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होली महोत्सव में एकजुटता का संदेश

28/03/21
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की संस्कृति और परम्परा अनोखी है। पहाड़ों के रीति रिवाजों और त्योहारों को मनाने का अलग ही आनंद नज़र आता है। अब बात जब उमंग उल्लास और रंगोत्सव के पर्व होली की हो तो बात ही क्या। देश में कहीं अनोखी और दिलचस्प होली मनाई जाती है वह है देवभूमि के पहाड़ों में, जहां होली के कई दिन पहले से ही होली के दीवाने इस रंगोत्सव में डूब जाते हैं। गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ों में रंग भरी होली हो, बैठकी होली हो, खड़ी होली हो या गीत गाते नाचते बुजुर्गों की आकर्षक होली, गाते नाचते होलियारों की मंडली हो ये अपने आप में दिलचस्प परंपरा है जो पहाड़ों में आज भी लोगों को आकर्षित करती है। क्या युवा क्या बुजुर्ग और क्या महिलाएं इस त्योहार की खुशी सबके जीवन को एक नए जोश से भर देता है। पहाड़ में लोग ग्रुप बनाकर घरों के बाहर ढोल मझींरा लेकर होली गीत गाकर नाच कर इस पर्व को मानते हैं। ऐसा नजारा देख कर हर शख्स झूमने को मजबूर हो जाता है।

उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग ही तरह से मनाया जाता है, जिसे कुमाऊँनी होली कहते हैं। कुमाऊँनी होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। यह कुमाऊँनी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है, क्योंकि यह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही नहीं, बल्कि पहाड़ी सर्दियों के अंत का और नए फसल बुआई के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है। धुलंडी, यानी होली, जिसे कुमाऊं में छलड़ी कहा जाता है। दरअसल छलड़ का अर्थ फूल के अर्क, राख और पानी के मिश्रण से बनने वाला एक अवलेह होता है, जिसे होली खेलने के लिए प्रयोग किया जाता है। छलडी के दिन सभी लोग आपस में मिलते है, गले लगते है और अपने आस पास के लोगों को रंग लगाते हैं। तरह तरह के पकवान बनाते है, घर आए लोगो को खिलाते हैं। खूब गाना बजाना करते हैं। इस दिन सभी लोग एक दूसरे के गले लगकर होली की बधाइयां देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि होली ही एक ऐसा त्यौहार है, जिसमें दुश्मन भी एक दूसरे के गले लग कर एक दूसरे को होली की बधाइयां देते हैं। पहाड़ की ऐसी कहावत है कि होली में दुश्मन भी गले लगकर साथ गाते बजाते व नाचते हैं। ये होली की समाप्ति वाला दिन होता है और होल्यार लोग इस दिन इस होली की अच्छी समाप्ति का गाना गाते हैं और अगले साल आने वाली होली का स्वागत करते हैं।

कुमाऊं में भले ही बैठकी होली के साथ ही खड़ी होली की धूम मची है। लेकिन गढ़वाल के अधिकांश हिस्सों में छलड़ी के सिवाय होली को लेकर खास उत्साह नजर नही आता है अलबत्ता रंग पड़ने के साथ ही होली गाते बच्चों की टोली हर कदम पर नजर आती है। यह भी कह सकते हैं कि गढ़वाल में होली की रौनक ढपली, चिमटा लिए गाते बच्चों और युवाओं की टोली ने बरकरार रखी है। कुमाऊं में बैठकी होली के साथ ही खड़ी होली की धूम भी मची है, हालांकि अब गिने चुने गांवों में ही खड़ी होती हो रही है, जबकि महिलाओं की बैठकी होली कमोवेश सभी गांवों में हो रही है। चौखुटिया विकास खंड के गढ़वाल से लगे गांवों में भी उसका प्रभाव साफ नजर आता है। वर्तमान में कुमाउनी बैठकी होली के भविष्य के सम्बन्ध में कोई चिन्ता करने की आवश्कता प्रतीत नहीं होती। जब तक इस भूमण्डल में संगीत का अस्तित्व रहेगा, यह विधा भी अक्षुण्ण रहेगी। वस्तुतः उतार.चढ़ाव तो जीवन के हर क्षेत्र में आते रहते हैं ओर इससे होली गायन भी अछूता नहीं है। होली त्योहार तो हम सब में इस कदर रचा.बसा हुआ है कि हम स्वयं को इससे न तो अलग कर पाएंगे और न ही अलग होना चाहेंगे। आवश्यकता है इससे प्रति सकारात्मक सोच को बनाये रखने की। तभी हम कह सकते है कि बैठकी होली गायन का भविष्य सुरक्षित है। जैसे.जैसे होली पर्व की तिथियां निकट आने लगती हैं, उसी गति से कुमाऊं में स्थान.स्थान पर आयोजित की जाने वाली बैठकें इस बात का प्रमाण देती हैं कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर अपनी पहचान सदैव बनाये रखेेगी और जब तक जीवन है वर्तमान में कुमाऊं में बैठकी होली की यह परम्परा अभी कुछ संस्थानों, विशिष्ट व्यक्तियों और विशेष गावों तक सीमित रह चुकी हैण्वर्तमान में आमजन बैठकी होली से काफ़ी दूर है। भागदौड़ से भरे इस जीवन में लोगों के पास इतना समय कहां यह भी जीवित रहेगी।

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