानस्पतिक नाम प्रुन्नस सीरासोइडिस है। यह रोजेसी वंश का पौधा है। आर्द्र ता वाले क्षेत्रों में होने की वजह से इसकी लकड़ी भी चंदन के पेड के समान ही पवित्र मानी जाती है। मवेशियों के लिए इसका चारा काफी पौष्टिक होता है। इसे मवेशी बड़े ही चाव से खाते हैं। मध्य हिमालय में जब कड़ाके की सर्दी बढ़ती है तो पेड़ अपने पत्तों को भी ख़ुद से अलग कर देते है। ख़ुद को बचाने वाले इस मौसम में मध्य हिमालय में उगने वाला पैयाँ का पेड़ है, जिस पर इस जटिल मौसम में भी फूल खिलते हैं। नवम्बर से दिसम्बर तक मध्य हिमालय में पैयाँ का गुलाबी सफ़ेद फूल खूब खिलता हैण् आचार्य मनु ने अपने संस्कृति संबंधी लेखों में कहा है कि पद्म अर्थात् पैयाँ देववृक्ष है। प्रतिकूल मौसम अवस्था में भी पैयाँ का वृक्ष ख़ुशहाल रहता है। जब शीतकाल की जटिल ऋतु में सभी पेड़ अपनी पत्तियाँ तक गिरा देते हैं तब देववृक्ष पैयाँ में पुष्प उगते हैं।
विवाह के मंडप में इसकी लकड़ी का उपयोग वर.वधु के नवजीवन में मजबूती और ख़ुशहाली का प्रतीक है। इस पेड़ के संरक्षण के लिए वन महकमा प्रयासरत है। इसके उन्नयन के लिए 20 प्रतिशत पौधों का रोपण विभाग की नर्सरियों में किया जा रहा है। उत्तराखंड में विलुप्ति के कगार पर जा पहुंचे पद्म वृक्ष को लेकर वन विभाग भी लापरवाह बना हुआ है। पद्म वृक्ष के संरक्षण के लिए नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन ने वर्ष 2012 में कैट प्लान के तहत जोशीमठ क्षेत्र में 10 लाख रुपये खर्च कर एक हजार पौधे रोपने का दावा किया। मगरए एक भी पौधा धरती पर नजर नहीं आया। हैरत देखिए कि अब विभाग पौधों का संरक्षण न होने के पीछे धनराशि की कमी का हवाला दे रहा है।वन विभाग का दावा है कि उसने सीमांत चमोली जिले के अंतर्गत जोशीमठ से लेकर ढाक तक दस किमी क्षेत्र में सड़क के किनारे पद्म के पौधों का रोपण किया था। असल में जब पौधरोपण होना थाए तब पौधों की सुरक्षा के लिए बाहर से डबल ट्री गार्ड भी लगाए जाने थे। बताते हैं कि तब वन विभाग ने पौधे तो रोपेए मगर डबल की जगह सिंगल ट्री गार्ड ही लगाए। जो पौधे रोपे गए थे, उनमें से कुछ को तो मवेशी खा गए और कुछ राहगीरों ने तोड़ डाले। अब इस लापरवाही को छिपाने के लिए नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन धनराशि की कमी का हवाला दे रहा है। पार्क के उप प्रभागीय वनाधिकारी का कहना है कि पौधरोपण के वक्त वन विभाग की सोच थी कि पहले सिंगल और पौधों के बड़े होने पर डबल ट्री गार्ड लगाए जाएं। लेकिन, डबल ट्री गार्ड के लिए अतिरिक्त धनराशि की जरूरत थी, जो उस समय नहीं मिल पाई।