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यात्रा मार्ग की शोभा बढ़ाने वाले पीपड़ के पेड़ खत्म

11/03/19
in उत्तराखंड
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बद्रीनाथ एवं केदारनाथ हाईवे को विकसित करने के लिए भगवान कृष्ण के प्रिय वृक्ष पीपल के पेड़ों की बलि दी जा रही है। अब तक अनगिनत पीपल के पेड़ों को काटा जा चुका है। चारधाम यात्रा के दौरान जिन पेड़ों के नीचे तीर्थयात्री और साधु-संत कुछ देर विश्राम कर आगे की यात्रा को निकलते थे, अब उन पेड़ों का अस्तित्व खत्म हो चुका है।

आॅल वेदर रोड़ निर्माण से राष्ट्रीय राजमार्गों से सटे पीपल के पेड़ों को जड़ से ही समाप्त कर लिया गया है और अब तीर्थयात्रियों को पीपड़ के पेड़ों के दर्शन नहीं हो सकेंगे। पीपल के पेड़ों को काटे जाने पर पर्यावरणविद एवं स्थानीय जनता ने आपत्ति जताई है। उनकी माने तो यह धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ है, जिसका नुकसान भविष्य में झेलना पड़ सकता है। 

हजारों सालों से तीर्थयात्रियों और साधु संतों को छाया देने वाले पीपल के वृक्ष चारधाम सड़क परियोजना की भेंट चढ़ चुके हैं। आॅल वेदर सड़क निर्माण में पीपल के पेड़ों का भारी दोहन किया गया है। यदि सरकार सही से नीति बनाती और पौराणिक मान्यताओं को समझती तो इन पेड़ों का संरक्षण किया जा सकता था, मगर ऐसा नहीं किया गया।

पीपल के पेड़ों का अंधाधुंध कटान गया। पेड़ों के कटने के बाद अब पर्यावरणविद इसे धार्मिक ग्रंथों से जोड़कर देख रहे हैं। स्थानीय लोगों ने भी इसके लिए सरकार को कोसना शुरू कर दिया है। बद्रीनाथ एवं केदारनाथ हाईवे पर चारधाम विकास परियोजना के तहत आॅल वेदर रोड़ का कार्य चल रहा है।

राजमार्ग के चैड़ीकरण में अनगिनत पीपल के पेड़ों का कटान अब तक हो चुका है। बद्रीनाथ हाईवे पर गुलाबराय के आरटीओ कार्यालय के पास, तिलणी, सुमेरपुर, रतूड़ा व केदारनाथ हाईवे के सिल्ली, चन्द्रापुरी, कुंड, फाटा सहित अन्य जगहों पर हजारों सालों से पीपल के पेड़ यात्रा मार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे, मगर अब इन पेड़ों का दोहन हो चुका है।

ब्यास दीपक नौटियाल एवं बलवंत सिंह बुटोला ने कहा कि हिन्दू मान्यताओं में प्रकृति को अलौकिक दर्जा दिया गया है। यही वजह है कि किसी ना किसी रूप में झरने, पहाड़, नदियां, पेड-पौधे आदि वनस्पति को आस्था के केन्द्र में रखा जाता है। पेड़-पौधों की बात करें तो इन्हें विशेषतौर पूजनीय समझा जाता है, जैसे तुलसी के पत्तों को अत्याधिक पूजनीय मानकर उनका प्रयोग पवित्र कामों में किया जाता है। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं में पीपल के पेड़ को भी काफी महत्वपूर्ण माना गया है। इसे एक देव वृक्ष का स्थान देकर यह उल्लिखित है कि पीपल के वृक्ष के भीतर देवताओं का वास होता है। गीता में तो भगवान कृष्ण ने पीपल को स्वयं अपना ही स्वरूप बताया है।

उन्होंने बताया कि स्कन्दपुराण में पीपल की विशेषता और उसके धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए यह कहा गया है कि पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत देव निवास करते हैं। इस पेड़ को श्रद्धा से प्रणाम करने से सभी देवता प्रसन्न होते हैं। 

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