
अरुण कुमार
निस्संदेह, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन भारतीय पत्रकारिता की अनुगूंज ही कही जा सकती है। भारतीय पत्रकारों ने ही नहीं, राजनेताओं, समाज सुधारकों व साहित्यकारों ने पत्रकार की भूमिका निभाकर स्वतंत्रता की भूख जगाई। सही मायनों में आजादी से पहले की डेढ़ सदी की भारतीय पत्रकारिता एक ऐसे संघर्ष का दस्तावेज है, जिसने ब्रिटिश सत्ता की चूलें हिलाकर आजादी का मार्ग प्रशस्त किया। कलम से फिरंगियों की बंदूक से लोहा लिया। पद्मश्री व भोपाल के सप्रे संग्रहालय के संस्थापक व संपादक विजय श्रीधर के श्रमसाध्य प्रयासों से ’समग्र भारतीय पत्रकारिता’ नामक पुस्तक तीन खंडों में आई है। पहले खंड में 1780 से 1880 तक, दूसरे खंड में 1881 से लेकर 1920 तक तथा तीसरे खंड में 1921 से लेकर 1948 तक की पत्रकारिता के स्वरूप, चुनौतियों व विस्तार का विस्तृत विवरण है।
सही मायनो में कुल 168 वर्ष की भारतीय पत्रकारिता की यात्रा का जीवंत दस्तावेज ’समग्र भारतीय पत्रकारिता’। परतंत्रता का समय घर फूंक तमाशा देखने का दौर था। ब्रिटिश सत्ता के दमन और अन्याय से उपजे अंधकार में रोशनी का कार्य किया भारतीय पत्रकारिता ने। वहीं दूसरी ओर सारे देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य भी किया। उस दौर में सभी बड़े राजनेता जानते थे कि सूचना व तथ्यों पर फिरंगियों की संगीनों का पहरा है। ऐसे में देश के जनमानस को गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिये पत्रकारिता ही कारगर हथियार साबित हो सकती है। यही वजह है कि उस दौर में गांधी जी, पं. नेहरू, तिलक व अंबेडकर आदि ने पत्रकारिता को नई धार देने के लिये पत्र पत्रिकाओं का संपादन व प्रकाशन किया। सही मायनो में उस दौर में भाषायी पत्रकारिता नागरिक चेतना, कुरीतियों के विरुद्ध जन-जागरण व सांस्कृतिक चेतना जगाने का काम कर रही थी। इस दौर की पत्रकारिता में आजादी की भूख जगाने के लिए राजनेताओं, समाज सुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों ने कलम को हथियार बनाया।
आज के सोशल मीडिया के दौर में पश्चिम चमक-दमक व भौतिकवाद की लहर में सम्मोहित नई पीढ़ी को देश की पत्रकारिता के समृद्ध इतिहास से रूबरू कराने के लिये ’समग्र भारतीय पत्रकारिता’ ग्रंथ का प्रकाशन पत्रकारिता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। भोपाल के सप्रे संग्रहालय में संग्रहीत ज्ञात और कम ज्ञात पत्रकारिता की दुर्लभ जानकारी को समेट कर लिखे गए इस तीन खंड वाले समग्र इतिहास से आने वाली पीढ़ियां निश्चित रूप से लाभावन्वित होंगी।
’समग्र भारतीय पत्रकारिता’ पुस्तक का प्रथम खंड 1780 से 1880 सौ वर्ष की पत्रकारिता के इतिहास को समेटता है। यह संयोग ही है कि हिंदी के पहले साप्ताहिक व दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन गैर हिंदी भाषी बंगाल से हुआ। भाषायी रूप से समृद्ध, सांस्कृतिक रूप से सचेतन और नागरिक के रूप में जागरूक बंगाल इस दौरान पत्रकारिता के केंद्र में रहा। एक समाज सुधारक के रूप में राज्य के प्रबुद्ध हस्तियों ने पत्रकारिता को सामाजिक बदलाव का अस्त्र बनाया। राजा राममोहन राय के इस दिशा में किए गए प्रयासों को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। इस दिशा में उर्दू समाचार पत्र जाम-ए-जहांनुमा और मुंबई समाचार पत्र के अविस्मरणीय योगदान को नहीं भुलाया जा सकता।
