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पहाड़ी गाय के घी लाभकारी एवं उत्तम है

10/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय पुराणों से लेकर वर्तमान भारतीय संस्कृति में घी का महत्व जन्म से मरण तक सर्वदा है। भारत के अलावा घी का उपयोग बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका तथा पाकिस्तान में अधिक किया जाता है। विश्वभर में भारत देश घी का सर्वाेच्च उत्पाद देश है तथा कुल उत्पादित घी का लगभग आधे भाग से भी अधिक भाग भारत देश में ही उपयोग किया जाता है। पूरे भारत देश में कुल घी का लगभग 52 प्रतिशत उत्तर भारत में, 18 प्रतिशत पश्चिमी भारत में, 21 प्रतिशत पूर्वी भारत में तथा 10 प्रतिशत दक्षिण भारत में उपयोग किया जाता है। घी की अत्याधिक मांग तथा उपयोगिता को देखते हुए घी का अधिकांश निर्माण भैंस के दूध से किया जाता है जबकि आयुर्वेद तथा पुराणों के अनुसार गाय के घी को अधिक उत्तम माना जाता है। गाय का घी भैंस के घी की तुलना में कम वसा युक्त होता है एवं शरीर में आसानी से पच जाता है। बच्चों तथा शारीरिक रूप से कमजोर हेतु गाय के घी को लाभकारी एवं उत्तम माना गया है। घी का आविष्कार प्राचीन काल में तब हो गया था जब वर्तमान की तरह रेफ्रिजरेटर जैसे आधुनिक उपकरण नहीं थे। घी का आविष्कार दूध को लम्बे समय तक बचाये रखने के लिये किया गया क्योंकि दूध से बनने वाला घी ही एक ऐसा उत्पाद है जिसको वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।घी को हिंदुओं के घरेलू रसोई में खाना पकाने में, खाद्य पदार्थों और रोटी पर गार्निशिंग के रूप में, पारंपरिक मिठाइयां बनाने और कई धार्मिक संस्कारों व अनुष्ठानों में विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है। प्राचीनतम संस्कृत टेक्स्ट ऋग्वेद में लगभग 1500 ई. पू. आर्य लोगों द्वारा सीरियल ग्रेन्स को घी में भूनकर उपयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है घी के अतिरिक्त अन्य किसी वसा युक्त पदार्थ का उपयोग भोजन बनाने में हुआ हो प्रामाणिक तौर पे नहीं कहा जा सकता।आयुर्वेद में घी को समस्त लिपिड पदार्थों के मध्य ‘सर्वश्रेष्ठ’ वर्णित किया गया है। आयुर्वेदिक अभ्यास में व्यापक रूप से घी का प्रयोग खासकर अपक्षयी (डीजेनेरेटिव), पुरानी (क्रोनिक) और गहरे बैठे रोगों (डीप सीटेड डिजीज) में किया जाता है। इसे आहार में आंतरिक उपयोग या सहायक दवा के रूप में, ड्रग पोटेंसी को बढ़ाने में भी सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। घी औषधि के रूप में या किसी भी दवा के निष्कर्षण, अवशोषण और असिमिलेशन के लिए एक एडजुवेंट के रूप में प्रयोग किया जाता है। भोजन या दवाओं में उपस्थित, लिपिड में घुलनशील विटामिन या अन्य सक्रिय प्रिंसिपल कंपाउंड्स के अवशोषण के लिए इसे वाहक मीडिया के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वसा में घुलनशील विटामिन्स खासकर विटामिन ई (जो धमनियों के इंडोथेलिअल क्षेत्र में मौजूद एलडीएल के ऑक्सीडेशन को रोकने में एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करता है), के स्तर को बढ़ाने में भी घी सहायक है और इस प्रकार एथेरोस्क्लेरोसिस और