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पहले महावीर चक्र विजेता थे शहीद दीवान सिंह दानू

04/11/25
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड को वीरों की भूमि भी कहा जाता है. इस पहाड़ी प्रदेश ने देश को एक से बढ़कर एक सैनिक दिए हैं. विकासखंड मुनस्यारी के ग्राम पंचायत गिन्नी के पुरदम तोक निवासी उदय सिंह दानू और रमुली देवी के पुत्र दीवान सिंह दानू का जन्म 4 मार्च 1923 को हुआ. दीवान सिंह 20 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना में भर्ती हुए. 1 जून 1946 को उनकी पहली पोस्टिंग चार कुमाऊं रेजीमेंट में हुई. 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली. इसके कुछ ही समय बाद पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया. पाकिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध में सिपाही दीवान सिंह कश्मीर के बडगाम में 3 नवम्बर 1947 को शहीद हो गए. जब दीवान सिंह शहीद हुए थे उस समय उनकी उम्र महज 21 साल थी. ऐसे ही एक वीर सैनिक हुए हैं देश के पहले महावीर चक्र विजेता दीवान सिंह दानू. दानू ने कबायली आक्रमणकारियों के खिलाफ ऐसी वीरता दिखाई थी कि शहीद होने के बाद वो देश के पहले महावीर चक्र विजेता बने. सोमवार को महावीर चक्र विजेता दीवान सिंह दानू की पुण्यतिथि यानी शहादत दिवस था. सीमांत जिला पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र के मुनस्यारी निवासी भारत के प्रथम महावीर चक्र विजेता सिपाही शहीद दीवान सिंह दानू ने पाकिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध में 3 नवंबर 1947 को जम्मू कश्मीर में अपना बलिदान दिया था. 15 कबायलियों को मौत के घाट उतारने के बाद दुश्मनों की गोलियों का सामना करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने के बाद भी ब्रेन गन उनके हाथों में ही बंधी थी. सिपाही दीवान सिंह की प्लाटून जम्मू के बडगाम में हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए तैनात थी. दीवान सिंह कुमाऊं रेजीमेंट की डी कंपनी में ब्रेन गनर के रूप में तैनात थे. पाकिस्तान समर्थक कबायलियों ने हवाई अड्डे पर अचानक आक्रमण कर दिया. भारतीय सेना ने उनका कड़ा मुकाबला किया था. सिपाही दीवान सिंह ने ब्रेन गन से 15 से अधिक पाकिस्तानी कबायलियों को मौत के घाट उतार दिया. इसी बीच कबायलियों की गोलियों का सामना करते हुए दीवान सिंह शहीद हो गए थे. जब उनका पार्थिव शरीर मिला तो ब्रेन गन उनके हाथों में जकड़ी हुई थी. कुमाऊं रेजीमेंट की इतिहास पुस्तक में भी दीवान सिंह के अदम्य साहस की गाथा लिखी हुई है. जम्मू कश्मीर हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी सेना के हमले को रोकने के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र जबकि सिपाही दीवान सिंह को मरणोपरांत प्रथम महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. : तत्कालीन प्रधानमंत्री ने शहीद दीवान सिंह के पिता उदय सिंह को हस्तलिखित पत्र भेजा था. जिसमें लिखा था-हिंद की जनता की ओर से और अपनी तरफ से मैं आपके दुख और रंज में यह संदेश भेज रहा हूं. हमारी दिली हमदर्दी आपके साथ है. देश की सेवा में जो यह बलिदान हुआ है, इसके लिए देश कृतज्ञ है. हमारी प्रार्थना है कि इससे आपको कुछ धीरज और शांति मिले. कुमाऊं रेजीमेंट के सेंटर रानीखेत में प्रथम महावीर चक्र विजेता दीवान सिंह के नाम पर दीवान हाल बनाया गया है. राजकीय इंटर कॉलेज बिर्थी और शहीद के गांव