डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पेड़ों में जमीन को बांधे रहने की अद्भुत क्षमता होती है, साथ ही साथ यह पेड़ गर्मी के मौसम में अपने आसपास भूमिगत जल के स्तर को भी बनाए रखते हैं, यही कारण है कि उत्तराखंड में नालों, गधेरों, धारे और नौलों के आसपास इन पेड़ों को बहुतायत में पाया जाता था। इन पेड़ों में जमीन को बांधे रहने की अद्भुत क्षमता होती है, साथ ही साथ यह पेड़ गर्मी के मौसम में अपने आसपास भूमिगत जल के स्तर को भी बनाए रखते हैं, यही कारण है कि उत्तराखंड में नालों, गधेरों, धारे और नौलों के आसपास इन पेड़ों को बहुतायत में पाया जाता था। एक बार फिर अगर उत्तराखंड के पारंपरिक जल स्रोतों के आसपास चौड़ी पत्ती वाले ऐसे पेड़ों को बढ़ावा दिया जाए तो निश्चित रूप से यह जल स्रोत एक बार फिर रिचार्ज हो जाएंगे। इसके अलावा प्राकृतिक जल स्रोतों के आसपास हैंडपंपों को भी हतोत्साहित करने की जरूरत है।
चारा प्रजतियाँ व पशुओं के लिए अति पोषक घास व जड़ी बूटियां समाप्त प्राय हो गईं हैं। इन परिस्थितियों में चारागाह प्रबंध में कुछ सुधार किए जाने जरुरी हो जाते हैं। जैसे कि नियंत्रित एवं चक्रानुसार चराई पर ध्यान दिया जाए। चरागाहों को कुछ समय तक क्रमवार चराई के लिए संरक्षित भी किया जाए। चरागाहों व बुग्यालों में चारे कि बढ़त व उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए पशुचारकों का इन स्थान विशेषों में जाना सुनिश्चित किया जाए। यह ध्यान दिया जाए कि पशुचारक एक ही इलाके में पशुओं को न चरायें। हालांकि पहले इस परंपरा का ग्रामीण पालन करते रहे जिससे पौष्टिक प्रजातियाँ सही तरह से पनपती थीं। दूसरी चिंता खरपतवार और अपौष्टिक प्रजाति की वनस्पति के तेजी से पनपने की है जिस पर नियंत्रण करने पर गंभीर नहीं रहा गया है। इनके निदान व उन्मूलन के लिए वैज्ञानिकों को पहल करनी होगीण् अगर वह सरल व स्पष्ट तरीके से ग्रामीणों को चारागाह विकास एवं प्रबंध के गुर सिखा दें तो पहाड़ के इस महत्वपूर्ण संसाधन का ह्रास किसी सीमा तक रोका जा सकता है। परंपरागत तरीकों व लोक थात में इन संसाधनों को बनाये बचाये रखने के गुर स्थानीय ग्रामवासी खूब जानते हैं पर उचित श्रृंखलाओं के अभाव से वह शोध और विकास का जिम्मा संभाली संस्थाओं से काफ़ी दूर हैं।
हिमाचल की तर्ज़ पर भू क़ानून बनवाने की अपेक्षा बारी.बारी सत्तानशीन होती कांग्रेस और भाजपा की सरकारों से कभी पूरी न हो सकी। उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश) ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की भू उपयोग से जुड़ी धारा 143 और कृषि भूमि की क्रय सीमा से जुड़ी धारा 154 मात्र ऐसे अवरोध थे जिनसे उत्तराखंड की, विशेषकर पहाड़ कीए ज़मीनों को बे रोकटोक नहीं ख़रीदा जा सकता था। 2019 आते.आते उत्तराखंड सरकार ने ज़मीनों की ख़रीद.फ़रोख्त में व्यवधान उत्पन्न करने वाले इन दो महत्वपूर्ण प्रावधानों को भी समाप्त कर दिया। सेक्शन 143 में 143 (ए) जोड़ दिया गया जिससे भू.उपयोग में बदलाव, यानी कृषि भूमि का लैंड यूज़ बदलकर कमर्शियल करवाना आसान हो गया। दूसरे, सेक्शन 154 के अनुसार औद्योगिक इस्तेमाल हेतु 12.5 एकड़ ख़रीद की जो सीमा थी उसे प्रावधान में अनुच्छेद (2) जोड़कर इस अवरोध को समाप्त कर दिया। सेक्शन 154 के लगभग निष्प्रभावी होने से अब एकड़ों कृषि भूमि उद्योग स्थापित करने हेतु क्रय की जा सकती हैण् साथ ही सरकार ने हर ज़िले में विकास प्राधिकरण की स्थापना कर दी जिसका मुख्य उद्देश्य इन जमीनों पर विवादास्पद रूप से परिभाषित उद्योगों के प्रस्तावों को स्वीकृति प्रदान करना है। वस्तुतः इसके दुष्परिणाम इस तरह भी सामने आने लगे हैं कि स्थानीय निकाय.ग्राम पंचायत आदि कमज़ोर पड़ती जा रही हैं और पहाड़ की ज़मीनों को कथित औद्योगिक विकास के नाम पर हथियाने का रास्ता एकदम साफ हो गया हैण् अक्टूबर 2002 में 7 कृषि उद्यानों की 130 हेक्टेयर ज़मीन ऐसी कंपनियों को दे दी गई जिनका बीज उत्पादन से दूर.दूर तक कोई संबंध नहीं था।
