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उत्तराखंड की सदियों पुरानी परंपरा भिटौली

06/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड राज्य में कुमाऊं-गढवाल मण्डल के पहाड़ी क्षेत्र अपनी रंगीली लोक परम्पराओं और त्यौहारों के लिये शताब्दियों से प्रसिद्ध हैं. यहाँ प्रचलित कई ऐसे तीज-त्यौहार हैं जो केवल उत्तराखण्ड में ही मनाये जाते है.वही इसे बचाए रखने का बीड़ा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र और यहाँ पर रहने वाले पहाड़ी लोगों ने उठाया है इन्होने आज भी अपनी परंपरा और रीति- रिवाजों को जिन्दा रखा है.उत्तराखण्ड की ऐसी ही एक विशिष्ट परम्परा है “भिटौली”. उत्तराखण्ड में चैत का पूरा महीना भिटोली के महीने के तौर पर मनाया जाता है. स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी के इस गाने मे भिटोला महीना के बारे मे वर्णन है.
“”बाटी लागी बारात चेली ,बैठ डोली मे,
बाबु की लाडली चेली,बैठ डोली मे
तेरो बाजू भिटोयी आला, बैठ डोली मे

खासकर यह पर्व कुमाऊँ तथा गढ़वाल में मनाया जाता हैं. इस महीने विवाहित लड़की को भिटोली देने उसका भाई या माता- पिता जाते हैं. चैत के महीने में बेटी को भिटोली का बेसब्री से इंतजार रहता हैं. पहाड़ों पर चैत के महीने में एक चिड़िया घुई – घुई बोलती है. इसे घुघुती कहते हैं.घुघुती का उल्लेख पहाड़ी दंतकथाएं और लोक गीत में भी पाया जाता हैं. विवाहित बहनों को चैत का महिना आते ही अपने मायके से आने वाली ‘भिटौली’ की सौगात का इंतजार रहने लगता है. इस इन्तजार को लोक गायकों ने लोक गीतों के माध्यम से भी व्यक्त किया है. “न बासा घुघुती चैत की, याद ऐ जांछी मिकें मैत की”.देवभूमि उत्तराखंड को लोक संस्कृति तथा लोक पर्वों के लिए जाना जाता है. उत्तराखंड में फूलदेई, घुघुतिया संक्रांति जैसे कई महत्वपूर्ण पर्व मनाये जाते हैं. इनमें से ही एक और लोक संस्कृति पर आधारित, पवित्र त्यौहार भिटौली भी है. यह उत्तराखंड की संस्कृति की वह मिठास है, जो कभी फीकी नहीं पड़नी चाहिए. ”ना बासा घुघुती चैत की, याद आ जैछे मैके मैते की.\” ये पहाड़ी गीत विशेष रूप से भिटोली के लिये गाया जाता है. ये बोल आज भी महिलाओं को भाव विभोर कर देते हैं. ना जाने पहाड़ के कितने घरों में आज भी आंसू पोंछते हुए पकवान बनते हैं. हर किसी विवाहित लड़की को इस महीने में अपनी अपनी भिटोली का बेसब्री से इंतजार रहता है.ये एक पर्व एक परंपरा की तरह चैत के महीने में मनाया जाता है. हर विवाहिता इस पर्व का बेसब्री से इंतजार करती है. भिटौली का अर्थ होता है भेंट. यानी लड़की की शादी कितने ही संपन्न परिवार में हुई हो लेकिन उसे अपने मायके से आने वाली भिटौली का इंतजार रहता ही है. भिटौली पर्व उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों ही जगह मनाया जाता है. पर्व पर विवाहित महिला को भिटौली देने उसका भाई या माता-पिता बेटी के ससुराल आते हैं.उत्तराखंड में वैसे तो कई त्योहार मनाए जाते हैं. जिसमें बसंत पंचमी, फूलदेई, घुघुती, मकर सक्रांति और भी कई सांस्कृतिक लोक पर्व उत्तराखंड में बड़े धूमधाम से बनाए जाते हैं. उसी चैत महीने में भिटौली का त्योहार भी मनाया जाता है. यह उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के दोनों क्षेत्रों में मनाया जाता है. बताया जाता है कि इस महीने में विवाहिता को भिटौली देने उसका भाई या माता-पिता उसके ससुराल आते हैं. पूरे साल इस भिटौली का इंतजार रहता है कि हमारे मायके से कपड़े, मिठाइयां, पकवान इत्यादि लेकर हमारा भाई या माता-पिता पहुंचेंगे. उत्तराखंड में भिटौला पर्व पिछले कई सालों से मनाया जा रहा है. उत्तराखंड में ऐसा माना जाता है कि शादी के बाद बेटियों की खुशहाली और कुशलक्षेम जानने के लिए यह एक अवसर होता है. लोक कथाओं के अनुसार, माता-पिता या भाई जब भिटौली