पुरदम तक जाने वाले मोटर मार्ग का नामकरण शहीद दीवान सिंह दानू के नाम पर रखा गया है. बिर्थी इंटर कॉलेज में उनकी एक मूर्ति भी स्थापित की गई है. पूर्व सैनिक संगठन के प्रयासों से 76 वीं पुण्यतिथि पर 3 नवंबर 2023 के दिन वीर की प्रतिमा और स्मारक स्थापित किया गया. देश के प्रथम महावीर चक्र विजेता की तस्वीर किसी ने नहीं देखी थी. यहां तक कि उनके परिवारजनों को भी उनका चेहरा याद नहीं था. इसके बाद पूर्व सैनिक संगठन के प्रयासों से उनके सैन्य दस्तावेजों से कुमाऊं रेजीमेंट सेंटर रानीखेत से उनकी फोटो प्राप्त की. उसके माध्यम से उनकी प्रतिमा बनाई गई. पूर्व सैनिक संगठन के अध्यक्ष बताते हैं कि-देश की रक्षा के लिए शहीद दीवान सिंह ने अपने प्राणों की आहूति दी, लेकिन उनकी प्रतिमा बनाने के लिए परिजनों के पास फोटो नहीं थी. इसके बाद रानीखेत मुख्यालय में संपर्क किया गया. वहां से फोटो मिलने के बाद प्रतिमा का निर्माण किया गया.  देश के पहले महावीर चक्र प्राप्त शहीद दीवान सिंह दानू के गांव के लिए उनकी शहादत के 78 साल बाद भी सड़क नहीं थी. गांव के लोगों को मीलों की दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी. उनके गांव के लिए इसी साल सड़क पहुंची है. देश में प्रतिष्ठित महावीर चक्र पाने वाले पहले व्यक्ति दीवान सिंह दानू ने अपने वीरतापूर्ण कार्यों और अटूट दृढ़ संकल्प से इतिहास रचा। विपरीत परिस्थितियों में उनकी वीरता और साहस ने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शानदार उदाहरण स्थापित किया। अपने देश की रक्षा के लिए दानू का निस्वार्थ बलिदान और समर्पण हमेशा वीरता और देशभक्ति के चमकदार प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा।दीवान सिंह दानू ने 15 से अधिक पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को मार गिराकर अपनी मातृभूमि की बहादुरी से रक्षा की थी। उनका अटूट साहस और बहादुरी चमक उठी जब उन्होंने निडर होकर आदिवासियों से लड़ाई की और अपनी मरते दम तक पीछे हटने से इनकार कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, सम्मानित भारतीय सेना में कार्यरत साहसी सैनिक दीवान सिंह, भारतीय भूमि की सुरक्षा की रक्षा के लिए अटूट समर्पण प्रदर्शित करते हुए, युद्ध की कठिन परिस्थितियों के बीच बहादुरी से आग की बौछार करते रहे। निडर सैनिक दीवान सिंह द्वारा प्रदर्शित दुस्साहसिक और खतरनाक आचरण से परेशान होकर, पाकिस्तानी सेना ने उन्हें अपने प्राथमिक लक्ष्य के रूप में चुना, सभी संभावित कोणों से बहुमुखी हमला किया, अंततः दीवान सिंह की छाती पर एक जोरदार प्रहार किया। इस गंभीर घाव से विचलित हुए बिना, दीवान सिंह दानू ने पाकिस्तानी आदिवासियों के साथ भीषण टकराव में अदम्य साहस और वीरता का प्रदर्शन किया। दुखद बात यह है कि इस दर्दनाक संघर्ष के बीच ही दीवान सिंह दानू ने अपने प्रिय देश की सुरक्षा और भलाई को बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति देकर सर्वोच्च बलिदान दिया।भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया, जो एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि स्वतंत्र भारत में यह सम्मान पहली बार दिया गया था। दीवान सिंह दानू की वीरता और बलिदान को स्वीकार करते हुए, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पूरे राष्ट्र की ओर से आभार व्यक्त करते हुए, शहीद सैनिक के पिता उदय सिंह को एक हार्दिक पत्र लिखा। अपने पत्र में, नेहरू ने देश की सेवा में दानू द्वारा किए गए बलिदान को स्वीकार करते हुए गहरा दुख और सहानुभूति व्यक्त की। उन्होंने इस कठिन समय के दौरान दुखी परिवार को आराम और शांति के लिए प्रार्थना भी की।