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चीनियों को मौत के घाट उतारने वाला यह भारतीय ‘रायफल मैन’

19/08/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

शरीर तो मिट जाता है, पर जज्बा हमेशा ज़िंदा रहता है, यह उक्ति वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में 72 घंटे तक अकेले चीन फौज से लड़ने वाले महावीर चक्र (मरणोपरांत) विजेता राइफलमैन जसवंत सिंह रावत पर सटीक बैठती है। भारतीय सेना इस जांबाज को ‘बाबा जसंवत’ के नाम से सम्मान देती है। जिस पोस्ट पर बाबा जसवंत सिंह रावत शहीद हुए थे, भारत सरकार ने उसे ‘जसवंत गढ़’ नाम दिया है। उनकी याद में गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट के मुख्यालय लैंसडौन में भी ‘जसवंत द्वार’ बनाया गया है। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के रहने वाले थे। उनका जन्म 19 अगस्त, 1941 को हुआ था। उनके पिता गुमन सिंह रावत थे।

जिस समय शहीद हुए उस समय वह राइफलमैन के पद पर थे और गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में सेवारत थे। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश के तवांग के नूरारंग की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी।1962 का भारत-चीन युद्ध अंतिम चरण में था। 14,000 फीट की ऊंचाई पर करीब 1000 किलोमीटर क्षेत्र में फैली अरुणाचल प्रदेश स्थित भारत-चीन सीमा युद्ध का मैदान बनी थी। यह इलाका जमा देने वाली ठंड और दुर्गम पथरीले इलाके के लिए बदनाम है। इन इलाकों में जाने भर के नाम से लोगों की रूह कांपने लगती है लेकिन वहां हमारे सैनिक लड़ रहे थे।

चीनी सैनिक भारत की जमीन पर कब्जा करते हुए हिमालय की सीमा कोपार करके आगे बढ़ रहे थे। चीनी सैनिक अरुणाचल प्रदेश के तवांग से आगे तक पहुंच गए थे। भारतीय सैनिक भी चीनी सैनिकों का डटकर मुकाबला कर रहे थे।चीनी सैनिकों से भारतीय थल सेना की गढ़वाल राइफल्स लोहा ले रही थी। गढ़वाल राइफल्स जसवंत सिंह की बटालियन थी। लड़ाई के बीच में ही संसाधन और जवानों की कमी का हवाला देते हुए बटालियन को वापस बुला लिया गया। लेकिन जसवंत सिंह ने वहीं रहने और चीनी सैनिकों का मुकाबला करने का फैसला किया।


स्थानीय किवदंतियों के मुताबिक, उन्होंने अरुणाचल प्रदेश की मोनपा जनजाति की दो लड़कियों नूरा और सेला की मदद से फायरिंग ग्राउंड बनाया और तीन स्थानों पर मशीनगन और टैंक रखे। उन्होंने ऐसा चीनी सैनिकों को भ्रम में रखने के लिए किया ताकि चीनी सैनिक यह समझते रहे कि भारतीय सेना बड़ी संख्या में है और तीनों स्थान से हमला कर रही है। नूरा और सेला के साथ-साथ जसवंत सिंह तीनों जगह पर जा-जाकर हमला करते।

इससे बड़ी संख्या में चीनी सैनिक मारे गए। इस तरह वह 72 घंटे यानी तीन दिनों तक चीनी सैनिकों को चकमा देने में कामयाब रहे। लेकिन दुर्भाग्य से उनको राशन की आपूर्ति करने वाले शख्स को चीनी सैनिकों ने पकड़ लिया। उसने चीनी सैनिकों को जसवंत सिंह रावत के बारे में सारी बातें बता दीं। इसके बाद चीनी सैनिकों ने 17 नवंबर, 1962 को चारों तरफ से जसवंत सिंह को घेरकर हमला किया। इस हमले में सेला मारी गई लेकिन नूरा को चीनी सैनिकों ने जिंदा पकड़ लिया।

जब जसवंत सिंह को अहसास हो गया कि उनको पकड़ लिया जाएगा तो उन्होंने युद्धबंदी बनने से बचने के लिए एक गोली खुद को मार ली। सेला की याद में एक दर्रे का नाम सेला पास रख दिया गया है।कहा जाता है कि चीनी सैनिक उनके सिर को काटकर ले गए। युद्ध के बाद चीनी सेना ने उनके सिर को लौटा दिया। अकेले दम पर चीनी सेना को टक्कर देने के उनके बहादुरी भरे कारनामों से चीनी सेना भी प्रभावित हुई और पीतल की बनी रावत की प्रतिमा भेंट की। कुछ कहानियों में यह कहा जाता है कि जसवंत सिंह रावत ने खुद को गोली नहीं मारी थी बल्कि चीनी सैनिकों ने उनको पकड़ लिया था और फांसी दे दी थी।जिस चौकी पर जसवंत सिंह ने आखिरी लड़ाई लड़ी थी उसका नाम अब जसवंतगढ़ रख दिया गया है और वहां उनकी याद में एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर में उनसे जुड़ीं चीजों को आज भी सुरक्षित रखा गया है।