इसके परिणामस्वरूप हृदयाघात को रोकने में भी सहायक है। आयुर्वेद ने गाय के घी को खाद्य वसा के रूप में घी को सर्वाधिक स्वास्थ्यप्रद स्रोत माना है। मेडिकेटेड घी के हितकारी गुणों व स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभावों के चलते हर्बल दवाओं को तैयार करने में इसका उपयोग भारत में काफी पहले से किया जाता रहा है। औषधि निर्माण में मेडिकेटेड घी और इसकी सामग्री का उपयोग प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता, अष्टांग हृदय, भारत भैषज्य रत्नाकर और भावप्रकाश में अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। पारंपरिक भारतीय ग्रंथों में गाय के घी को मेधा रसायन भी नामित किया गया है, जो कि मानसिक सतर्कता और स्मृति के लिए फायदेमंद मानी गयी है, आज भी कई आयुर्वेदिक उत्पाद जो पारंपरिक रूप से स्मृति बढ़ाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं, घी से निर्मित होते हैं। स्मृति को सुधारने के लिए गोघृत यानि गाय के घी का उपयोग मस्तिष्क टॉनिक के रूप में किया जाता रहा है कहा जाता है कि घी मस्तिष्क के तीन मुख्य कार्यों जिनमे लर्निंग, मेमोरी और रेकॉलिंग को बढ़ाने में सहायक है।बढ़ते वज़न के पीछे घी को लेकर भी तरह तरह की भ्रांतियां फैली हुई है। एक शोध में गाय के घी, अन्य वसा और ऑयल्स का चूहों के शारीरिक वजन पर क्या प्रभाव पड़ता है का आकलन किया गया और यह देखा गया की गाय के घी वाले समूह के चूहों के वजन में आश्चर्यजनक रूप से कमी हुई। वजन में यह कमी गाय के घी के औषधीय मूल्य से संबंधित हो सकती है जो भोजन को तेजी से अवशोषित कर पाचन में सहायता करती है। घी पाचन में सहायता के लिए पेट में मौजूद एसिड के स्राव को उत्तेजित करता है, जबकि अन्य वसा और तेल शरीर की पाचन प्रक्रिया को धीमा करते हैं।गाय के घी में मुख्य रूप से पोलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड (पीयूएफए), ओमेगा 3 फैटी एसिड डी एच ए, लिनोलेनिक एसिड आदि रासायनिक पदार्थ पाए जाते हैं। पीयूएफए, ओमेगा 3 फैटी एसिड, और डीएचए, डिमेंशिया रोग (मानसिक रोग जिसमे न्यूरॉन्स नष्ट होने लगते हैं) के उपचार में फायदेमंद हैं। यह विचार गाय के घी की लिपिड प्रोफ़ाइल की स्वास्थ्य लाभ में उपयोगिता का समर्थन करता है। एक अन्य शोध में डीएमबीए (7,12-डायमिथाइलबेन्ज़ (ए) -एन्थ्रेसीन, एक कार्सिनोजेन) ट्रीटेड चूहों पर गाय के घी व सोयाबीन तेल का एंटीकैंसर इफ़ेक्ट देखा गया। डीएमबीए ट्रीटेड चूहों वाले समूहों में, जिन्हे सोयाबीन तेल का ट्रीटमेंट दिया गया में ट्यूमर की घटनाएं (65.4%) अधिक थीं वहीँ दूसरी ओर गाय के घी वाले समूहों में, ट्यूमर की घटनाएं अपेक्षाकृत कम (26.6%) थी। इस अध्ययन से ये साबित हुआ कि सोयाबीन तेल की तुलना में गाय का घी कैंसर के लिए जिम्मेदार एंजाइम गतिविधियों को कम करने में ज्यादा इफेक्टिव होता है।पिछले एक कुछ दशकों में शहरी क्षेत्रों में बदलती जीवन शैली के चलते परिष्कृत तेलों के प्रसार और लोकप्रियता ने भले ही घी की उपयोगिता को नज़र अंदाज किया हो लेकिन हालिया दिनों में कई फार्मास्यूटिकल संस्थाओं, व स्वास्थ्य संगठनों द्वारा के घी के विभिन्न लाभकारी गुणों पर अध्ययन ने, निश्चित रूप से एक बार फिर इसे सुपरफ़ूड श्रेणी में शामिल कर दिया है।द हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार- भारत में “राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान” करनाल के शोधकर्ताओं ने भारतीयों व एशियाई उप-महाद्वीप के तीन चौथाई लोगों में बेड कोलेस्ट्रॉल, या ट्राइग्लिसराइड्स के उच्च स्तर को देखते हुए, रासायनिक प्रक्रिया से, घी का एक संस्करण विकसित किया है जो कोलेस्ट्रॉल सामग्री को 85 प्रतिशत कम कर देता है। अनुसंधान संस्थान के निदेशक के अनुसार यह घी खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा निर्धारित सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अनुसार शुद्ध घी मतलब पारदर्शी मक्खन (क्लेरिफाई बटर) या क्रीम से पूरी तरह व्युत्पन्न वसा जिसमे किस भी प्रकार का रंग या प्रिजर्वेटिव न हो, है। भारत में, घी को एगमार्क प्रमाणीकरण के तहत संगठित डेयरी से विपणन किया जाता है, जिसमें वहां मौजूद फ्री फैटी एसिड (एफएफए) के आधार पर तीन ग्रेड: विशेष (अधिकतम 1.4% एफएफए), जनरल (अधिकतम 2.5% एफएफए) और स्टैंडर्ड (अधिकतम 3.0% एफएफए) विकसित किये गए हैं। आमतौर पर बाजार में घी 400 से 500 रुपये किलो की दर से बिकता है लेकिन पहाड़ी नस्ल की बद्री गाय का घी चार हजार रुपये किलो ऑनलाइन बिक रहा है।  बद्री गाय के घी की गुणवत्ता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां घी सामान्यतः 540/किग्रा. की कीमत पर वहीं बद्री गाय घी आन लाइन बाजार में रू0 1650/किग्रा0 तथा इससे अधिक तक की कीमत में बेचा जा रहा है।देशी गाय घी की महत्ता तथा उत्तराखण्ड की श्रेष्ठ पहाड़ी नस्ल बद्री गाय की विशेषताओं हेतु उत्तराखण्ड राज्य में उगने वाले पशुचारे एवं वन औषधोयों का होना भी महत्वपूर्ण है। प्रदेश भर में देसी गाय के घी का घर-घर में उचित मानकों को ध्यान में रखकर उत्पादन होना चाहिए ताकि घी प्रदेश की आर्थिकी से सीधा जुड सके तथा प्रदेश के देसी गाय घी को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विशेष स्थान मिल सके। हिमाचल की देसी गायों को पहली बार घरेलू पशुओं की नस्ल के रूप में पहचान मिली है.महेनत के कारण उत्तराखण्ड ,हिमाचल की बद्री गाय की नस्ल विलुप होने से बची। राज्य की परम्परा में ही पशुधन रहा है, जिसमें बद्री गाय महत्त्वपूर्ण थीं। राज्य का ऐसा कोई घर नहीं था जो बद्री गाय का पालन नहीं करता था। यह परिवार में कुशलता एवं सम्पन्नता का परिचायक थी। जैसे-जैसे लोग शहरों की तरफ प्रवासी बनते गए वैसे-वैसे गाँव से और परिवारों से बद्री गाय लुप्तप्राय होती गई। यही नहीं बद्री गाय के लुप्त होने से राज्य में कई तरह की समस्या खड़ी हो गई। एक तो पशुधन समाप्त हो गया दूसरा राज्य में कृषि के उत्पादन में भारी कमी हो गई। जिस कारण पलायन का स्पष्ट चेहरा सामने आया और स्वरोजगार के साधनों पर संकट मँडराने लग गया। ऐसा माना जा रहा है कि यदि फिर से पहाड़ में बद्री गाय पालन आरम्भ होता है तो निश्चित तौर पर पहाड़ की पुरानी रौनक वापस लौट सकती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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