दीवान सिंह दानू द्वारा प्रदर्शित निडरता और वीरता के अविश्वसनीय कार्यों को “कुमाऊं रेजिमेंट का इतिहास” नामक प्रसिद्ध प्रकाशन में बड़े पैमाने पर प्रलेखित किया गया है। इस पुस्तक के पन्नों के भीतर, लेखक गर्व से पाकिस्तानी सेना की जनजातीय ताकतों के खिलाफ एक दुर्जेय लड़ाई के सामने दीवान सिंह दानू द्वारा दिखाए गए अटूट साहस और बहादुरी का वर्णन करता है।दीवान सिंह का दृढ़ संकल्प और लचीलापन अद्वितीय था क्योंकि उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी। यहां तक ​​कि जब उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली, तब भी उन्होंने अपने हथियार को थामे रखा, जो उनके साथियों और उनके उद्देश्य की रक्षा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था।  लेकिन ‘महावीर चक्र’ प्राप्त करने वाले शहीद के परिवार को मिलने वाली अनेक सुविधाओं से वह वंचित रहे। मेजर सोमनाथ शर्मा तथा सिपाही दिवान सिंह दानु की युद्ध भूमी में वीर गति प्राप्त करते समय एक समान उम्र थी, मात्र 24 वर्ष। सिपाही दिवान सिंह दानू व उसकी पत्नी खिमुली देवी की कोई संतान नही थी। एक महावीर चक्र विजेता शहीद की विधवा को मिलने वाली आर्थिक व अन्य सुविधाओं की जानकारियों के अभाव में, खिमुली देवी के माँ-बाप ने शहीद के परिवार से नाता तोड़कर उसकी अन्यत्र दूसरे गाँव में दूसरी शादी कर दी थी। महावीर चक्र विजेता शहीद सिपाही दिवान सिंह दानु के माता- पिता व मासूम भाई-बहन  बेबस रह गए। द्वितीय सर्वोच्च सैन्य अलंकरण ‘महावीर चक्र’ (मरणोपरांत) प्राप्त सिपाही दिवान सिंह दानु के पाकिस्तानियों के विरुद्ध बड़गाँव युद्ध में वीरगति होने के पश्चात् शासन ने 20 एकड़ भूमी व अनेक सुविधायें देने की घोषणायें की थी। लेकिन वह घोषणायें धरातल में क्रियान्वयन नही हुई। 62 वर्ष के पश्चात् सन् 2009 में उत्तराखण्ड के माननीय राज्यपाल द्वारा, बिर्थी के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का नाम ‘महावीर चक्र विजेता, शहीद दिवान सिंह दान’ु के नाम किया गया। वर्तमान में यह विद्यालय उन्नत होकर “महावीर चक्र विजेता, सिपाही दिवान सिंह दानु राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय”  के नाम से जाना जाता है।बिर्थी गाँव निवासी व सेना के पूर्व सूबेदार मेजर श्री किशन सिंह बृथ्वाल, महावीर चक्र विजेता सिपाही दिवान सिंह दानु राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय  में सन् 2013 से लेकर 2014 तक अभिवाहक संघ के अध्यक्ष रहने के मध्य, उनके मस्तिष्क में एक दूरदर्शी और विवेकपूर्ण विचार आया कि मुनस्यारी क्षेत्र के इस महान योद्धा  महावीर चक्र विजेता सिपाही दिवान सिंह दानु की प्रतिमा विद्यालय के प्रांगण में स्थापित हो। श्री रमेश सिंह बृथ्वाल, श्री जगत सिंह बृथ्वाल, स्वर्गीय सुन्दर सिंह राठौर तथा श्री देव सिंह बृथ्वाल (पूर्व प्रधानाचार्य) इन सभी ने उनके इस विचार का स्वागत किया। बिर्थी क्षेत्र के प्रबुद्ध व जागरुक जनों ने धन एकत्र कर, महावीर चक्र विजेता शहीद सिपाही दिवान सिंह दानु की प्रतिमा को 03 नवंबर 2025 को विद्यालय में उनकी 78 वीं पुण्यतिथि पर स्थापित किया गया। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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