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उत्तराखंड पहाड़ों के लिए अब आर्थिक और राजनीतिक संकट

12/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड के 13 जिलों में 9 जिले पर्वतीय माने जाते हैं, जबकि 4 जिलों को मैदानी जिलों के रूप में पहचाना जाता है. अब राज्य में जनसंख्या के आधार पर आकलन करें तो साल 1971 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 4,491,732 थी. जिसमें 9 पर्वतीय जिलों की जनसंख्या 2,474,179 थी. जबकि, 4 मैदानी क्षेत्र की जनसंख्या 2,017,553 थी.उत्तराखंड में पहाड़ों का आर्थिक, राजनीतिक समीकरण बदल रहा है. ये हालात पर्वतीय क्षेत्रों में न केवल बजटीय बंटवारे को हाशिए पर ला रहे हैं, बल्कि प्रतिनिधित्व को भी कम कर रहे हैं. शायद यही कारण है कि राज्य में भौगोलिक आधार पर परिसीमन और ‘अपनी गणना अपने गांव’ जैसे अभियान की बात तेजी से होने लगी है. उत्तराखंड के मैदानी जिलों में कैसे हो रहा जनसंख्या का ओवरलोड और आंकड़े कैसे पर्वतीय जिलों से मोह भंग की बयां कर रहें तस्वीर. इसकी जानकारी से आपको रूबरू करवाते हैं. दरअसल, राज्य में जनसंख्या का अनियंत्रित बंटवारा कई नई मुसीबतों को न्योता दे रहा हैराजनीतिक रूप से देखें तो 9 पर्वतीय जिलों में 40 विधानसभा सीटें थी और 4 मैदानी जिलों में 30 विधानसभा सीटें थीं. यानी मैदानी जिलों के मुकाबले पर्वतीय जिलों में 10 सीटें ज्यादा थी, लेकिन समय के साथ यह आंकड़ा पलट गया और सत्ता पाने की सीढ़ी पहाड़ों से खिसककर मैदानों में आ गई. उत्तराखंड में साल 2002 के विधानसभा चुनाव साल 1971 की जनगणना के आधार पर जिलों में तय गई की गई सीटों के रूप में हुए. इसके बाद साल 2001 में जनगणना हुई तो जनसंख्या का अनियंत्रित स्वरूप दिखाई देने लगा. जनगणना के बाद पहाड़ के 9 जिलों में जनसंख्या करीब 13 लाख बढ़कर 3,761,496 हो गई, लेकिन मैदानी जिलों में जनसंख्या का चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया. यहां जनसंख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गई. यानी करीब 27 लाख लोग पिछली जनगणना के मुकाबले मैदान के चार जिलों में बढ़ गए. यहां जनसंख्या 2001 में 4,727,853 हो गई. उधर, उत्तराखंड की जनसंख्या भी साल 1971 के मुकाबले दोगुनी हो गई और जनसंख्या बढ़कर 8,489,349 हो गई.  विधानसभा की बेसिक इकाई लेखपाल क्षेत्र होता है. जबकि, लोकसभा सीट को विधानसभा क्षेत्र के आधार पर बांटा जाता है. राज्य स्थापना के दौरान केंद्र ने उत्तराखंड को 70 विधानसभा वाला राज्य घोषित किया. जबकि, इसके बाद परिसीमन आयोग ने किस जिले में कितनी सीटें होंगी, इसका निर्धारण किया. वैसे तो पर्वतीय जिलों को 10 फीसदी जनसंख्या में राहत देकर सीट का आकलन हुआ, लेकिन इसके बावजूद जनसंख्या में इस कदर बदलाव हुआ कि साल 2006 के परिसीमन में 6 सीटें पहाड़ों से कम होकर मैदान में जुड़ गई. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या के बदल रहे समीकरण न केवल खाली होते गांव की समस्या को पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह प्रति क्षेत्र में आर्थिक बंटवारे को भी बिगाड़ रहे हैं. इस बात को ऐसे समझ जा सकता है कि जनसंख्या के कम होने से योजनाएं भी पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित हो रही हैं और इसका बजट यह प्रावधान भी कम हो रहा है. उधर, सीटें कम होने के कारण यहां प्रतिनिधित्व कम होगा और इस प्रतिनिधित्व के कम होने से भी मिलने वाला बजट भी प्रभावित होगा. इस मामले पर राज्य आंदोलनकारी भी चिंतित नजर आते हैं. उनका कहना है कि परिसीमन होना चाहिए, लेकिन भौगोलिक आधार को ध्यान में रखते हुए. उधर, अब 2027 में फिर से प्रदेश की जनसंख्या का आकलन होना है, जिसमें मौजूदा आंकड़ों के ट्रेंड बताते हैं कि प्रदेश की जनसंख्या पर्वतीय जिलों में इस बार कम होगी. जबकि, मैदान में करीब 10 लाख जनसंख्या बढ़ सकती है. जाहिर है कि इस स्थिति के कारण पर्वतीय 9 जिलों में चार सीटें कम हो सकती हैं और यह सीट मैदानी जिलों में जाकर विधानसभाओं की कुल संख्या 43 हो सकती है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि देश के नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की तरह ही उत्तराखंड में भी व्यवस्था किया जाना चाहिए. जो स्थिति नॉर्थ ईस्ट में है, वही व्यवस्था उत्तराखंड में भी होनी चाहिए. जबकि, इस समय स्थिति ये है कि जो बजट देहरादून के विधायक को मिल रहा है, वही बजट पिथौरागढ़ या दूरस्थ क्षेत्र के विधायक को भी मिल रहा है, जो कि बेहद कम है. पहले ही हम कुछ सीटें खो चुके हैं, जो कि राज्य और राष्ट्रहित में नहीं है. उत्तराखंड 25 साल का हो चुका है. इन 25 सालों में कभी कांग्रेस, तो कभी बीजेपी के पास सत्ता रही. आंदोलन से निकले पर्वतीय राज्य के कई सपने आज भी अधूरे हैं? जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने पर विधानसभा सीटें निश्चित रूप से कम हो जाएंगी और आने वाले समय में बचे-खुचे गांवों का अस्तित्व भी खत्म हो जाएगा. उनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से अलग राज्य के लिए किए गए आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व भी खत्म हो जाएगा. पर्यावरणविद अनिल जोशी मानते हैं कि भौगोलिक आधार पर परिसीमन होना चाहिए. उनका कहना है कि पिछले परिसीमन में ग्रामीण क्षेत्रों की सीटें कम हुई थीं जबकि शहरी क्षेत्र देहरादून की सीटें बढ़ गई थीं. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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