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पेरिस तक पहाड़ की लोक विधा पहुंचाने वाले उपेक्षित

31/03/21
in उत्तराखंड, संस्कृति
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की लोक संस्कृति की पहचान है यहां के गाने। पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते चलन के कारण आज ये खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। लोक गायक स्थानीय संस्कृति की खराब स्थिति से काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि आज की संगीत से गांवों का दूर होता जाना हमेशा दुख देता है। उनका कहना है लोक संगीत लोगों के दुख दर्द को बयां करते हैं। राज्य के लोकगीत मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का एक अहम जरिया है। लोक गीत हमारा दुख.दर्द बयां करते हैं। इसी कारण झोड़ा, चांचरी, न्योली, छपेली, भगनौल आदि हमेशा से जनमानस के करीब रहे हैं।

कुछ सालों की बात करें तो पिछले दस.बारह सालों में लोक संगीत में काफी बदलाव आया है। तड़क.भड़क वाले गीत अब अधिक लिखे और गाए जाते हैं। उत्तराखंड की लोक विधा की समृद्ध विरासत संरक्षण के अभाव में खतरे में है। सरकार ने लोक विधा के संरक्षण के लिए अलग से संस्कृति मंत्रालय का गठन किया तो किया है, तमाम योजनाएं भी चलाई हैं, लेकिन धरातल पर ठोस उपाय होते नहीं दिख रहे। लोक विधा जागर और मालूशाही की धमक पेरिस तक पहुंचाने वाले लोक विधा के प्रख्यात जानकार धनी राम अपने ही घर में उपेक्षित हैं। वह लोक संस्कृति के संरक्षण के उपाय न होने से खिन्न हैं।

बागेश्वर जिला मुख्यालय के नजदीक मेहनिया निवासी 69 वर्षीय धनी राम जागर के साथ ही भगनौल और लोकगाथा मालूशाही के अच्छे जानकार हैं। वह बागेश्वर के ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले की शान रहे हैं। धनी राम की जागर, भगनौल के लिए काफी मांग रहती है। वह झोड़ा, चांचरी के भी विशेषज्ञ हैं। उनकी इसी विधा को पहचान कर वर्ष 2005 में संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार ने लोक विधा के जानकारों का 12 सदस्यीय दल फ्रांस की राजधानी पेरिस भेजा था। इस दल में शामिल धनी राम बताते हैं कि फ्रांस में उन लोगों ने जागर के साथ ही मालूशाही की प्रस्तुति दी थी। पेरिस में रहने वाले अप्रवासी उत्तराखंडियों के साथ ही वहां के लोगों ने इन प्रस्तुतियों को काफी सराहा था। धनी राम ने लोक विधा के प्रसार के लिए देवभूमि उत्तराखंड लोक कला मंच नाम से संस्था बनाई है। वह लोगों को जागर, भगनौल, झोड़ा, चांचरी के साथ ही अन्य लोक विधाओं की जानकारी देते हैं। उनके शिष्य मेहनिया निवासी हरीश राम और कांकड़ निवासी दीपक राम ने भी जागर विधा को आत्मसात किया है। धनी राम कहते हैं कि लोक विधा को संस्थान खोलकर ही संरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन इस दिशा में काम नहीं हो रहा है। लोक विधाओं के जानकार लोगों को संस्कृति विभाग से पेंशन देने घोषणा की थी, लेकिन फ्रांस तक लोक विधा की अलख जगाने वाले धनी राम को पेंशन नहीं मिल रही है। उत्तराखंड में कई बार आवेदन करने के बाद भी उनकी पेंशन आज तक मंजूर नहीं हुई है। वृद्धावस्था पेंशन से ही वह गुजारा कर रहे हैं।

पेरिस में प्रस्तुति के लिए मिला था 200 डॉलर का पुरस्कार। धनी राम बताते हैं कि वर्ष 2005 में पेरिस में दी गई प्रस्तुति के लिए दल के प्रत्येक सदस्य को 200 अमेरिकी डॉलर बतौर पारितोषिक मिले थे। तब 15 डॉलर भारत सरकार ने काट दिए। कहा गया था कि इस धनराशि को उनके प्रोत्साहन में खर्च किया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मशकबीन बजाना हर किसी के बस की बात नहीं है। बारातों में आज भी छलिया दलों के साथ मशकबीन पीपरी बाजा वाला जरूर होता है। वह कहते हैं कि मशकबीन में गाने माहौल के हिसाब से सेट किए जाते हैं। बारात जाते वक्त ओम जय जगदीश वाली आरती का बाजा बजाया जाता है। उसके बाद माहौल के अनुसार बेड़ू पाको बारामासा, ओहो नरैण काफल पाको चैत या फिर झन जाए भौजी बिलौरी घासा, लागला बिलौरी का घामा जैसे गीत बजाए जाते हैं। वह 67 वर्ष की उम्र में भी जब मशकबीन में अपने आलाप छोड़ते हैं तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वह कहते हैं कि मशकबीन बजाते समय सांसों और फेफड़ों में काफी जोर पड़ता है। बारातों में जाने पर इतना पैसा नहीं मिलता कि परिवार की सही प्रकार से गुजर.बसर हो सके। अलबत्ता रोजगार का कोई विकल्प न होने के कारण उन्होंने अपने बेटे नरेंद्र प्रसाद को भी मशकबीन बजाना सिखा दिया है।

उत्तराखंंड की यह धरा जन आदोलन की भूमि रही है। यहां जनगीत फिंजाओं में गूजे हैं। जन कवि गिर्दा जन चेतना के कवि रहे हैं। उत्तराखंड आंदोलन में उनके गीत लेकर लोग सडकों पर आए हैं। चाहे हम नी ले सकों चाहे तुम नी सको, चाहे मैं न लाऊं, चाहे तुम न ला सको लेकिन कोई न कोई उस अवसर को जरूर लाएगा, की अभिव्यक्ति में साहिर लुधियानवी के उन शब्दों का प्रतिबिंब था, जिसमें सुबह होने का इंतजार था। बेवस जडता लाचारी टूटेगी और नई सुबह आएगी। गिर्दा के लोकसाहित्य में जन के लिए पुकार है। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की रचना है। बोला हे बंधु तुमते कनु उत्तराखंड चहेणु चा, भाईयों बताओ आपको कैसा उत्तराखंड चाहिए।

सत्तर के दशक में जब रैणी गांव में गोरा देवी और उनकी साथी पेंडों को बचाने के लिए पेडों से लिपट गई थी। तब जनचेतना के लिए पुकार थी, चला दीदी चला भुली त्यों डाल्यूं बचौला, छोटी बडी बहनों आओ इन पेडो को बचाने आगे आओ। यह गीत दरिया पर्वतों को पार करता हुआ पूरी दुनिया में पहुंचा और पर्यावरण का संदेश दे गया। पहाडों की व्यथा पर ही हीरा सिंह राणा का स्वर गूंजा, तेरु पहाड, मेरु पहाड। उत्तराखंड के आंदोलन में पहाडों में कवि चीमा का उद्घोष था ले मशाले चल पडे हैं लोग मेरे गांव के अब अधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। अतुल शर्मा की वाणी थी होश में आओ वो सत्ता के सौदागर। बेशक शब्द हिंदी में हो लेकिन आत्मा पहाड की रही। लोक कलाकारों का कहना है कि यदि समय रहते इस विधा को आदर के साथ सहेजा नहीं गया तो आने वाली पीढ़ी को मेले की संस्कृति जानने के लिए किताबों के पन्ने पलटने पड़ेंगे।

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