लेकर बहन या बेटी के घर जाते हैं, तो वह न सिर्फ उपहार बल्कि अपार स्नेह भी साथ लाते हैं. यह पर्व चैत्र माह की संक्रांति से शुरू होकर पूरे महीने चलता है. ग्रामीण क्षेत्रों में भिटौली देने की परंपरा आज भी जीवंत है. वहां अब भी पिता या भाई खुद बहन के घर जाते हैं, जिससे पारिवारिक प्रेम और आत्मीयता बरकरार रहती है. कई परिवार आज भी घर के बने गहथ (कुल्थ) के पिठ्ठे, गुड़, और स्थानीय मिठाइयां लेकर बहन-बेटी के घर जाते हैं. नैनीताल निवासी बताती हैं कि भिटौली पारंपरिक रूप से कुमाऊं में बेटियों और बहनों को दी जाती है. उन्होंने कहा कि पहले के समय में मायके पक्ष के लोग एक डालिया में पकवान और कपड़े रखकर मीलों पैदल चलकर अपनी बेटी और बहन के घर आते थे. भिटौली का इंतजार भी बेटियों को काफी रहता था. वहीं बदले समय के साथ ही भिटौली देने की परंपरा में बदलाव आया है, हालांकि आज भी उनके पास भिटौली उनके मायके पक्ष के लोग देने आते हैं और भिटौली वाले दिन घर में पकवान बनाए जाते हैं. उन्हें भिटौली का इंतजार सालभर रहता है. बेशक समय के साथ परंपराओं में बदलाव होता है, लेकिन भिटौली जैसी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखना बेहद जरूरी है. यह केवल उपहार देने की परंपरा नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों को जोड़ने का एक जरिया भी है. यदि इसे आधुनिकता के साथ संतुलित रूप से निभाया जाए, तो यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक भी बनी रह सकती है. इसलिए, चाहे डिजिटल माध्यम से या पारंपरिक रूप में, भिटौली का मकसद सिर्फ बहन-बेटी का हाल-चाल जानना और उन्हें स्नेह देना है. आज समय बदलने के साथ-साथ इस परंपरा में भी काफी कुछ बदलाव आ चुका है. आधुनिक युग में अब ये औपचारिकता मात्र रह गयी है. हलवा, पुवे, पूरी, खीर, खजूरे जैसे व्यंजन बनने कम हो गये हैं. अब फ़ोन पर बात करके और गूगल पे, फ़ोन पे से शादीशुदा बहन-बेटियों को रुपये भेजकर औपचारिकता पूरी हो रही है ऐसे त्योहारों को मनाकर कुमाऊं ने न केवल अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित किया है, बल्कि उन कई विवाहित महिलाओं के परिवारों को भी एकजुट किया है, जो नम आंखों से अपने मायके से विदा हुई हैं। इस तरह, यह त्योहार केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के बीच एकता को दर्शाता है। हालांकि इंटरनेट और मोबाइल फोन ने दूरियों को कम कर दिया है, फिर भी एक विवाहित महिला की भावनाएं हमेशा अपने परिवार से जुड़ी रहती हैं, जिन्हें कोई मोबाइल फोन या कॉल व्यक्त नहीं कर सकता। और यही कारण है कि भीतौली त्योहार उत्तराखंड के लोगों के बीच इतना लोकप्रिय है। शहरी क्षेत्रों में, भाई अपनी बहनों को भीतौली के नाम पर मनी ऑर्डर भेजते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भीतौली आज भी विवाहित महिलाओं के लिए अपने परिवार से मिलने और उनका प्यार और आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर है। समय के साथ बदलती तकनीक ने उत्तराखंड की इस प्राचीन परंपरा को डिजिटल युग में ढाल दिया है. अब बहनों को भिटौली के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता क्योंकि ऑनलाइन भुगतान से यह परंपरा और भी सुगम हो गई है. डिजिटल माध्यम ने दूरियों को भले ही भौतिक रूप से नहीं मिटाया हो लेकिन भावनात्मक रूप से भाई-बहन को जोड़े रखने में मदद जरूर की है. भिटौली की ऐसी यादों को संजोने के लिए भिटौली मनाती उन बेटियों माँओं भाइयों को हृदय से नमन करने को मन होता है जो उन लोक त्यौहारों परम्पराओं उत्सवों को वर्तमान तक जीवित रख चिरायु बनाए हुए हैं। धन्य है यह धरा जिसने हमें प्रेम के ऐसे अंकुर बोने के संस्कार दिए हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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