डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के सीमांत जिले चमोली में एक स्थान ऐसा भी है जो गढ़वाल और कुमाऊँ को तो जोड़ता ही है, साथ ही सदियों से देशी विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद भी रहा है, यहां के लोगों को उत्तर प्रदेश के जमाने से ही आस थी कि इस क्षेत्र को सरकार पर्यटन नगरी की तर्ज पर विकसित करेगी। बहरहाल उत्तर प्रदेश से विभाजित होकर उत्तराखंड का उदय हुआ तो स्थानीयों की आस और प्रबल हुई, राज्य गठन के साथ ही आशा की किरण भी जगी कि शायद उत्तराखंड सरकार अब इस नगरी को पर्यटन के मानचित्र पर पर्यटकों की आवाजाही से गुलजार कर देगी, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि राज्य स्थापना के 20 वर्ष होने को आये हैं लेकिन सरकारों का ध्यान अब भी पर्यटन की अपार संभावनाएं लिए इस क्षेत्र की ओर नही पड़ा।
इस क्षेत्र की सुंदरता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि गुलाम भारत के वायसराय रहे लार्ड कर्जन ने भी यहां की सुंदरता और रमणीयता से प्रभावित होकर यहां से लार्ड कर्जन ट्रेक की स्थापना की थी अंग्रेजों के मन को मोह लेने वाला ग्वालदम समुद्र तल से लगभग 1940 मीटर, 6360फ़ीट की ऊंचाई पर है। हिमालयी चोटियों नंदा देवी, त्रिशूल, नंदा घुंघुटी के आकर्षक और मनमोहक दृश्य दिखाने वाला ग्वालदम अब सरकारों की उपेक्षा के चलते पर्यटकों के लिए तरस रहा है। कभी जमाने में आलू और सेब के व्यापार के लिए मंडी इसी ग्वालदम में हुआ करती थी। पर्यावरणविद और पदम श्री से विभूषित कल्याण सिंह रावत ने इसी पर्यटन नगरी से ऐतिहासिक मैती आंदोलन की शुरुआत की थी, इसी ग्वालदम से होकर रूपकुंड और तपोवन तक के लिए ब्रिटिश वायसराय लार्ड कर्जन ने 200 किमी लम्बे लार्ड कर्जन ट्रेक का निर्माण करवाया था, लेकिन सरकारों की अनदेखी के चलते इस साहसिक यात्रा रुट का भी जीर्णोद्धार नही हो सका। ग्वालदम की सुंदरता अंग्रेजी शासकों को इतनी भायी कि उन्होंने 1890 में ही यहां सरकारी गेस्ट हाउस का निर्माण करवाया था, जो वर्तमान में वन विभाग की देखरेख में है, गेस्ट हाउस के समीप बनी प्राकृतिक झील पर्यटकों को एक अलग ही रोमांच का अनुभव कराती है।
ग्वालदम प्रसिद्ध ऐतिहासिक नंदा देवी राजजात यात्रा का भी मुख्यमार्ग है, कुमाऊँ मार्ग से आने वाले देशी विदेशी पर्यटक ग्वालदम की सुंदरता को निहारने के बाद ही वाण, वेदनी, रूपकुंड, होमकुंड के सौंदर्य का अनुभव करते हैं। यहां से लगभग 7 किमी की दूरी पर बिनातोली से 3 किमी की पैदल दूरी पर देवी भगवती का प्राचीन और ऐतिहासिक बधाणगढ़ी मंदिर है जो गढ़वाल और कुमाऊँ के लोगो की आस्था का केंद्र है यहां पहुंचने के बाद श्रद्धालु भक्ति के साथ साथ साहसिक यात्रा, पर्यटन, पुरातन संस्कृति और यहां के यात्रा वृतांत का एक अलग ही अनुभव महसूस करते हैं, लेकिन पिछली सरकारो में पर्यटन नगरी ग्वालदम को टूरिस्ट हब बनाने की कवायद अब महज फाइलों में ही भटकती सी रह गई है। इको पार्क, झीलों का सौंदर्यीकरण, लार्ड कर्जन ट्रेक का सुधारीकरण सौंदर्यीकरण, ग्वालदम नगर का सौंदर्यीकरण करके सरकार चाहे तो फिर से ग्वालदम देशी विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद बन सकता है। ग्वालदम के लोगों की वो आस जो उन्हें उम्मीद दिलाता है कि नेता जी ग्वालदम को टूरिस्ट डेस्टिनेशन की तर्ज पर विकसित करेंगे, शीत ऋतु में ग्वालदम की वादियां सफेद बर्फ की चादर से ढकी होती हैं।
इस क्षेत्र को विंटर डेस्टिनेशन की तर्ज पर भी विकसित किया जा सकता है लेकिन सूबे की सरकार पर्यटन की अपार संभावनाएं लिए इस क्षेत्र को एक बार करीब से देखे तो सही एदरसल पर्यटन की अपार संभावनाएं लिए उत्तराखंड में पर्यटन के क्षेत्र में विकास का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी अंग्रेजो की पसंद रहा ग्वालदम पर्यटन के नक्शे पर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है एयहां के बाशिंदों को अब भी सरकार से आस है कि सरकार विंटर डेस्टिनेशन की तर्ज पर यहां का विकास करें, ताकि ग्वालदम को टूरिस्ट हब बनाने की कवायद को अमलीजामा पहनाया जा सके देवभूमि उत्तराखंड भारत का एक बेहद खास पहाड़ी राज्य है, जो अपने प्राकृतिक आकर्षणों से विश्व भर के सैलानियों को आकर्षित करता है। आप यहां कुदरत के अद्भुत नजारों को देखने के साथ.साथ उसे महसूस भी कर सकते हैं। आत्मिक और मानसिक शांति एक बहुत बड़ा स्रोत है उत्तराखंड।
घने जंगल, नदी, झील, जलप्रपात, पहाड़ी बर्फीली चोटियां इस राज्य की मुख्य विशेषता हैं। यह राज्य न सिर्फ प्राकृतिक बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी काफी ज्यादा मायने रखता है। पर्यटन स्थलों का एक बहुत बड़ा भंडार इस राज्य में मौजूद है, जो सैलानियों को आनंदित करने के साथ.साथ काफी ज्यादा रोमांचित भी करते हैं।
लार्ड कर्जन वर्ष 1899 से 1905 तक ब्रिटिश भारत के वायसराय रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल में संपूर्ण भारत का भ्रमण किया। वे उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र की पैदल यात्रा करना चाहते थे। उनके प्रस्तावित दौरे को देखते हुए अल्मोड़ा से तपोवन तक 200 किलोमीटर लंबा पैदल ट्रैक का निर्माण किया गया। यह ट्रैक कई जगहों पर दस हजार फीट की ऊंचाई से होकर गुजरता है। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने किन्हीं कारणों से लार्ड कर्जन को वापस बुला लिया था, जिस कारण वे इस रूट पर नहीं आ पाए थे। साहसिक पर्यटन की दृष्टि से इस ट्रैक को आज भी लार्ड कर्जन ट्रैक के रुप में जाना जाता है। इनको विकसित करने के लिये सभी को सामूहिक प्रयास करने होगें।











