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डोबरा चांठी पुल के पास बनी सड़क पर पड़ी दरारें

12/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
29 अक्टूबर 2005 को टिहरी बांध की अंतिम टनल बंद हो जाने के बाद 2006 में टिहरी शहर पूरी तरह जलमग्न हो गया था। साथ ही झील पार के प्रतापनगर ब्लाॅक को टिहरी से जोड़ने वाले सभी झूला और मोटर पुलों के भी डूब जाने से प्रतापनगर का पूरा क्षेत्र कालापानी- सा हो गया था। टिहरी के डूबने से पहले पल्ली पार के जिस मदननेगी क्षेत्र की गिनती जिला मुख्यालय के अंतर्गत ही होती थी वही बांध बनने के बाद जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर हो गया था।कालापानी बन चुका प्रतापनगर क्षेत्र शेष टिहरी जनपद से मात्र दो ही पुलों के जरिए जुड़ा हुआ था। पहला घनसाली मार्ग पर पीपलडाली और दूसरा छाम मार्ग पर भल्डियाना। प्रतापनगर के मुख्यालय लंबगांव से दोनों मार्गों से दूरी क्रमशः 90 व 75 किमी है। बड़े ट्रकों के लिए तो ये दोनों पुल भी काम नहीं आते हैं। उन्हें घनसाली या उत्तरकाशी होकर प्रतापनगर पहुँचना पड़ता था।प्रतापनगर की जिला मुख्यालय नई टिहरी से लगभग 100 किमी अतिरिक्त दूरी को कम करने के लिए डोबरा-चांठी नामक जगह पर मोटर पुल बनाये जाने का प्रस्ताव हुआ तो लगा कि प्रतापनगर अब अधिक समय तक कालापानी नहीं रहेगा। पर ऐसा आसानी से हो न सका और प्रतापनगर को कालापानी के रूप में पूरे चैदह वर्ष इंतज़ार करना पड़ा। अक्टूबर 2020 में बन कर तैयार हुआ डोबरा-चांठी पुल लोड टेस्टिंग में पास हो गया है। 440 मीटर लम्बा ये सिंगल लेन मोटरेबल सस्पेंशन ब्रिज लोड टेस्टिंग में पास होते ही ऐतिहासिक बन गया है।डोबरा-चांटी पुल की परिकल्पना टिहरी क्षेत्र के अलग-थलग गांवों, विशेष रूप से डोबरा और चांटी गांवों के बीच संपर्क को बेहतर बनाने के लिए की गई थी, जो पहले टिहरी बांध जलाशय के कारण कटे हुए थे। इसका निर्माण 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ, लेकिन कई बार इसमें देरी हुई। अंततः यह अक्टूबर 2020 में बनकर तैयार हुआ और इसका उद्घाटन किया गया।देश का सबसे लंबा सस्पेंशन ब्रिज डोबरा-चांठी का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने किया था. इस पुल ने न केवल विकास की नई इबारत लिखी, बल्कि पर्यटन को भी ऊंचाई पर ले गया. करीब 3 अरब रुपये की लागत से बना डोबारा-चांठी पुल देश का सबसे बड़ा सस्पेंशन ब्रिज होने का गौरव भी रखता है. ये पुल आकर्षक फसाड लाइड से रोशन होता है. डोबरा-चांठी वासियों की समस्याओं को देखते हुए सरकार में इस पुल को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा. कई सालों से निर्माणाधीन पुल के लिए सरकार ने एकमुश्त बजट जारी किया. जिसका परिणाम भी जनता के सामने है. इस पुल की क्षमता 16 टन भार सहन करने की है और इसकी उम्र करीबन 100 साल तक बताई जा रही है. इस पुल की चौड़ाई 7 मीटर है. जिसमें मोटर मार्ग की चौड़ाई 5.5 मीटर और फुटपाथ की चौड़ाई 0.75 मीटर है. इसके निर्माण में करीब 3 अरब रुपये खर्च हुए हैं. साल 2006 में डोबरा-चांठी पुल का निर्माण शुरू हुआ, लेकिन काम के दौरान कई उतार-चढ़ाव और समस्याएं सामने आने लगीं. गलत डिजाइन, कमजोर प्लानिंग और विषम परिस्थितियों के चलते साल 2010 में इस पुल का काम बंद हो गया था. साल 2010 में पुल के निर्माण में लगभग 1.35 अरब खर्च हो चुके थे. दोबारा साल 2016 में लोक निर्माण विभाग ने 1.35 अरब की लागत से इस पुल का निर्माण कार्य शुरू कराने का निर्णय लिया. जो 2020 में बनकर तैयार हुआ.