डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 ई. को बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गाँव में त्रैलोक्य नाथ बोस के यहाँ हुआ था। खुदीराम बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। खुदीराम बोस की बड़ी बहन ने उनका लालन-पालन किया था। सन् 1905 ई. में बंगाल का विभाजन होने के बाद खुदीराम बोस देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था।
खुदीराम बोस राजनीतिक गतिविधियों में स्कूल के दिनों से ही भाग लेने लगे थे। वे जलसे जलूसों में शामिल होते थे तथा अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ नारे लगाते थे। उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े।
पार्टी के सदस्य:
वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वहां महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चलाए गए आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।
पुलिस ने 28 फ़रवरी, सन् 1906 ई. को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बाँटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस मज़बूत थे। पुलिस की बोस ने पिटाई की और उसके शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन् 1906 ई. को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसम्बर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे। उन्होंने अंग्रेज़ी चीज़ों के बहिष्कार आन्दोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया।
ब्रिटिश राज के विरुद्ध:
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में कई क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध आवाज़ उठाई। खुदीराम बोस भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास में संभवतया सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे।
खुदीराम ने, प्रफुल्ल चाकी के साथ, एक ब्रिटिश जज, मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड की हत्या करने का प्रयास किया, जिस गाड़ी में उन्हें संदेह था कि वह व्यक्ति अंदर था, उस पर बम फेंका गया। हालांकि, मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को एक अलग गाड़ी में बैठाया गया, और बम फेंकने का परिणाम दो ब्रिटिश महिलाओं की मौत गिरफ्तारी से पहले प्रफुल्ल ने खुद को गोली मार ली। खुदीराम को गिरफ्तार किया गया और उन दोनों महिलाओं की हत्या के लिए मुकदमा चलाया गया, अंत में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।18 अगस्त 1908 को उनको फांसी दे दी गयी। फांसी के समय खुदीराम की उम्र 18 साल, थी. जन्मदिनपर नमन.
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*











