फाइल फोटो- श्री बदरीनाथ धाम।
प्रकाश कपरूवाण
जोशीमठ। कोरोना काल मंे भी भगवान बदरी विशाल की नित्य पूजाओं मंे सहभागी बने हैं, हकहकूकधारी समाज के लोग। तीर्थयात्रियों की गैर मौजूदगी के बावजूद अपनी परंपराओं का बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। श्री बदरीनाथ धाम में डिमरी पंचायत, माल्या पंचायत, मेहत्ता, भंडारी, कमदी तथा स्योकार थोक के बारीदार नियमित मौजूद रहकर भगवान श्री हरिनारायण की सेवा में जुटे हैं।
भगवान बदरी विशाल की पूजा पंरपराओं में अनादिकाल से ही हकहकूकों को व्यवस्थित किया गया था जो आज भी बदस्तूर जारी है। मंदिर की समस्त पूजाओं व भेाग आदि मंे इनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है। बिना इन हकहकूकधारी समाज की मौदगी के पूजाआंे का संपादित किया जाना कतई संभव नहीं है।
दरसअल आद्य जगदगुरू शंकराचार्य के काल से श्री बदरीनाथ की विशिष्ठ पूजा पंरपराए संचालित होती आ रही है, और भगवान की पूजा में क्षेत्र के लोगों के हकहकूक भी निर्धारित किए गए थे, तब से ही हकहकूकधारी समाज के लोग अपने-अपने हकों की परंपरानुसार पंरपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। पूर्व काल मे जब भगवान नारायण के दर्शनों के लिए वर्षभर में इक्का-दुक्का तीर्थयात्री ही पंहुच पाते थे, लेकिन तब भी श्री बदरीनाथ मंदिर से जुडे हकहकूकधारी समाज के बारीदार यात्राकाल के छ महीनों का राशन अपने घरोसे ले जाकर भगवान की सेवा मे जुटे रहते थे। कई मर्तबा तो भगवान के भोग-प्रसाद की ब्यवस्था भी इसी समाज के लोग करते थे। वो स्थिति आज के कोरोना काल मे भी दिखाई दे रही है , हाॅलाकि कोरोना काल मे ही भगवान बदरीविशाल के कपाट खुलने के बाद यहा एक राशन की दुकान खुलने की परमीशन अवश्य मिली है जिसके कारण हकहकूकधारी समाज को अपना राशन अनादिकाल की तर्ज पर घर से लाने की जरूरत नही पडी।
लेकिन इस कोरोना महामारी के कारण भू-वैकंुठ धाम बदरीनाथ धाम में छाई वीरानगी ने आज की पीढी को यह महसूस करा दिया कि उनके पूर्वजों ने कितनी विकट परिस्थितियों मे भगवान की सेवा करते हुए उनके लिए मंदिर से जुडे हको को जीवन्त रखा है।
श्री बदरीनाथ मंदिर की पूजा पंरपरा से जुडे महत्वपूर्ण हकहकूक समाज मे डिमरी समाज, माल्या पचंायत, मेहत्ता, भंडारी कमदी व स्योकार समाज प्रमुख है। इन समाजों के बारीदार क्रमवार श्री बदरीनाथ धाम पंहुचकर भगवान नारायण की सेवा मे जुटे रहते है। डिमरी समुदाय से सहायक पुजारी’’भीतली बडवा’’ जो मुख्य पुजारी श्री रावल के साथ सहायक का कार्य करते है, इनके अलावा डिमरी समाज से लक्ष्मी मंदिर पुजारी व भोग मंडी आदि मे अपने हको व बारी के अनुसार पंरपराओ का निवर्हन करते है। इसी प्रकार माल्या पचंायत मे प्रखंड के टंगणी गाॅव के भटट व डंगवाल परिवार के लोग होते है जिनका प्रमुख कार्य प्रतिदिन भगवान की पूजा के लिए तुलसी की पाॅच मालाओं को देना होता है। जबकि पांडुकेश्वर के मेहत्ता , भंडारी, कमदी थोक व जोशीमठ के स्योकार थोक के बारीदारों का प्रमुख कार्य भगवान के भोग आदि के लिए पंहुचने वाले खाद्यान्न, घी , तेल मशाला आदि का भंडारण करना व प्रतिदिन वितरण करने के साथ भगवान की विभिन्न आरतियों को तैयार करना, व सभा मंडप की स्वच्छता बनाए रखना होता है। इन सबके अलावा सीमांत गाॅव माणा का भी अहम कार्य होता है,भगवान नारायण के कपाट बंद होने के अवसर पर भगवान के श्रीविगृह पर जिस घृत कंबल का लेपन किया जाता है उस ऊन की कंबल को माणा गाॅव की कुॅवारी कन्याओं द्वारा ही बुना जाता है।
क्लियुग पापाहारी भगवान बदरीविशाल की पूजा पंरपरा मे कपाट खुलने से लेकर कपाट बंद होने तक इन हकहकूकधारी समाज की मौजूदगी बेहद आवश्यक है और इसी को ध्यान मे रखते हुए नग गठित चारधाम देवस्थानम बोर्ड के एक्ट मे मंदिर से सीधे जुडे हकहकूकधारी समाज के हकों को सुरक्षित रखने की बात कही गई है।











