डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन इसने बड़े पैमाने पर प्रदूषण भी फैलाया है। चार धाम सर्किट के अलावा, बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक हेमकुंड साहिब, हरिद्वार-ऋषिकेश, नैनीताल और मसूरी जैसे स्थलों पर भी जाते हैं।हालांकि, पर्यटकों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ पहाड़ों में कचरे का जमाव एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। हरिद्वार जैसे धार्मिक शहरों में कुछ ही दिनों में हजारों टन कचरा जमा हो जाता है, जिससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ जाता है। पहाड़ों की रानी मसूरी में पर्यटकों की बढ़ती भीड़ का असर अब केवल जाम तक सीमित नहीं है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ मसूरी में कचरा उत्पादन तेजी से बढ़ा है और इसका दबाव देहरादून की कूड़ा निस्तारण व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। पर्यटकों के हुजूम से दून और मसूरी में बीते एक सप्ताह में ही 30 प्रतिशत अतिरिक्त कूड़ा निकला है। जबकि, मसूरी से निकलने वाले कचरे का एक हिस्सा देहरादून स्थित कूड़ा निस्तारण व्यवस्था तक पहुंचता है। ऐसे में दून के शीशमबाड़ा कूड़ा प्रबंधन प्लांट पर भी भार बढ़ा है।मसूरी नगर पालिका के आंकड़ों के अनुसार, बीते दो सप्ताह में 505 टन ठोस कचरा एकत्र किया गया। इस दौरान रोजाना औसतन करीब 35 टन कचरा निकला। नगर पालिका के अनुसार यह सामान्य दिनों की तुलना में करीब 20 से 30 प्रतिशत अधिक है।इसी प्रकार देहरादून में भी रोजाना करीब पांच सौ टन कूड़ा उत्सर्जित हो रहा है, जो कि सामान्य दिनों में साढ़े चार सौ टन के आसपास रहता है। इसके अलावा मसूरी से कुल कचरे का करीब 30 प्रतिशत कूड़ा भी देहरादून के शीशमबाड़ा प्लांट में पहुंचता है। मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, शीशमबाड़ा में पिछले कुछ दिनों से अतिरिक्त दबाव है, मसूरी में सामान्य आफ सीजन के दौरान प्रतिदिन करीब 25 से 28 टन कचरा निकलता है। वर्तमान अवधि में यह औसत करीब 38 टन पहुंच गया है, जबकि पीक पर्यटन अवधि में कचरा उत्सर्जन करीब 46 से 48 टन प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है।होटल, रेस्टोरेंट, बाजार और पर्यटन स्थलों पर बढ़ी गतिविधियों को कचरा बढ़ने का प्रमुख कारण माना जा रहा है। यह स्थिति देहरादून के लिए इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि मसूरी समेत आसपास के निकायों का कचरा पूर्व में देहरादून के शीशमबाड़ा स्थित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट में प्रसंस्करण के लिए पहुंचता रहा है। पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड में प्लास्टिक कचरे का उन्मूलन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। शहरी क्षेत्रों में तो इसके लिए कुछ प्रयास अवश्य हो रहे हैं, लेकिन गांवों में इसकी कोई ठोस व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है। भारत को अब रैखिक ‘उत्पादन-उपयोग-फेंकने’ वाली अर्थव्यवस्था से चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। ‘कम उपयोग, पुनः उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण और संसाधन पुनर्प्राप्ति’ को शहरी नीति का आधार बनाना होगा। उत्पादक उत्तरदायित्व, कचरा उत्पादकों पर उचित शुल्क, कचरा बीनने वालों का औपचारिक तंत्र में समावेशन, बल्क वेस्ट जनरेटर की जवाबदेही और स्थानीय निकायों की तकनीकी क्षमता में वृद्धि इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे।वास्तव में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन केवल इंजीनियरिंग की समस्या नहीं, बल्कि शहरी शासन, सामाजिक व्यवहार और संसाधन प्रबंधन का प्रश्न है। तकनीक कचरे को अलग, संसाधित और पुनर्प्राप्त कर सकती है, लेकिन उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए नागरिक सहभागिता, प्रभावी संस्थागत व्यवस्था और कठोर निगरानी आवश्यक है। भारत के शहरों को ‘कचरा हटाने’ की मानसिकता से आगे बढ़कर ‘कचरे से संसाधन बनाने’ की सोच अपनानी होगी। यही दृष्टिकोण बढ़ती आबादी और शहरीकरण के बीच स्वच्छ, टिकाऊ और संसाधन-कुशल भारत की आधारशिला बन सकता है। यह सिर्फ मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश की चिंता का विषय है। लोगों को खुद जागरूक और जिम्मेदार होना होगा। साथ ही, सरकारी नीतियां भी जरूरी हैं। सड़कों के किनारे कूड़ेदान लगाए जाने चाहिए और उन्हें नियमित रूप से खाली किया जाना चाहिए।”लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