यह सुखद संयोग है कि पत्रकारिता का यह दस्तावेज ’समग्र भारतीय पत्रकारिता’ ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है जब 1826 में प्रकाशित पहला हिंदी साप्ताहिक ’उदंत मार्तंड’ के प्रकाशन का दो सौ साला उत्सव हिंदी पत्रकारिता मना रही। ’उदंत मार्तंड’ को ही हिंदी पत्रकारिता के बीजारोपण का श्रेय दिया जाता है। पुस्तक हिंदी,उर्दू व अंग्रेजी के समचार पत्रों की यात्रा और उनसे जुड़े कम ज्ञात तथ्यों का भी अनावरण करती है। समाचार पत्रों के साथ ही देश में न्यूज एजेंसियों की शुरुआत व उनके सफलता के सोपानों का जिक्र है।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि अंग्रेज सरकार की सख्त सेंसरशिप के बीच साहित्यकारों व पत्रकारों ने साहित्य की विभिन्न विधाओं के जरिये स्वतंत्रा की उत्कट अभिलाषा को मुखर बनाया। फिरंगी सत्ता के खिलाफ व्यंग्य के जरिये आग उगलते ’शिवशंभू के चिट्ठे’ सत्ताधीशों को बेचैन करते थे। काव्य की विभिन्न विधाओं, व्यंग्य और लेखों के जरिये इस दौर के पत्रकारों ने राष्ट्रीय आंदोलन में ऊर्जा का संचार किया। इन रचनाओं में आंचलिक व लोकभाषाओं की तीक्ष्णता रचनाओं में मुखरित होती है।
समग्र भारतीय पत्रकारिता का दूसरा खंड उस दौर का दस्तावेज है जब देश के जनमानस ने मन बना लिया था कि देश की आजादी का कोई विकल्प नही हो सकता। साल 1881 से 1920 के कालखंड को समेटे यह पत्रकारिता का वह दौर था, जब देश के जनमानस ने बाल गंगाधर तिलक के स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, के उद्घोष से सुर मिलाना शुरू कर दिया था। उनका ’केसरी’ स्वतंत्रता की चेतना का अग्रदूत बन गया था। हिंदी को देश को एकता के सूत्र में पिरोनी वाली जनसंपर्क की भाषा के रूप में मान्यता मिलने लगी थी।
समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीसरे खंड 1921 से 1948 के उस कालखंड का जीवंत इतिहास है जब राष्ट्रीय चेतना सविनय अवज्ञा आंदोलन से भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुंच गई थी। इस दौर की पत्रकारिता को महात्मा गांधी के अहिंसा के हथियारों से लड़ी गई लड़ाई ने गहरे तक प्रभावित किया। यही वजह है कि खुद पत्रकार की भूमिका भी निभाने वाले गांधी जी से गहरे तक प्रभावित कालखंड को गांधी युग की भी संज्ञा दी गई। इस दौर में हिंदी में ’कर्मवीर’ की मुखरता से उदीप्त राष्ट्रीय चेतना निरंतर समृद्ध हुई। लेखक विजय श्रीधर ने इस दौर के हिंदी व अंग्रेजी के समाचार पत्रों के जन्म और विस्तार से जुड़े कई रोचक अध्यायों से पाठकों को रूबरू कराया है। जिसमें पत्रकारिता के मूल्यों व पत्रकारों की निर्भीकता और जनता पर उसके गहरे प्रभाव को रेखांकित किया गया है।
निस्संदेह, विजय श्रीधर के ऋषिकर्म व वाणी प्रकाशन के सुंदर प्रकाशन से ’समग्र भारतीय पत्रकारिता’ के रूप में पत्रकारों की आने वाली पीढ़ियों के लिये अपने पुरखों की विरासत सहेजने का अवसर पैदा हुआ है। कहने के आवश्यकता नहीं है कि इसमें लेखक के तीन दशक के श्रमसाध्य प्रयासों और भारतीय पत्रकारिता को सप्रे संग्रहालय में सहेजने के प्रयासों से हासिल अनुभवों को समाहित किया गया है। समय-समय पर निकाले गए विशेषांकों तथा दुर्लभ चित्रों को समेटे यह भारतीय पत्रकारिता का समग्र व संपन्न इतिहास नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिये पथ प्रदर्शक का कार्य करेगा। पुस्तक उस शून्य को भरने का प्रयास है, जिसमें भारतीय पत्रकारिता के इतिहास को एक जगह देखने की कमी के रूप में देखा जाता रहा है।