पुल के डिजाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय टेंडर निकाला गया. साउथ कोरिया की यूसीन कंपनी को यह टेंडर मिला. कंपनी ने पुल का नया डिजाइन तैयार किया और जैकी किम की निगरानी में तेजी से पुल का निर्माण शुरू हुआ. साल 2018 में एक बार फिर काम में व्यवधान पड़ा. जब निर्माणाधीन पुल के तीन सस्पेंडर अचानक टूट गए. तमाम मुश्किलों के बाद अब 2020 में यह पुल पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ. डोबरा-चांठी पुल एक पर्यटक स्थल भी बनने जा रहा है. यह पुरानी टिहरी की तर्ज पर रोजगार का केंद्र भी होगा. यह जगह कई गांवों से जुड़ी है, जो पुरानी टिहरी की कमी दूर करने का काम भी करेगी. ऐसे में माना जा रहा है कि आपसी भाईचारा, संस्कृति भी जिंदा हुई. टिहरी झील के ऊपर बने डोबरा चांठी पुल के दोनों तरफ घटिया तरीके से सड़क का निर्माण करने वाली हिल व्यू कंपनी के खिलाफ एक साल से कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई है. जबकि स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा पुल के दोनों तरफ सड़क को ठीक करने की मांग उठाई गई. लेकिन एक साल से सड़क ठीक नहीं की गई है. अब स्थानिय जनप्रतिनिधियों ने घटिया काम करने वाली हिल व्यू कंपनी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है. उन्होंने कहा है कि आज तक शासन-प्रशासन ने इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. डोबरा चांठी पुल के उद्घाटन के बाद तुरंत सड़क का घटिया डामरीकरण व सड़क के धंसने के कारण जगह-जगह गड्ढे पड़ गए. जिससे कई छोटे-बड़े वाहन दुर्घटना ग्रस्त हुए हैं. इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. ऐसा न हो जैसे रानीपोखरी का पुल टूटा उसके बाद सरकार जागी. आरटीआई में भी खुलासा हुआ है कि डोबरा चांठी पुल की थर्ड पार्टी से जांच नहीं करवाई गई है. जिसका खामियाजा हर दिन पुल में देख सकते हैं. कभी मास्टिक टूट रही है तो कभी पुल के आसपास जमीन में मलबा आ रहा है. इस पुल की जांच होनी चाहिए जिससे लोग सुरक्षित रह सके और कोई बड़ा हादसा न हो.लोक निर्माण विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि पुल के ऊपर मास्टिक पर पड़ी दरारों को ठीक करने के लिए कंपनी के कर्मचारियों को निर्देश दे दिए गए हैं. पुल का मेंटेनेंस का कार्य 5 साल तक कंपनी ही करेगी.डोबरा-चांठी पुल की कुल लंबाई 725 मीटर है. जिसमें 440 मीटर सस्पेंशन ब्रिज हैं और 260 मीटर आरसीसी डोबरा साइड है. जबकि 25 मीटर स्टील गार्डर चांठी साइड है. पुल की कुल चौड़ाई सात मीटर है, जिसमें मोटर मार्ग की चौड़ाई 5.50 (साढ़े पांच) मीटर है. जबकि फुटपाथ की चौड़ाई 0.75 मीटर है. दक्षिण एशिया बांध नदी और लोग नेटवर्क के प्रमुख इंजीनियर हिमांशु ठक्कर का मानना ​​है कि हमारे राजनेता इन पुलों के ढहने को एक झटका नहीं मानते।”बल्कि वे इसे और अधिक पैसा कमाने के अवसर के रूप में देखते हैं।”सभी अवसंरचना परियोजनाओं में जवाबदेही समय की आवश्यकता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पुल प्रताप नगर की लाइफ लाइन है. इस पुल को कई वर्षों बाद प्रताप नगर की जनता के संघर्षों से यह पुल बना है. इसलिए सभी की जिम्मेदारी है कि इस पुल पर कुछ भी नुकसान की कमी दिखाई देती है, तो वह लोक निर्माण विभाग के उच्च अधिकारियों को अवगत करवाएं, जिससे पुल को तत्काल ठीक किया जा सके. लेकिन पुल पर बार-बार दरार पड़ने पर भी कोई अधिकारी ध्यान नहीं दे रहा है.स्थानीय लोगों ने एक बार फिर मस्टिक बिछाने वाली कंपनी के खिलाफ जांच कराने की मांग की है. लोगों ने कहा है कि इस पुल पर कोई भी अधिकारी ध्यान नहीं देगा तो यह पुल ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा. इसलिए अधिकारियों को इस पुल के प्रति गंभीर होना पड़ेगा. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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