डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड को लंबे समय तक शानदार मौसम, बर्फीले पहाड़ों, हरी-भरी वादियों और चारधाम जैसी प्राचीन तीर्थ यात्राओं के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन आज की देवभूमि सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है. बीते 25 वर्षों में उत्तराखंड ने विकास की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसमें श्रद्धा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर साथ-साथ चलते दिखाई देते हैं. जो एक तरह से दूसरे राज्यों के लिए भी मिसाल बन गया है. पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. दरअसल अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड ने धीरे-धीरे उन चुनौतियों को पार किया, जो दुर्गम भूगोल और सीमित संसाधनों के कारण विकास की राह में बाधा बनती थीं. आज हालात बदल रहे हैं. भारतवर्ष की टीम ने अपनी रिपोर्ट में जगमगाते शहर, चौड़ी और मजबूत सड़कें, नए हाईवे, नदियों पर आधुनिक पुल, पहाड़ों के भीतर बनती सुरंगें और रेल नेटवर्क के बारे में बताया है. ये सब विकास अब नए उत्तराखंड की पहचान बन चुके हैं.ऋषिकेश का प्री वेडिंग शूट वाला पुल के बारे में बताया है. इस पुल पर कपल अब वेडिंग शूट कराते हैं, जो पर्यटकों को बहुत भाता है. इसके आसपास कई नई सड़कें भी बनाई गई हैं जो यहां पहुंचना आसान बनाते हैं. सरकार की महत्वाकांक्षी चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना को उत्तराखंड की सबसे योजनाओं में गिना जा रहा है. इस परियोजना के तहत लैंडस्लाइड जोन में टनल, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम और चौड़ी सड़कें तैयार की जा रही हैं, जिससे हर मौसम में सुरक्षित यात्रा संभव हो सके. सरकार का दावा है कि इससे न सिर्फ चारधाम यात्रियों को सुविधा मिलेगी, बल्कि भविष्य में यह सड़क सैन्य जरूरतों के लिए भी अहम साबित होगी. समय की भी बचत होगी. सरकार का दावा है कि इन सड़कों को सैन्य जरूरतों के हिसाब से ही तैयार किया जा रहा है, यही वजह है कि इसे बनने में समय लग रहा है. प्रधानमंत्री के सहयोग से उनके नेतृत्व में चारधाम ऑल वेदर रोड, बद्रीनाथ धाम का मास्टर प्लान, केदारनाथ धाम का नवनिर्माण- पुनर्निर्माण का कार्य किया है. हेमकुंड साहब रोपवे का शिलान्यास हो चुका है, कार्य प्रारंभ हो चुका है. केदारनाथ जाने के लिए अनेक हैली सेवाएं शुरू हुई हैं. देश के अंतिम गांव जिसको कहा जाता था माणा जैसा गांव, उसको पहले गांव की संज्ञा दी गई. सीएम ने कहा कि पीएम मोदी आदि कैलाश जोलिंगकोंग गुंजी सीमांत क्षेत्रों में जाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं. ये सभी कदम देवभूमि को नई दिशा दे रहे हैं.’ इसके अलावा टनकपुर-बागेश्वर लाइन के जरिए भी पहाड़ों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की ऐतिहासिक तैयारी है. हालांकि टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का अभी सिर्फ सर्वे और डीपीआर का काम पूरा हुआ है. सड़कों, रेल लाइनों और सुरंगों के निर्माण के साथ ही धार्मिक शहरों के कायाकल्प के लिए भी इन्फ्रा-स्ट्रक्चर को काफी मजबूत किया गया है. इसके चलते बाहर से आने वाले पर्यटकों को काफी आसानी हुई है. सरकार का दावा है कि आने वाले दिनों में उत्तराखंड की रेल परियोजना को दूसरे इलाकों में भी फैलाया जाएगा. सरकार ने हरिद्वार के कई विकास कार्य किए है, जिसकी वजह से यह धार्मिक नगरी अब पूरी तरह से बदली हुई दिखती है. सरकार ने हरिद्वार में गंगा रिवर-फ्रंट का सौंदर्यीकरण, हरकी पौड़ी क्षेत्र का पुनर्विकास और पुराने पुलों को नया रूप देना का काम किया है. ये सब सिटी री-डेवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा हैं. बाहर से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक अब बेहतर सुविधाओं का अनुभव कर रहे हैं. टिहरी का डोबरा चांठी पुल की गिनती एशिया के लंबे सस्पेंशन ब्रिज में होती है. इस पुल से टिहरी शहर को सीधे जोड़कर दूरी और समय दोनों को काफी कम कर दिया. एक तरह से टिहरी झील पर बना डोबरा-चांठी सस्पेंशन ब्रिज नए उत्तराखंड की पहचान बन चुका है. इस पुल ने न सिर्फ दूरी और समय को कम किया है, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा दिया है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, अब रोजमर्रा की आवाजाही कहीं ज्यादा आसान हो गई है.आस्था की इस धरती पर अब विकास की मजबूत नींव दिख रही है जहां ध्यान और ज्ञान की परंपरा के साथ विज्ञान और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का संगम उत्तराखंड को नई पहचान दे रहा है. उत्तराखंड सरकार का लक्ष्य केंद्रीय और राज्य की योजनाओं के जरिए देवभूमि को तेजी से आगे बढ़ते राज्यों में शामिल करना है. ये मकसद काफी हद तक पूरा हो चुका है. लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. चारधाम ऑल-वेदर रोड परियोजना, जो उत्तराखंड में यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ को हर मौसम में जोड़ने हेतु बनाई जा रही है, अब गंभीर पर्यावरणीय चेतावनियों के घेरे में आ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ पैनल के दो सदस्यों ने भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन में इस परियोजना के वर्तमान स्वरूप को हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए विनाशकारी बताया है। चारधाम जैसी विकास परियोजनाएँ, जहाँ एक ओर तीर्थयात्रियों की सुविधा और सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं, वहीं दूसरी ओर यदि पर्यावरणीय दृष्टिकोण को दरकिनार किया जाए तो यह क्षेत्र के लिए विध्वंसकारी सिद्ध हो सकती हैं। ऐसे में स्थायित्व और पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखते हुए विकास ही एकमात्र सही रास्ता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












