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द्रौपदीमाला की महक, इसे दो राज्‍यों ने घोषित किया अपना राज्यपुष्प

13/07/21
in उत्तराखंड
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

द्रौपदी माला जिसे फॉक्स पूंछ आर्किड भी कहा जाता है की एक आर्किड के प्रकार यह है. यह है भारत के असम राज्य को देखते हुए, पुष्प भी है । इस पुष्प, महाराष्ट्र, राज्य, प्रति के रूप में जाना जाता है.औषधीय, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा द्रोपदीमाला फूल उत्तराखंड में खिलने लगा है. महाभारत में द्रोपदी के गजरे पर सजने वाला और मां सीता का बेहद ख़ास यह फूल दुनिया भर में फॉक्सटेल ऑर्किड के नाम से जाना जाता है. फॉक्सटेल ऑर्किड असम व अरुणाचल का राज्य पुष्प भी है.

अपने औषधीय गुणों के कारण फॉक्सटेल ऑर्किड की बाज़ार में इस कदर मांग है कि अरुणाचल प्रदेश में इसकी तस्करी तक होती है.अस्थमा, किडनी स्टोन, गठिया रोड व घाव भरने में द्रोपदीमाला को दवा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. द्रोपदीमाला नाम का यह फूल असम में बेहद लोकप्रिय है. असम ने इसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है. शुभ अवसरों पर किये जाने वाले बीहू नृत्य के समय असम की महिलायें आज भी इसे द्रोपदीमाला को अपने बालों में सजाती हैं. पंश्चिम बंगाल व आसाम में इसे कुप्पु फूल के नाम से जाना जाता है.

द्रोपदीमाला आर्किड प्रजाति का एक फूल है. आर्किड जमीन और पेड़ दोनों पर होता है. आमतौर पर 1500 मीटर ऊंचाई पर द्रोपदीमाला बांज व अन्य पेड़ों पर नजर आता है. असम का बीहू नृत्य दुनियाभर में प्रसिद्ध है। सांस्कृतिक कार्यक्रम से लेकर शुभ अवसर में महिलाएं बीहू नृत्य किया जाता है। मान्यताओं के मुताबिक इस दौरान महिलाएं बालों में इस फूल को जरूर लगाती है। वहां इसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है। वन संरक्षक के मुताबिक वनवास के दौरान भगवान श्रीराम पंचवटी नासिक में रूके थे।

तब सीता मां ने भी इस फूल का इस्तेमाल किया था। जिस वजह से इसे सीतावेणी भी कहा जाता है। इस पौधे पर हर बार फूल खिलते हैं। लेकिन, इस पौधे के अलावा पूरे क्षेत्र में दूसरा पौधा नजर नहीं आया है। इसके बारे में स्थानीय ग्रामीणों को भी कोई जानकारी नहीं है। जबकि, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया व भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम व बंगाल में ये बहुतायत में प्राकृतिक रूप से उगता है। असिस्टेंट प्रोफेसर, उत्तरकाशी का कहना है कि फाक्सटेल आर्किड अधिपादप श्रेणी का पौधा है।

जो अखरोट, बांज और अन्य पेड़ों के तने, शाखाएं, दरारों, कोटरों, छाल आदि में मौजूद मिट्टी में उपज जाते हैं। लेकिन, ये पौधा परजीवी नहीं है। इसका बीज बेहद ही सूक्ष्म होता है, जो कई किलोमीटर तक हवा में ट्रेवल करता है। उत्तरकाशी के मांगली गांव में इस पौधे का बीज हवा से ही पहुंचा होगा। साथ ही अखरोट के पेड़ पर इस पौधे के पनपने के लिए अनुकूल स्थिति मिली होगी। फाक्सटेल आर्किड के पौधे आसानी से पनपते नहीं हैं। इनके लिए अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है।  

हिमालयी राज्यों का पर्यावरण तो इसके अनुकूल है ही, इसके अलावा दक्षिण भारत के राज्य केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र भी इसका व्यवसायिक उत्पादन करते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में इस फ़ॉक्सटेल ऑर्चिड के लिए अनुकूल माहौल वातावरण, पर्यावरण के चलते इसको उगाने के सरकारी प्रयास वन विभाग स्तर पर जारी हैं। उत्तरकाशी जिले के मांगली बरसाली गांव में एक अखरोट के पेड़ के ठूंठ पर इस फूल ने पिछले 10 वर्षों से अपना ‘घरौंदा’ बना रखा है।

इस फूल को कोई प्रवासी पक्षी लाया होगा औऱ बीट (मलत्याग) के माध्यम से इस फूल को यानी अंकुरण में इस पुराने सड़ रहे अखरोट के पेड़ पर उपयुक्त और अनुकूल मिट्टी माहौल और वातावरण मिलने से यह यहां जम गया होगा। यह फ़ॉक्सटेल ऑर्चिड पुष्प अधिपादप श्रेणी में है। अधिपादप वे पौधे होते हैं, जो आश्रय के लिए वृक्षों पर निर्भर होते हैं लेकिन परजीवी नहीं होते। ये वृक्षों के तने, शाखाएं, दरारों, कोटरों, छाल आदि में उपस्थित मिट्टी में उपज जाते हैं व उसी में अपनी जड़ें चिपकाकर रखते हैं। धार्मिक व औषधीय महत्व से अंजान होने की वजह से उत्तराखंड में इसके संरक्षण का प्रयास नहीं करते हैं. 

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