देहरादून, 6 अक्टूबर 2026
रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी की दो पुस्तकों ‘दादी का रेडियो’ (संस्मरण) और ‘ठहरे किनारे’ (काव्य संग्रह) का लोकार्पण समारोह दून पुस्तकालय सभागार, देहरादून में हर्षोल्लास और आत्मीय माहौल में संपन्न हुआ। समय साक्ष्य प्रकाशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, शिक्षाविदों और समाजकर्मियों की गरिमामय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने की। मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षाविद डॉ. उमा भट्ट, साहित्यकार डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी और सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी ने अपनी रचना प्रक्रिया के अनुभव साझा किए।
समारोह का शुभारंभ लेखिका की कविताओं के पाठ से हुआ, जिसे कान्ता घिल्डियाल और मधुरवादिनी तिवारी ने अत्यंत भावपूर्ण अंदाज में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन निक्की पुष्कर ने किया।
वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि ‘दादी का रेडियो’ केवल संस्मरण नहीं है, यह पहाड़ के विस्थापन और स्मृति के बीच का सेतु है। उन्होंने कहा कि ज्योत्स्ना जोशी ने जिस तरह ‘गाँव की सुबह’ में खाली गागर की खनखनाहट, पंदेरे में पानी भरने जाती ब्वारियों की खिलखिलाहट, सट्टी (धान) कूटने की आवाज ‘सुप्पा सुप्पा’ और बोडा जी के मंत्रोच्चारण ‘आत्मा त्वं गिरिजा मति:’ को दर्ज किया है, वह उत्तराखंड के लोक को साहित्य में पुनर्जीवित करना है।
शिक्षाविद डॉ. उमा भट्ट ने कहा कि इस पुस्तक में दो पीढ़ियों का संवाद है। दादी का ‘हे ज्योति! हे ज्योता! उठड़ी खिल्ले नी कने कटण यीन दिन यन्न माँ’ कहकर प्यार और डांट से जगाना, और लेखिका का कच्ची नींद में करवट बदलते हुए पूरा गाँव सुनना – यह हर पहाड़ी घर की कहानी है। यह पुस्तक बताती है कि कैसे सूरज क्वल्दे चीड़ के लंबे घने पेड़ों से आलिंगन और अनुमति लेकर ही गाँव में अपनी किरणें बिखेरता है।
डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी ने ‘ठहरे किनारे’ काव्य संग्रह पर बात करते हुए कहा कि ठहराव भी एक गति है। झील के किनारे बैठी स्त्री की तरह ये कविताएं जीवन के ठहरे हुए क्षणों में गहरे उतरती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने कहा कि ऐसी रचनाएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
अपने वक्तव्य में ज्योत्स्ना जोशी ने भावुक होते हुए कहा कि उनका गाँव रुद्रप्रयाग जिले में तिलवाड़ा से तीन किलोमीटर पैदल चलकर एक ऐसी गहरी समतल जगह पर है जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरा है। “ये मेरे जीवन का वो अनमोल अविस्मरणीय अल्हड़ बचपन का हिस्सा था जब सूरज पलकों में अपनी किरणें रखकर जगाता था। दादी ने छाँछ का परया भितरी खंड में रखा था और मैं पूछ रही थी कि ये कब बनाया। दादी बोली – जब ये बना उसके बाद तो तुझे तीन नींद और आ गई होगी, मेरी सुबह तो ‘भोर का तारा’ जब दिखता है, तब हो जाती है।” उनके इस संस्मरण पर सभागार में तालियां गूंज उठीं।
कार्यक्रम में दून घाटी के अनेक साहित्यकार, लेखक और कवि उपस्थित रहे। इनमें कई युवा रचनाकार भी शामिल थे। सभी ने दोनों पुस्तकों को पहाड़ी जीवन और स्त्री-संवेदना की महत्वपूर्ण उपलब्धि बतायाl
अंत में समय साक्ष्य प्रकाशन की ओर से सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया।
इस अवसर पर अतुल शर्मा, अरुण कुकसाल, मदन डुकलाण, रमाकांत बेंजवाल, बीना बेंजवाल, जेपी मैठाणी, डॉ. लालता प्रसाद, गीता गैरोला, एसके नौटियाल, देवेंद्र कांडपाल, एस नैथानी, सारिका सूरी, चंद्र शेखर तिवारी, रमा शर्मा, मनोज इस्टवाल, सुरेंद्र सजवाण आदि उपस्थित थेl











