डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते हर साल आपदा जैसे हालात बनते रहते हैं. खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन होने की वजह से आम जनमानस को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कई बार भूस्खलन की वजह से न सिर्फ आवागमन ठप हो जाता है, बल्कि जानमाल का भी काफी नुकसान होता है. मानसून सीजन के दौरान प्रदेश के खासकर पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है. उत्तराखंड चारधाम यात्रा शुरू होने जा रही है. हर साल यात्रा के दौरान यात्रा मार्गों पर भूस्खलन की घटनाएं होती हैं. जिसके चलते यात्रियों को कई घंटे तक सड़कों से मलबा हटाने का इंतजार करना पड़ता है. जब आवागमन शुरू होता है, तो उस दौरान जाम भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है.इस वर्ष हुई भारी बरसात से ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर 32 नए भूस्खलन जोन पैदा हो गए हैं। जबकि, 45 जोन पहले से चिह्नित हैं, जिसमें 22 का पहले चरण में स्थायी ट्रीटमेंट किया जा रहा है। भूस्खलन व भूधंसाव जोन से हाईवे कई जगहों पर अति संवेदनशील हो रखा है। इन नए भूस्खलन जोन का टीएचडीसी के विशेषज्ञ दल ने स्थलीय निरीक्षण कर दिया है। अब, टीएचडीसी द्वारा डीपीआर तैयार की जा रही है, जिसे एनएच के डिवीजन कार्यालय के माध्यम से भारत सरकार को भेजा जाएगा।भारत सरकार की आलवेदर रोड परियोजना के तहत वर्ष 2016 से ऋषिकेश-बदरीनाथ राजमार्ग का चौड़ीकरण कार्य शुरू किया गया था। हाईवे के चौड़ीकरण के लिए किए कटान से जगह-जगह पहाड़ियों के दरकने से भूस्खलन जोन पैदा हो गए थे। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कार्पोरेशन (टीएचडीसी) के सहयोग से ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग तक दो चरणों में 46 भूस्खलन जोन चिह्नित किए थे, जिसमें जिसमें ब्रह्मपुरी से कौडियाला तक 12, कौडियाला तक आठ, देवप्रयाग से श्रीनगर तक पांच और श्रीनगर से रुद्रप्रयाग तक छह भूस्खलन जोन शामिल हैं भारत सरकार के राजमार्ग एवं सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से पहले चरण में ऋषिकेश से देवप्रयाग तक 22 भूस्खलन जोन का स्वाइल एवं राक एकरिंग तकनीक से स्थायी ट्रीटमेंट किया जा रहा है। इन सभी स्थानों पर 70 फीसदी से अधिक कार्य हो चुका है। दूसरे चरण में देवप्रयाग से रुद्रप्रयाग तक 24 भूस्खलन जोन के स्थायी ट्रीटमेंट के लिए डीपीआर को स्वीकृति मिल चुकी है।दूसरी तरफ इस वर्ष बरसात में ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग तक हाईवे पर 32 नए भूस्खलन जोन पैदा हो चुके हैं, जिससे सड़क और खराब हो चुकी है। कई भूस्खलन जोन ऐसे हैं, जो पहले से चिह्नित जोन के समीप ही उपजे हैं, जिससे हालात और नाजुक हो गए हैं। सम्राट होटल से नरकोटा तक करीब एक किमी क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील बन चुका है। यहां, जगह-जगह पहाड़ी दरक रही है। बीते साल यहां पहाड़ी से हुए भूस्खलन के चलते दो दिन तक हाईवे बंद रहा था। इस साल भी बरसात में यहां आए दिन यातायात बाधित हो रहा। आलवेदर रोड परियोजना के तहत बदरीनाथ हाईवे पर सबसे संवेदनशील जोन तोताघाटी का पिछले चार-पांच वर्षों से सुधारीकरण कार्य किया जा रहा है। यहां, चौड़ीकरण के तहत हाईवे के तीखे मोड़ खत्म कर दिए गए हैं। साथ ही पहाड़ी की तरफ से भी सुरक्षा दीवार का निर्माण कर सड़क को सुरक्षित किया जा रहा है। बदरीनाथ हाईवे पर करीब पांच साल से ऑलवेदर रोड परियोजना का काम चल रहा है। नगरासू से हेलंग तक करीब 85 किलोमीटर सड़क का चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण कार्य किया जाना है। अभी तक कई जगहों पर काम जारी है।मगर जिन जगहों पर हिल कटिंग कार्य हुआ उनमें से अधिकांश जगहों पर बरसात में भूस्खलन सक्रिय हो गया और भारी मात्रा में मलबा और बोल्डर हाईवे पर आ गए। कमेड़ा, नंदप्रयाग, क्षेत्रपाल, गडोरा, भनेरपाणी, पागलनाला, बेलाकूची और गुलाबकोटी क्षेत्रों में भी बरसात में भारी मात्रा में मलबा आ गया था।इन जगहों पर एनएचआईडीसीएल (राष्ट्रीय राजमार्ग एवं ढांचागत विकास) की ओर से कुल आठ जगहों पर डंपिंग जोन बनाए और मलबे का निस्तारण किया गया। मगर अब स्थिति यह है कि आठ में से पांच पुरसाड़ी, छिनका, कौडिया, क्षेत्रपाल, पागलनाला में बनाए गए डंपिंग जोन फुल हो गए हैं।ऐसे में पांचों जगहों पर मलबे का निस्तारण रुक गया है। वहीं एनएचआईडीसीएल के महाप्रबंधक सुशील वर्मा का कहना है कि वन विभाग की ओर से डंपिंग जोन के लिए जगह चिह्नित की जा रही है। हमें आगामी दस दिनों में डंपिंग जोन मिल जाएंगे। इस पर तेजी से काम किया जा रहा है। उत्तराखंड चारधाम यात्रा के दौरान हर साल लैंडस्लाइड की वजह से श्रद्धालुओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यही नहीं, लैंडस्लाइड की वजह से तमाम सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और वाहनों और यात्रियों को नुकसान पहुंचती है. लैंडस्लाइड होने की वजह से यात्रियों को कई घंटे तक रास्ता खुलने का इंतजार करना पड़ता है. भले ही चारधाम यात्रा के दौरान और मानसून सीजन के दौरान क्षेत्रों में मशीनें तैनात की जाती हों, लेकिन लैंडस्लाइड जोन में परमानेंट ट्रीटमेंट पर अधिक जोर नहीं दिया जा रहा है उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में ही सिर्फ भूस्खलन नहीं हो रहा है, बल्कि देश की कुल भूमि का करीब 12 फीसदी क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित है. वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार भूस्खलन के लिए कोई एक वजह जिम्मेदार नहीं है, बल्कि इसके तमाम कारण होते हैं. इसमें, क्लाइमेटिक फैक्टर, एंथ्रोपोजेनिक एक्टिविटी, एक्सेसिव रेनफॉल, नेचुरल एक्टिविटी और एनवायरमेंटल डिग्रेडेशन जैसे तमाम फैक्टर्स शामिल हैं. इन्हीं में से कई कारणों से उत्तराखंड समेत अन्य पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन की समस्याएं उत्पन्न होती हैं. लिहाजा इन तमाम फैक्टर की वजह से ही भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का ट्रीटमेंट सही ढंग से नहीं हो पता है, जिसके चलते उस क्षेत्र में लगातार भूस्खलन होता रहता है. तीन वर्षों तक यहां वाहनों की आवाजाही सुगमता से हुई लेकिन अब फिर से यहां भूस्खलन सक्रिय हो गया है। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*











