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उत्तराखंड में जैविक खेती में बकैन निभा साकता है अहम भूमिका

05/12/19
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज उत्तराखण्ड प्रदेश में गढवाल तथा कुमाऊं क्षेत्र में सब्जी तथा फलों का उत्पादन व्यवसायिक रूप से किया जाता है तथा कृषि रसायनों का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है जो पर्यावरण के साथ.साथ मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव डालते हैं। उत्तराखण्ड में तो कई स्थानों पर स्थानीय काश्तकारों द्वारा नेपालियों को किराये पर खेत सब्जी उगाने के लिए दिये जाते है, जो न तो खेत का रखरखाव करते है और न ही कृषि रसायनों के प्रयोग के बारे में जानकारी रखते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अन्धाधुन्ध रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इस संदर्भ में प्राकृतिक कीटनाशक बकैन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है क्योंकि कुछ पौधों में प्राकृतिक रूप से ऐसे रसायनिक घटक पाये जाते हैं, जिनमें कीटनाशक तथा औषधीय गुण भी होते हैं जो पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं होते हैं।
धालीवाल 1996 के एक अध्ययन के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में लगभग 3,08,000 पौधों की प्रजातियां पायी जाती है, जिनमे से 189 पादप कुल तथा 2400 पादप प्रजातियों में प्राकृतिक रूप से कीटनाशक, फॅफूदनाशक व कई अन्य गुण पाये जाते हैं। सर्वाधिक कीटनाशक गुणों वाले पौधे में पाये जाते है, जिसमें नीम तथा बकैन भी सम्मिलित है। कुछ महत्वपूर्ण पादप कुलों में पाये जाने वाले कीटनाशक पौधों है, से अधिक पौधों में कीटनाशक गुण पाये जाते है। कीटनाशक गुणों का मतलब केवल तुरंत मार कर समाप्त कर देना ही नहीं अपितु पौधों में मौजूद रासायनिक घटकों द्वारा कीटों की खाने की क्षमता को रोकना, अण्डे देने की क्षमता को रोकना तथा फसलों से दूर भगाने के साथ.साथ कीटों की अपरिपक्व अवस्थाओं को भी नष्ट व कम कर देना भी है। कीटनाशक गुणों के साथ.साथ आयुर्वेदिक तथा यूनानी औषधियों के निर्माण में भी एक अवयव के रूप में प्रयुक्त होता है क्योंकि इसमें एण्टीऑक्सीडेंट, एनालजैसिक, एण्टीहाईपरटेंसिब, एण्टीडाइरल, एण्टीडाइबैटिक गुण भी पाये जाते है। इसकी छाल अतिसार, बुखार, दर्द, उल्टी, पाइल्स, अल्सर तथा तना अस्थमा रोग निवारण में प्रयुक्त होता है। इसकी जड़ तथा जड़ की छाल स्वाद में तो कडवी होती है, परन्तु यह मलेरिया तथा अतिसार निवारण में सक्षम होती है।
कई अध्ययनों में यह भी बताया गया कि इसके सूखे फलों की छाल मधुमेह निवारण के लिए नीम की तरह ही उपयुक्त पायी जाती है तथा कई अध्ययनों में इसकों पेट को साफ करने वाले टानिक में एक अव्यव के रूप में मिलाया जाना भी बताया गया है तथा इसका तेल चर्म रोग निवारण में भी प्रयुक्त होता है। इसको कुछ बीमारियों के निवारण तथा इसकी पत्तियों को चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भण्डारित अनाजों में इसकी पत्तियों को पारम्परिक कीटनाशक के रूप में मिलाया जाता है। विश्व भर में यदि नीम के गुणों से किसी की तुलना की जाती है तो यह बकैन ही है। आज विश्व बाजार में प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में नीम आधारित असंख्य उत्पाद मौजूद है जिनसे करोडों का कारोबार संचालित होता है। उत्तराखण्ड में तो नीम तराई क्षेत्रों के सिवाय पहाड़ो में नहीं होता है, पहाडों में तो केवल बकैन ही पाया जाता है और नीम तथा बकैन की औषधीय एवं प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में लगभग एक जैसी गुणवत्ता है।
भारत के नीम प्रतिवर्ष लगभग 35 लाख टन मींगी उत्पन्न्न करते हैं। इससे लगभग 7 लाख टन तेल निकाला जा सकता है। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में वार्षिक उत्पादन लगभग 1.5 लाख टन मात्र था। प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा को बढ़ाने के लिए, खादी और ग्रामोद्योग आयोग केवीआईसी ने पिछले दो दशकों के दौरान नीम के फल और बीजों के प्रसंस्करण के विभिन्न्न पहलुओं का मार्ग प्रशस्त किया है। नीम सहित वृक्षों पर लगने वाले अधिकांश तिलहनों के मामले में देखने में आई मुख्य कठिनाई यह है कि नीम के फलों को नम मौसम में तोड़ा जाना होता है। सुखाने की सुविधा स्थानीय रूप से उपलब्ध न होने की स्थिति में, फल और बीज तेजी से खराब होने लगते हैं और एफ्लोटोक्सिन से ग्रस्त हो जाते हैं। आदर्श रूप में, फलों का गूदा अविलंब निकाल लिया जाना चाहिए और बीजों को पूरी तरह से सुखा लिया जाना चाहिए। केवीआईसी ने देश के दूर.दराज के भागों में भी नीम के उत्पादों का गूदा निकालने, सुखाने और छिलका उतारने की सरल विधियों को लोकप्रिय बना दिया है। भारत में नीम के बीजों के बारे में कई एजेंसियों ने अनुमान लगाया है। प्रमुख नीम बीज बाजारों में स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा किए गए यादृच्छिक सर्वेक्षण के अनुसार, 1996 के दौरान बेचे गए नीम के बीजों की मात्रा 5.5 लाख टन थी और कुल 137 करोड़ रुपए था। यदि उत्तराखण्ड के पहाडी क्षेत्रों में बकैन को नीम की तरह ही बंजर व जंगलों में उत्पादित कर इसमें मौजूद रसायनिक घटकों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर इससे उत्पादित उत्पादों को नीम की तरह ही व्यवसायिक रूप से तैयार किया जाय तो यह आर्थिकी, रोजगार तथा प्राकृतिक कीटनाशक और औषधी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है जिससे पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य दोनों को ही लाभ होगा भारत में प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है।
नीम से छोटा एवं अचिरस्थाई होता है। इसके पत्ते कड़वे नीम के समान तथा आकार में कुछ बड़े होते हैं। बकाइन की लकड़ी इमारती कामों के लिए बहुत उपयोगी होता है। यह छायादार पेड़ होता है। इसके फल भी कड़वे नीम के फल के समान होते हैं। कृषि को बढ़ावा देने के लिए भारी.भरकम महकमे के साथ तमाम योजनाएं भी हैंए लेकिन नहीं है तो सूबे में कृषि के विकास की सोच और उस पर अमल करने की रणनीति। खैर! अब भी वक्त है। सरकार को खेती की दशा सुधारने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार कर इसे धरातल पर उतारना होगा। रोजगार से जोड़े तो अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य फसल उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है।

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