डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखण्ड में पाई जाने वाली ढेरों वनस्पतियों में से ज्यादातर औषधीय गुणों से युक्त हैं। बीते समय में इनमें से कई का इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज के लिए या उनसे बचने के लिए भी होता हैं। पुरातन काल से ही ऋषि मुनियों एवं पूर्वजों द्वारा पौष्टिक तथा रोगों के इलाज के लिए विभिन्न प्रकार के जंगली पौधों का उपयोग किया जाता रहा है उच्च हिमालयी क्षेत्र में उत्पादित होने वाली जड़ी.बूटियों के साथ अब चवनप्राश में प्रयुक्त होने वाली पुष्कर मूल और हिमाचली काला जीरा की खेती भी होगी। इसके लिए मुनस्यारी में बनाई गई नर्सरी के सुखद परिणाम आए हैं। पहाड़ी चूख बड़ा नींबू के भी दिन बहुरने वाले हैं।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में छोटे आकार और मध्य हिमालयी क्षेत्र में बड़े नीबू के उत्पाद तैयार करने के लिए प्रोजेक्ट लगने वाला है। उच्च हिमालयी भू भाग पर सालम पंजा, कूट, अतीस, सत्तू, जंबू, गंदरायण, काला जीरा आदि की खेती होती है। माइग्रेशन पर जाने वाले परिवार ग्रीष्मकाल में इसकी खेती करते हैं। इधर इस खेती को बढ़ाने के प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए जड़ी.बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर के माध्यम से मुनस्यारी में नर्सरी बनाई गई है। जिसमें स्थानीय जड़ी बूटियों के अलावा पुष्कर मूल और हिमाचली काला जीरा की पौध तैयार की गई है।
समान जलवायु के चलते कश्मीर और हिमाचल में तैयार होने वाली इन दो जड़ी.बूटियों के अच्छी पौध तैयार हुई है। पूर्व मुख्य सचिव रहे डॉण् आरएस टोलिया की नर्सरी में भी जड़ी.बूटियों की नर्सरी तैयार हो चुकी है। अगले चरण में इन जड़ी.बूटियों को उच्च हिमालयी गांवों में बोया जाना है। जिसे देखते हुए शोध संस्थान के निदेशक ने मुनस्यारी पहुंच कर ग्रामीणों को जड़ी.बूटी उत्पादन के तरीके बताए। अलग.अलग ऊंचाई पर तैयार होने वाली जड़ी.बूटियों के बारे में बताया। इस दौरान पुष्कर मूल के अधिक उत्पादन के लिए भी काश्तकारों को प्रोत्साहित किया गया। बताया गया कि अप्रैल मई माह में प्रवास के लिए उच्च हिमालयी गांवों में जाने वाले ग्रामीणों को पर्याप्त मात्रा में जड़ी.बूटी की पौध दी जाएगी।
इस अवसर पर अब तक त्याज्य समझे जाने वाले बड़े नीबू पर आधारित उत्पाद के लिए लगने वाले संयत्र के बारे में बताया गया। विदित हो मध्य हिमालयी भू भाग में इस नीबू का आकार बड़ा तथा उच्च हिमालयी क्षेत्र में आकार छोटा रहता है। अभी तक यह पहाड़ों में लोगों की आजीविका के लिए पुख्ता माध्यम नहीं बन सका है जबकि वर्तमान में नीबू प्रजाति में सबसे अधिक उत्पादन इसी का है। शोध संस्थान के निदेशक ने बताया कि इस पर आधारित प्रोजेक्ट लगने के बाद इसकी मांग बढ़ेगी। पिथौरागढ़ के सीमांत जिले का तल्ला जौहार क्षेत्र लीची जोन में विकसित होगा। इसके लिए अधिकारियों ने कवायद शुरू कर दी है। तल्ला जौहार क्षेत्र के 12 गांवों में नए बाग तैयार कर यहां लीची का उत्पादन करीब छह गुना तक बढ़ाने की तैयारी चल रही है। इससे जहां रोजगार उपलब्ध होगाए वहीं क्षेत्रवासी आर्थिक रूप से संपन्न होंगे।
रामगंगा घाटी की जलवायु लीची उत्पादन के लिए बेहतर है, हालांकि यहां के ग्रामीण लीची का उत्पादन अपने ही प्रयासों से कर रहे हैं, लेकिन जिस हिसाब से वह मेहनत कर रहे हैं, उसका उन्हें सही से लाभ नहीं मिल रहा है। यहीं कारण है कि विभागीय अधिकारियों ने पहल करते हुए तल्ला जौहार क्षेत्र के 12 गांवों को लीची जोन में विकसित करने का निर्णय लिया है। जिला उद्यान अधिकारी के अनुसार यहां की लीची अन्य जगहों पर उत्पादन की गई लीची से बेहतर है। विभाग ने इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए चयन किया है। बागवानी से यहां अच्छे परिणाम सामने आएंगे।












