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भुलाए नहीं जा सकते पहाड़ के गांधी

18/08/20
in उत्तराखंड
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
स्वर्गीय इन्द्रमणि बडोनी 24 दिसम्बर 1924 को टिहरी के ओखड़ी गांव में जन्मे बडोनी मूलतः एक संस्कृति कर्मी थे। 1956 की गणतंत्र दिवस परेड को कौन भूल सकता है, 1956 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस के मौके पर इन्द्रमणि बडोनी ने हिंदाव के लोक कलाकार शिवजनी ढुंग, गिराज ढुंग के नेतृत्व में केदार नृत्य का ऐसा समा बांधा की तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी उनके साथ थिरक उठे थे। सुरेशानंद बडोनी के पुत्र इन्द्रमणि बडोनी की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए वह नैनीताल और देहरादून रहे। इसके बाद नौकरी के लिए बंबई गये जहाँ से वह स्वास्थ्य कारणों से वापस अपने गांव लौट आये। उनका विवाह 19 साल की उम्र में सुरजी देवी से हुआ था, 1961 में वो गाँव के प्रधान बने। इसके बाद जखोली विकास खंड के प्रमुख बने। बाद में उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान सभा में तीन बार देवप्रयाग विधानसाभ सीट से जीतकर प्रतिनिधित्व किया। 1977 का चुनाव उन्होंने निर्दलीय लड़ा और जीता भी।
1980 में उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल का हाथ थामा और जीवन भर उसके एक्टिव सदस्य रहे। उत्तर प्रदेश में बनारसी दास गुप्त के मुख्यमंत्रित्व काल में वे पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष रहे। बडोनी ने 1989 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा। यह चुनाव बडोनी दस हजार वोटो से हार गये, कहते हैं कि पर्चा भरते समय बडोनी की जेब में मात्र एक रुपया था, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी ब्रह्मदत्त ने लाखों रुपया खर्च किया। 1988 में उत्तराखंड क्रांतिदल के बैनर तले बडोनी ने 105 दिन की पदयात्रा की। यह पदपात्रा पिथौरागढ़ के तवाघाट से देहरादून तक चली। उन्होंने गांव के घर.घर जाकर लोगों को अलग राज्य के फायदे बताये। 1992 में उन्होंने बागेश्वर में मकर संक्रांति के दिन उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण घोषित कर दी। स्वर्गीय इन्द्रमणि बडोनी, ये वो नाम है जो उत्तराखंड की आत्मा में बसा है। आज अगर आप उत्तराखंड में एक अलग राज्य की हवा को महसूस कर रहे हैं तो ये इस तूफान की वजह से हो सका। 1994 का उत्तराखंड आन्दोलन, इसके सूत्रधार थे इंद्रमणि बडोनी। जुबान के पक्के, मजबूत इरादों वाले और सत्ता को हिलाकर रख देने वाले इस शख्स को आज नमन करें।
2 अगस्त 1994 का दिन उत्तराखंड कभी नहीं भूल पाएगा। पौड़ी प्रेक्षागृह के सामने इंद्रमणि बडोनी आमरण अनशन पर बैठ गए। राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई थी। इसके बाद 7 अगस्त 1994 को इंद्रमणि बडोनी को जबरदस्ती मेरठ अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। इसके बाद उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल ले जाया गया थाए जहां उन्हें सख्त पहरे में रखा गया। जनता की तरफ से भारी दबाव आया और तब जाकर 30वें दिन इंद्रमणि बडोनी ने अनशन खत्म किया। ये इंद्रमणि बडोनी की आवाज का ही दम था कि इसके बाद ये आन्दोलन पूरे उत्तराखंड में फैल चुका था। कला और संस्कृति से बेहद लगाव रखने वाले बडोनी ने ही पहली बार माधो सिंह भंडारी नाटक का मंचन किया था। उन्होंने दिल्ली और मुम्बई जैसे बड़े शहरों में भी इसका मंचन कराया। शिक्षा क्षेत्र में काम करते हुये उन्होंने गढ़वाल में कई स्कूल खोले, जिनमें इंटरमीडियेट कॉलेज कठूड, मैगाधार, धूतू एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय बुगालीधार प्रमुख हैं। आजादी के बाद गांधीजी की शिष्या मीरा बेन 1953 में टिहरी की यात्रा पर गयी। जब वह अखोड़ी गाँव पहुंची तो उन्होंने गाँव के विकास के लिये गांव के किसी शिक्षित व्यक्ति से बात करनी चाही। अखोड़ी गांव में बडोनी ही एकमात्र शिक्षित व्यक्ति थे। मीरा बेन की प्रेरणा से ही बडोनी सामाजिक कार्यों में जुट गए।
बीबीसी ने उत्तराखंड आन्दोलन पर अपनी एक रिपोर्ट छापी जिसमें उसने लिखा अगर आपने जीवित और चलते.फिरते गांधी को देखना है तो आप उत्तराखंड चले जायें। वहां गांधी आज भी विराट जनांदोलनों का नेतृत्व कर रहा है। इस व्यक्ति का नाम था इन्द्रमणि बडोनी। उत्तराखंड राज्य की मांग करने वाले लोगों में सबसे प्रमुख और बड़ा नाम है इन्द्रमणि बडोनी। आज उनकी पुण्यतिथि है। माना जाता है कि सहस्त्रताल, खतलिंग ग्लेशियर, पंवालीकांठा ट्रेक की पहली यात्रा इन्द्रमणि बडोनी द्वारा ही की गयी। 18 अगस्त, 1999 को ऋषिकेश के विट्ठल आश्रम में उनका निधन हो गया। वाशिंगटन पोस्ट ने इन्द्रमणि बडोनी को ष्पहाड़ का पितरों को श्राद्ध पक्ष में तर्पण देने का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है।
इस मौके पर कुछ ऐसी शख्सियतें भी याद आती हैं, जिन्होंने अपनी माटी, मुल्क व देश और प्रदेश की भलाई के लिए सब कुछ त्याग दिया। ऐसी महान विभूतियों में स्व। इंद्रमणी बडोनी भी एक रहे हैं। उत्तराखंड के इस सच्चे सपूत ने 72 साल की उम्र में निर्णायक लड़ाई लड़ी। ऐतिहासिक जनान्दोलन के बाद भी इंद्रमणि बडोनी1994 से अगस्त 1999 तक उत्तराखंड राज्य के लिए जूझते रहे। लगातार संघर्ष, जनांदोलनों की वजह से उनकी तबीयत खराब होने लगी। 18 अगस्त 1999 को उत्तराखंड का ये सपूत अनंत यात्रा की तरफ महाप्रयाण कर गया। जिनको अलग उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान बीबीसी ने पहाड़ के गांधी नाम दिया था। गांधीवादी विचारधारा की ऐसी शख्सियत को आज भी राज्य में याद किया जाता है गांधी कहा है।
जुलाई 1992 में स्थानीय उत्तराखंड क्रांति दल ने गैरसैंण को पहाड़ की राजधानी घोषित किया और ब्रिटिश काल में हुए पेशावर कांड के नायक रहे एक सैनिक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर इसका नाम ष्चंद्र नगरष् रखते हुए राजधानी क्षेत्र का शिलान्यास भी किया। इसके बाद उत्तराखंड राज्य आंदोलन की परिणीति साल 2000 में अलग राज्य की स्थापना के साथ हुई। ग्रीष्मकालीन का खेल गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को हाशिए पर है। उत्तराखंड एक छोटा संसाधन.विहीन राज्य है, जो दो राजधानियों का बोझ नहीं उठा सकता!

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