डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज 26 अगस्त, हम उस महान समाज सुधारक और दूरदर्शी व्यक्तित्व को याद करते हैं जिनका जीवन संघर्ष और सेवा का पर्याय है रायबहादुर मुंशी हरिप्रसाद टम्टा।
1887 में अल्मोड़ा में जन्मे टम्टा जी ने अपने जीवन को समाज के वंचित और शोषित वर्गों की आवाज़ बनाने में समर्पित किया। वे भली-भांति जानते थे कि असली स्वतंत्रता तभी मिलेगी जब समाज से जातिगत अन्याय और भेदभाव की जंजीरें टूटेंगी।
1911 में जॉर्ज पंचम के राजतिलक के दौरान उन्हें और उनके मामा को जातिगत आधार पर अपमानित किया गया। यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी। इस अपमान को उन्होंने अपनी ताकत बनाया और शिल्पकार समाज के लिए संघर्ष की राह पर उतर पड़े। 1905 में ‘टम्टा सुधार सभा’ और बाद में ‘कुमाऊं शिल्पकार सभा’ की स्थापना कर उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मनिर्भरता की अलख जगाई।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था समाज को अपमानजनक संबोधन से मुक्ति दिलाना और ‘शिल्पकार’ शब्द को स्थापित करना। 1926 में यह शब्द ब्रिटिश सरकार द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त कर सका, जो उनकी अथक मेहनत का परिणाम था।
मुंशी हरिप्रसाद टम्टा केवल समाज सुधार तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने 1920 में ‘हिल मोटर्स ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना कर उत्तराखंड में परिवहन की नई शुरुआत की और युवाओं को रोजगार के अवसर दिए। 1934 में शुरू किया गया उनका साप्ताहिक पत्र ‘समता’ वंचित समाज की बुलंद आवाज़ बना। उनकी भतीजी लक्ष्मी देवी टम्टा, जो उत्तराखंड की पहली वंचित स्नातक और ‘समता’ की पहली महिला संपादक बनीं, भी इसी संघर्ष यात्रा का हिस्सा थीं।
टम्टा जी का संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी था। 1931 में उन्होंने पूना पैक्ट के समर्थन में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को तार भेजकर दलित समाज के अधिकारों की लड़ाई में अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
23 फरवरी 1960 को उनका देहावसान हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा आज भी जीवित है। उन्होंने दिखाया कि असली बदलाव केवल विरोध से नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की बुनियाद पर खड़े समाज से संभव है।
आज उनके जन्मदिवस पर हम सबको यह संकल्प लेना चाहिए कि समानता, शिक्षा और सम्मान की जो मशाल उन्होंने जलाई, उसे आगे बढ़ाते रहें। रायबहादुर मुंशी हरिप्रसाद टम्टा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक आंदोलन हैं, जो हर पीढ़ी को न्याय और बराबरी की राह दिखाता रहेगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