ये उद्यान पहाड़ के किसानों को औद्यानिक ज्ञान और पौध.बीज प्रदान करने के मक़सद से 1953 से उत्तरोत्तर विकसित किये गये थे। फ़िलहाल, उद्यानों की इस कहानी को यहीं छोड़ना पड़ेगा किंतु यह बताना आवश्यक होगा कि पहाड़ के कुछ हितैषियों की जागरूकता और हाईकोर्ट की सक्रियता से ये लूट उतने बड़े पैमाने पर होने से बच गई। उसके बाद भी पिछले 15 सालों में चोर दरवाज़ों से ज़मीनें बिकती रहीं, रजिस्ट्रियां होती रही हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में लंबे समय से कृषि कार्यों के लिए लकड़ी से बने उपकरण हल, नहेड़, जुंआ, दनेला आदि का प्रयोग होता आया है। इन उपकरणों के बनाने के लिए पहाड़ का कल्पवृक्ष माने जाने वाला बांज, उतीस, फल्यांट, सानण आदि चौड़ी पत्ती प्रजाति के हरे पेड़ों का उपयोग किया जाता है। किसी भी प्रकार के उचित विकल्प के अभाव व मजबूरी में किसानों द्वारा हर वर्ष बड़ी संख्या में जल संरक्षण, जैवविविधता और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बांज, उतीस, फल्यांट, सानण आदि चौड़ी पत्तीदार पेड़ों को काटा जाता है। जिसके चलते इन पेड़ों की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है।चौड़ी पत्ती प्रजाति पेड़ों के कटान से जंगलों में मौजूद जल स्रोतों, जैवविविधता के ह्रास के रूप में सामने आ रहा है। वन्य जीवों के आहार और आवास पर भी इसका विपरीत असर पड़ रहा है। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों की गैर हिमालयी नदियोंए जल स्रोतों में पानी का स्तर साल दर साल कम होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि इन नदियों के जल संभरण क्षेत्रों में चौड़े पत्तीदार पेड़ पहले की तुलना में काफी कम रह गए हैं।
वर्षा जल को भूजल में बदलने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। मानवीय आवश्यकताओं के लिए इन जंगलों का अनियंत्रित और अवैज्ञानिक दोहन होने से जंगलों की वर्षा जल को भूजल में बदलने की प्रक्रिया बाधित हो गई है, परिणाम स्वरूप जंगलों से निकलने वाले जल स्रोतों, नदियों में पानी का स्तर भी कम हो गया है।कृषि उपकरणों के लिए ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता कम करने के लिए राज्य के अलग.अलग हिस्सों में लंबे समय से प्रयास होते आ रहे हैं। लेकिन यह प्रयास स्थानीय स्तर तक ही सीमित होने और सफल नहीं होने से किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा और पेड़ो की कटाई भी नहीं रुक रही। ऐसे में स्याही देवी विकास समिति, शीतलाखेत ने 2012 में विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के साथ मिलकर वीण्एलण्स्याही लोह हल (विवेकानंद लैब स्याही हल) का निर्माण किया। समिति पिछले 12 साल से जंगल बचाओ.जीवन बचाओ अभियान चला रही है, जिसके तहत बांज व चौड़ी पत्ती वाली प्रजातियों को बचाने के लिए जोर दिया जा रहा है, क्योंकि यह पर्यावरण व जल संरक्षण में खासी भूमिका निभाते हैं। करीब 14 हज़ार से ज्यादा पेड़ पिछले कुछ सालों में कटने से बचे हैं। लंबे अरसे से चौड़ी पत्ती प्रजाति पेड़ों के अनियंत्रित और अवैज्ञानिक दोहन और वनाग्नि के कारण गैर हिमानी नदियों, गधेरों, जल स्रोतों में पानी की मात्रा साल दर साल कम होने से राज्य के अधिकांश गाँव, शहर तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं।
जल स्रोतों के सूखने से चिंतित राज्य सरकार द्वारा रिस्पना और कोसी नदी के पुनर्जीवन के लिए अभियान चलाया जा रहा है जिसमें मुख्य रूप से चाल, खाल, गड्ढे बनाकर वर्षा जल को रोक कर भूजल में बदलने और पौधारोपण पर कार्य किया जा रहा है। स्याही देवी विकास समिति ने कोसी नदी पुनर्जीवन अभियान में ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता खत्म करने के लिए कोसी नदी के जल संभरण क्षेत्र में मौजूद सभी गांवों के किसानों को वीण्एलण्स्याही हल देने और गैस कनेक्शन से वंचित परिवारों को गैस कनेक्शन देने का निर्णय लिया है। नदी पुनर्जीवन योजना में वीण्एलण् स्याही हल को शामिल करने से यह उम्मीद जगी है कि कोसी नदी के जल संभरण क्षेत्र में खेती से जुड़े लगभग 14,000 परिवारों को यह हल दिए जाने के बाद लकड़ी का हल बनाने के लिए काटे जा रहे हजारों पेड़ों की रक्षा हो पाएगी और सूख रहे जल स्रोतों को भी बचाने में मदद मिलेगी।












