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गुरु नानक देव जी की आज 552 वीं जयंती

05/11/25
in उत्तराखंड, दुनिया, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड विभिन्न संप्रदायों के तपस्वियों और संस्थापकों के लिए प्रेरणा स्रोत रही है। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से उत्तराखंड का विशेष लगाव रहा है। गुरु नानक देव उत्तराखंड में हरिद्वार, चंपावत तथा अन्य स्थानों पर आए थे। हरिद्वार में उन्होंने हर की पैड़ी पर गंगा स्नान कर यहां के तीर्थ पुरोहितों को ज्ञान दिया और अपने तीर्थ पुरोहित के आग्रह पर उसकी गद्दी पर रात्रि विश्राम किया था, जिसे नानक बाड़ा बोलते हैं। यहां पर गुरु नानक देव जी की प्रतिमा भी स्थापित है। वे कुमाऊं में चंपावत, नैनीताल जिले की यात्रा पर भी गए थे। इसलिए कुमाऊं में उनके नाम से नानकमत्ता और रीठा साहिब गुरुद्वारे स्थापित किए गए। हरिद्वार में ज्ञान गोदड़ी गुरुद्वारा स्थापित करने के लिए सिख समाज संघर्षरत है।जब गुरु नानक देव जी को पंजाब की बेई नदी तट पर दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई तो उन्होंने गुरु के रूप में पहली दीक्षा और गुरु मंत्र भाई भागीरथी निर्मल संत को दिया और निर्मल संप्रदाय की स्थापना की। गुरु नानक देव की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह महाराज ने किया।उत्तराखंड के देहरादून की सीमा से लगे हिमाचल प्रदेश के पोंटा साहिब में 1686 में गुरु गोविंद सिंह ने सिख पंथ के अपने पांच अनुयायियों को चयनित किया और उन्हें पोंटा साहिब से उत्तर प्रदेश में स्थित संस्कृत के प्रचार -प्रसार के प्रमुख केंद्र काशी में संस्कृत के अध्ययन के लिए भेजा। इन संतों को गुरु नानक देव जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुरु गोविंद सिंह जी ने उन्हें निर्मल संतों का नाम दिया, जो आचार -विचार -व्यवहार से बिल्कुल गंगाजल की तरह निर्मल थे। उनका कार्य पूरे भारत में संस्कृत का प्रचार-प्रसार करना था। निर्मल संतों ने पूरे देश में खासकर हरिद्वार, ऋषिकेश, पंजाब, हरियाणा में संस्कृत के कई विद्यालय स्थापित किए जहां छात्र -छात्राओं को संस्कृत की शिक्षा-दीक्षा निशुल्क प्रदान की जाती थी। निर्मल संप्रदाय से जुड़े साधु संतों की एकता के लिए और भाषा के प्रचार-प्रसार को संगठित और संस्थागत रूप प्रदान करने के लिए 1861 में निर्मल संप्रदाय के महान तपस्वी बाबा मेहताब सिंह महाराज ने श्री निर्मल पंचायती अखाड़े की स्थापना पंजाब के पटियाला में की और पटियाला के राजा ने निर्मल अखाड़ा की स्थापना के लिए जमीन, भवन और धन संपदा दान की।कुछ अंतराल के बाद श्री निर्मल पंचायती अखाड़े का मुख्यालय पटियाला से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थानांतरित किया गया और उसके बाद हरिद्वार के उपनगर कनखल में श्री निर्मल पंचायती अखाड़े का मुख्यालय बनाया गया,जो वर्तमान में अखाड़ा का मुख्यालय है। इसमें श्री महंत विराजते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश रोजाना होता है और शाम को संध्या आरती की जाती है। अखाड़े द्वारा 1930 में संस्कृत के प्रचार- प्रसार के लिए निर्मल संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की गई, जो आज संस्कृत भाषा का प्रमुख अध्ययन केंद्र है। श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा के श्री महंत के पद पर वही निर्मल संत विराजमान होते हैं, जो चारों वेदों, पुराणों, उपनिषदों के ज्ञाता और वेदांताचार्य हों। इस तरह निर्मल संप्रदाय के संत भगवा धारण करते हैं और संस्कृत भाषा का अध्ययन कर शास्त्री, आचार्य की उपाधि प्राप्त करते हैं।श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा के प्रमुख अध्यक्ष श्री महंत ज्ञानदेव सिंह वेदांताचार्य का कहना है कि निर्मल संप्रदाय समाज में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में भी अहम योगदान करता है और गुरु नानक देव और गुरु गोविंद सिंह जी की सामाजिक सद्भाव की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। निर्मल अखाड़े के संत केशधारी होते हैं वे कड़ा और कोपीन पहनते हैं।निर्मल अखाड़े में जाति भेद नहीं होता है। चारों वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को निर्मल संत के रूप में दीक्षित किया जाता है और सभी वर्णों के लोग एक साथ एक पंगत में बैठकर भोजन प्रसाद ग्रहण करते हैं। निर्मल संप्रदाय का मूल मंत्र पंगत-संगत एक हैं। इस तरह निर्मल अखाड़ा जाति भेद को मिटाकर सामाजिक सद््भाव के कार्य में वर्षों से जुटा है। हर साल नानक देव के जन्मोत्सव को उनके भक्त बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं. सुबह के समय ‘वाहे गुरु, वाहे गुरु’ जपते हुए प्रभा​त फेरी निकाली जाती है. इसके बाद गुरुद्वारों में शबद कीर्तन किया जाता है और लोग रुमाला चढ़ाते हैं. शाम के समय लंगर का आयोजन होता है. नानक देव के भक्त उनकी बातों का अनुसरण करते हुए मानव सेवा करते हैं और गुरुवाणी का पाठ करते हैं. गुरु नानक जी सिख समुदाय के पहले गुरु थे. उन्होंने ही सिख धर्म की नींव रखी थी. हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को गुरु नानक जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. गुरु नानक जी को उनके अनुयायी बाबा नानक और नानकशाह के नाम से भी संबोधित करते हैं. आज देशभर में कार्तिक पूर्णिमा के साथ गुरु नानक जयंती भी मनाई जा रही है.नानक देव ने अपना सारा जीवन मानवता को समर्पित कर दिया था. उनके जन्मदिन को उनके भक्त प्रकाश पर्व के तौर पर मनाते हैं.
*लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।*

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