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उत्तराखंड को लगे हेली सेवाओं के पंख, बड़ी चुनौतियां अभी भी बरकरार

05/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड राज्य गठन को 25 साल पूरे हो रहे हैं. ऐसे में राज्य सरकार इस 25वें वर्षगांठ को रजत जयंती के रूप में मना रही है. साथ ही राज्य गठन के बाद हुए विकास और भविष्य की चुनौतियों पर रणनीति तैयार कर रही है. हालांकि, इन 25 सालों से भीतर तमाम क्षेत्रों में राज्य ने कई मुकाम हासिल किए हैं. इसी कड़ी में उत्तराखंड में इन 25 सालों के भीतर हेली सेवाओं में भी बड़ा विस्तार हुआ है.उत्तराखंड राज्य गठन के बाद हेली कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ही तमाम योजनाओं के जरिए हेली सेवाएं शुरू की गई, लेकिन हमेशा से ही एक बड़ी चुनौती यात्रियों की संख्या कम होना रहा है. जिसके चलते कई बार प्रदेश के भीतर संचालित होने वाले तमाम हेली सेवाओं को बंद भी करना पड़ा. ऐसे में राज्य गठन के बाद से ही उत्तराखंड राज्य में हेली सेवाओं की क्या रही है उत्तर प्रदेश से पृथक एक अलग पर्वतीय राज्य उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था. उस दौरान उत्तराखंड में 5 एयरस्ट्रिप मौजूद थीं. जिसमें जौलीग्रांट एयरपोर्ट, पंतनगर एयरपोर्ट, गौचर, चिन्यालीसौड़ और पिथौरागढ़ हेलीपैड शामिल हैं, लेकिन राज्य गठन के बाद मात्र दो एयरस्ट्रिप जौलीग्रांट और पंतनगर एयरपोर्ट से व्यावसायिक हेली सेवाओं का संचालन किया जा रहा था. इसके बाद प्रदेश में लंबे समय तक इन व्यवस्थाओं के तहत ही संचालन होता रहा. साथ ही साल 2011 में केदारनाथ धाम के लिए हेली सेवा का संचालन शुरू किया गया, लेकिन प्रदेश में मौजूद हेलीपैड से व्यावसायिक संचालन बेहद कम था. ऐसे में प्रदेश के भीतर व्यावसायिक हेली सेवाओं का संचालन बढ़ाए जाने को लेकर राज्य सरकार ने साल 2013 में उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण का गठन किया. इसके बाद से ही प्रदेश में व्यावसायिक रूप से हेली सेवाओं का इस्तेमाल तेज हो गया. इसी बीच जून 2013 में केदार घाटी में आई भीषण आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने हेली सेवाओं की अत्यधिक जरूरत महसूस की. फिर राज्य में हेली कनेक्टिविटी को बेहतर करने की दिशा में तमाम महत्वपूर्ण कदम उठाए गए. इसमें मुख्य रूप से प्रदेश के भीतर तमाम क्षेत्रों में नए-नए हेलीपैड बनाने की प्रक्रिया को भी तेज कर दिया गया. जिसका ही नतीजा है आज प्रदेश भर में करीब 90 हेलीपैड और 7 हेलीपोर्ट मौजूद हैं. उत्तराखंड में हेली सेवाओं के क्षेत्र में क्रांति की शुरुआत साल 2020 से शुरू हुई. दरअसल, केंद्र सरकार ने 21 अक्टूबर 2016 को उड़ान योजना की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत उत्तराखंड में पहली हेली सेवाएं फरवरी 2020 में शुरू हुईं. इसके बाद उत्तराखंड में उड़ान योजना के तहत तमाम हेली सेवाओं का संचालन शुरू किया गया. वर्तमान समय में राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत 18 रूटों पर हेली सेवाओं और 6 रूटों पर विमान सेवा का संचालन किया जा रहा है.  