पांच सैनिकों को उनके कमरे की देखरेख के लिए तैनात किया गया है। वे पांच सैनिक रात को उनका बिस्तर करते हैं, वर्दी प्रेस करते हैं और जूतों की पॉलिश तक करते है। सैनिक सुबह के 4.30 बजे उनके लिए बेड टी, 9 बजे नाश्ता और शाम में 7 बजे खाना कमरे में रख देते हैं।उनको मृत्यु के बाद भी प्रमोशन मिलता है। राइफलमैन के पद से वह प्रमोशन पाकर मेजर जनरल बन गए हैं। उनकी ओर से उनके घर के लोग छुट्टी का आवेदन देते हैं और छुट्टी मिलने पर सेना के जवान पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके चित्र को उनके पैतृक गांव ले जाते हैं। छुट्टी समाप्त होने पर उनके चित्र को वापस जसवंत गढ़ ले जाया जाता है।

सेना के जवानों का मानना है कि अब भी जसवंत सिंह की आत्मा चौकी की रक्षा करती है। उनलोगों का कहना है कि वह भारतीय सैनिकों का भी मार्गदर्शन करते हैं। अगर कोई सैनिक ड्यूटी के दौरान सो जाता है तो वह उनको जगा देते हैं। उनके नाम के आगे शहीद नहीं लगाया जाता है और यह माना जाता है कि वह ड्यूटी पर हैं। 

राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने जिस तरह युद्ध में अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया, उसे देख चीनी सैनिक भी भौचक्के रह गए। उन्होंने राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की पार्थिव देह को सलामी देकर उनकी एक कांसे की प्रतिमा भी भारतीय सेना को भेंट की।लगातार 72 घंटे अकेले ही चीनी फौज से लड़ते रहे महावीर चक्र विजेता राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, आज भी सेना इस जाबांज राइफलमैन को बाबा के नाम से सम्मान देती है भारतीय सेना।अकेले चीनी सेना को धूल चटाने वाले राइफल मैन जसवंत सिंह रावत की वीरता पर आधारित फिल्म का पहला डिजीटल पोस्टर जारी हो गया है। फिल्म को ‘72 आवर्स मारट्यर हू नेवर डाइड’ नाम दिया गया है।

दरअसल उनकी टुकड़ी के पास मौजूद रसद और गोली- बारूद खत्म हो चुके थे. ऐसे में दुश्मन के सामने खड़े होने का मतलब था, मौत को गले लगाना. पर जसवंत तो जसवंत थे! उन्होंने इस आदेश को नहीं माना और अपनी आखिरी सांस तक दुश्मन का सामना करते रहे. ऐसा भी नहीं था कि उन्हें दुश्मन की ताकत का अंदाजा नहीं था, पर वह जानते थे कि जंग कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जीतना नामुमकिन नहीं होता. उनके जीवन पर बनी फिल्म ’72 आवर्स: मार्टियर हू नेवर डायड इन दिनों खूब चर्चा में है। फिल्म के डॉयलॉग दर्शकों की जुबान पर चढ़ चुके हैं।

फिल्म में युद्ध के दौरान जसवंत सिंह कहते हैं ‘हम लोग लौटें न लौटें, ये बक्से लौटें न लौटें, लेकिन हमारी कहानियां लौटती रहेंगी…’ युद्ध में जब चीनी सेना भारतीय सेना पर भारी पड़ने लगती है तो आर्मी ऑफिसर जसवंत सिंह को पोस्ट छोड़ने के लिए कहते हैं, तब वे कहते हैं ‘मरुंगा-यहीं मरुंगा, लेकिन ये पोस्ट नहीं छोडूंगा’। फिल्म के डॉयलॉग देशभक्ति में डूबे हैं, जो कि दर्शकों में जोश भर देते हैं। फिल्म में युद्ध के दौरान गोली लगने पर जसवंत सिंह और उनके सहयोगी कहते हैं- ‘फौजी पर जंक न लगे इसलिय होती हैं जंग’।

जसवंत सिंह के डॉयलॉग ‘तुम्हारे आने वाले कल के लिए उन्होंने अपना आज कुर्बान कर दिया…में शहीदों के बलिदान की भावना नजर आती है। फिल्म के डॉयलॉग्स दर्शकों में जोश भरने के साथ ही उन्हें भावुक कर देते हैं। फिल्म को दर्शकों की खूब तारीफ मिल है। इस बहादुरी के लिए गढ़वाल राइफल्स के जवान जसवंत सिह को महावीर चक्र दिया गया. अरुणाचल प्रदेश की रक्षा करने वाले जसवंत सिंह को उनकी अकल्पनीय वीरता की वजह से ही स्थानीय लोग भगवान का दर्जा देते हैं. जसवंत सिंह के इस अदम्य शौर्य की अद्भुत दास्तां को सलाम!

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