इसके अलावा भारत सरकार की उड़ान योजना और उत्तराखंड हवाई संपर्क योजना के तहत 10 रूटों पर हेली सेवाओं का संचालन किया जाना प्रस्तावित है. इसके अलावा नागरिक उड्डयन विभाग गौचर और चिन्यालीसौड़ हेलीपैड का भी व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए कार्य योजना तैयार कर रही है, जो 30 दिसंबर तक तैयार होने की संभावना है. केद्र सरकार की ओर से संचालित उड़ान योजना के तहत उत्तराखंड में 12 रूटों पर हेली सेवाओं का संचालन किया जा रहा है. जिसमें देहरादून से अल्मोड़ा, अल्मोड़ा से देहरादून, हल्द्वानी से मुनस्यारी, मुनस्यारी से हल्द्वानी, हल्द्वानी से पिथौरागढ़, पिथौरागढ़ से हल्द्वानी, हल्द्वानी से चंपावत, चंपावत से हल्द्वानी, पिथौरागढ़ से मुनस्यारी, मुनस्यारी से पिथौरागढ़, हल्द्वानी से अल्मोड़ा, अल्मोड़ा से हल्द्वानी रूट शामिल हैं. ऐसे में इन 25 सालों के भीतर हेली सेवाओं के लिए मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर को न सिर्फ अपग्रेड किया गया है बल्कि, कमर्शियल इस्तेमाल की दिशा में भी बेहतर काम किया गया है. साथ ही उत्तराखंड को हेली सेवाओं के जरिए अन्य राज्यों के साथ ही उत्तराखंड के भीतर एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ने की दिशा में काम किया गया है. इसके लिए उत्तराखंड सरकार ने उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण का भी गठन किया. हालांकि, डीजीसीए के मानकों के अनुरूप ही हेली सेवाओं का संचालन किया जाएगा. इस योजना से उत्तराखंड के भीतर न सिर्फ हेली सेवाओं का बेहतर ढंग से संचालन हो सकेगा. बल्कि, देश के अन्य शहरों के लिए हेली सेवाओं के संचालन को लेकर राज्य सरकार जरूरत के अनुसार खुद रूट तय कर सकेगी. फिलहाल, राज्य सरकार ने उत्तराखंड हवाई संपर्क योजना को 2029 तक संचालित करने का निर्णय लिया है.  सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु व भौगोलिक परिस्थितियों में हेलीकाप्टर सेवाओं का संचालन काफी मुश्किल होता है। उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को बेहद करीब से समझने वाले कहते हैं कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि उत्तराखंड की चारधाम यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर बेहद जरूरी है. क्योंकि दिव्यांग श्रद्धालु भी केदारनाथ और बदरीनाथ धाम के दर्शन हेलीकॉप्टर सेवा के जरिए करते हैं. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, जहां देखा जा रहा है कि चारधाम रूट पर हेलीकॉप्टर को टैक्सी बनाकर उड़ाया जा रहा है. इतना ही नहीं, जो हेलीकॉप्टर देहरादून से उड़ान भरता है उसको शायद यह मालूम नहीं होता कि पहाड़ पर हालात पल-पल बदलते हैं. ऐसे में कई बार दुर्घटना हो जाती है और कई बार बाल बाल बचते हैं. इसलिए सभी पहलुओं को देखकर इन सेवाओं का संचालन हो तो बेहतर है.  केदारनाथ में चल रही हेली सर्विस पर लगाई गई है. डीजीसीए ने यह साफ किया है कि जिस हेलीकॉप्टर में छह सवारियां यात्रा कर रही थी, उन हेलीकॉप्टर में अब सिर्फ 3 से 4 सवारियां ही यात्रा कर पाएंगी. इसके साथ ही वजन और मौसम का भी ध्यान रखा जाएगा. इसके अलावा मौसम जरा भी खराब होता है तो कोई भी हेली एजेंसी हेली के संचालन को लेकर दबाव नहीं बनाएगी. डीजीसीए हर एक उड़ान और एविएशन की सारी एक्टिविटी पर नजर रख रहा है. ताकि इस रिव्यू को बेहतर तरीके से किया जा सके और आगे का फैसला लिया जा सके.। रजत जयंती केवल उत्सव का अवसर न होकर राज्य के विकास की दिशा तय करने वाली मील का पत्थर बने. इसके तहत सरकार न केवल उपलब्धियों का मूल्यांकन करेगी. बल्कि, उन चुनौतियों की पहचान भी करेगी, जो आने वाले सालों में विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.*

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