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कुठ की खेती से आएगी स्मृद्धि, रुकेगा पलायन

31/01/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
कुठ, जिसका वानस्पतिक नाम ससुरिया कोस्टस है, यह पौधा मूलतः उत्तर-पश्चिम हिमालय में पाया जाता है। उत्तराखण्ड हिमालय में यह पौधा पिथौरागढ़, नैनीताल अल्मोड़ा, टिहरी जिले की भिलंगना घाटी, भागीरथी घाटी, चमोली जिले की पिण्डर घाटी, नीति घाटी, विरही घाटी, नन्दाकिनी घाटी, रूद्रप्रयाग जिले की केदारनाथ घाटी, उत्तरकाशी जिले की गंगोत्री घाटी के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश में किन्नौर, लाहौल-स्पिति तथा जम्मू-कश्मीर में पाया जाता है। आईयूसीएन एवं साईटस ने तो इसे अति संकटग्रस्त पादप प्रजाति घोषित कर दिया है। जबकि उत्तर-पश्चिम हिमालय में इसकी खेती की जाती है। की खेती भी किसान आसानी से अपना सकते हैं। कुठ सीधा और मज़बूत पौधा होता है जिसकी लम्बाई एक से दो मीटर तक की होती हैं। इसका तना मोटा और रेशेदार होता है, इसकी जड़ गाजर की तरह ही बाहर की ओर होती है।
आपको बता दें कि कुठ की पौध तैयार करने के लिए किसान सितम्बर या अक्टूबर में पॉलीहाउस के तहत इसकी खेती कर सकते हैंण् खास बात यह है कि सर्दियों में कुठ का विकास अधिक होता है। यह एक बारहमासी पौधा है। किसान प्रति हेक्टेयर 2 से 3.5 टन तक का उत्पादन कर सकते हैं। वहीं गढ़वाल में इसका उत्पादन ज़्यादा होता है। किसान कुठ की खेती करने के लिए बीज और जड़ का उपयोग कर सकते हैं। जड़ों की कटिंग और कॉलर क्षेत्र जिसकी परिधि 2.5 होती है, उसका उपयोग पौध उगाने में किया जा सकता है।
इसको नमी वाली जलवायु में 2500 से 3000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र में प्रत्योपित किया जाता है। गहरी दोमट मिट्टी इसकी मोती लम्बी जड़ के विकास के लिए उपयुक्त होती है। एक हेक्टेयर में किसान लगभग 1.5 किलो बीजों या 18000 अंकुरित बीजों पौध को लगा सकते हैं। अच्छी तरह से खेत की जुताई करनी चाहिए और इसी दौरान खाद भी 15 टन हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए। आपको बता दें कि 6 से 9 महीने के बीच पुराने पौधों को प्रत्योपित किया जाता है। बीज बोने के लिए छोटे गड्ढों को तैयार किया जाता है। बीजों को 30 की दूरी पर बोया जाता है। वहीं 6 महीने के विकास के बाद पौधों में 2 से 2.5 फुट की दूरी रखी जाती है। विकास के बाद कुठ के पौधों में एक साल बाद सिंचाई की ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती है। शुष्क महीने के दौरान 4 से 6 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। पौध बनने के बाद बारिश के समय निराई ज़रूरी है। किसान फसल को 2 से 4 साल में तैयार कर काट सकते हैं। लगभग 15 से 20 दिनों के बाद फूल निकलने पर कुठ की जड़ों को काटा जाता है।
ऊपर से फूल काटकर एक हफ्ता धुप में सुखाकर ही इसे लगाया जाता है कुठ की खेती करने वाले किसान इससे काफी मुनाफा कमा सकते हैं क्योंकि इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने में भी किया जाता है। इसका उपयोग गठिया रोग सर्दी.ज़ुकाम में किया जाता है। इसके साथ ही पेट सम्बन्धी रोगों के लिए भी कुठ काफी फायदेमंद है। एसेंशियल आयल का इस्तेमाल खूबसूरत त्वचा तथा बीमारियों से बचने के लिए किया जाता है तनाव से राहत के लिए इस तेल की एक या दो बूंदों को नहाने के पानी में मिलाकर इसका इस्तेमाल करें है। इस तेल को आप अपनी क्रीम या हेयर ऑयल में मिलाकर काम में लेते हैं जैविक खेती और बागवानी के जरिये उत्तराखंड की आर्थिकी को बेहतर बनाया जा सकता है। राज्य के तीन मैदानी जिलों को छोड़ दें तो ज्यादातर किसान लघु और मझोले किसान की श्रेणी में ही आते हैं। जैविक खेती इन किसानों की आय बढ़ा सकती है। इसीलिए उत्तराखंड को ऑर्गेनिक स्टेट बनने की दिशा में राज्य सरकार ने अहम फैसला लिया है।
13 नवंबर को हुई कैबिनेट बैठक में उत्तराखंड जैविक कृषि विधेयक 2019 को मंजूरी दे दी गई। राज्य के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत मौजूदा समय में 2 लाख एकड़ जमीन में जैविक खेती की जा रही है। इसके तहत 10 ब्लाकों को जैविक ब्लॉक घोषित किया जाएगा। पहले चरण में इन ब्लॉकों में किसी भी तरह के केमिकल, पेस्टीसाइट, इन्सेस्टिसाइट बेचने पर पूरीतरह प्रतिबन्ध लगाया जाएगा। जैविक ब्लॉक में रासायनिक या सिंथेटिक खाद, कीटनाशक, खरपतवार नाशक या पशुओं को दिए जाने वाले चारे में रसायन के इस्तेमाल पर रोक लगेगी। यदि कोई किसान इसका उल्लंघन करता है तो एक साल के जेल और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। 10 चिन्हित ब्लॉक में यदि ये प्रयोग सफल रहता है तो इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। कृषि मंत्री का कहना है कि जैविक कृषि विधेयक का उद्देश्य राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देना और जैविक उत्तराखण्ड के ब्राण्ड को स्थापित करना है। ताकि राज्य के उत्पादों को देश.विदेश में मान्यता मिल सके।
इसके साथ ही जिन ऑर्गेनिक उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी केंद्र सरकार ने घोषित नहीं किया है, उत्तराखंड सरकार उनकी एमएसपी। घोषित करेगी। ऐसा करने वाला उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य होगा। किसान को अपने जैविक उत्पाद बेचने में दिक्कत न आए उसके लिए भी व्यवस्था की गई है। मण्डी परिषद में रिवॉल्विंग फण्ड जनरेट करने का फैसला लिया गया है। फंड के ज़रिये मंडी परिषद किसानों के जैविक उत्पाद को खरीदेगी और उसकी प्रोसेसिंग करने के बाद मार्केटिंग करेगी। इससे होने वाला लाभ किसानों में बांटा जायेगा। सर्टिफाइड होने पर ऑर्गेनिक उत्पादों की कीमत बढ़ जाती है और उसे ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा सकता है। हार्टिकल्चर सेक्टर को सुरक्षित करने के लिए भी कैबिनेट बैठक में फ़ैसला लिया गया। इसके तहत सरकारी नर्सरी को नर्सरी एक्ट में डाल दिया गया है। सरकारी नर्सरी से निकली पौध की गुणवत्ता यदि खराब निकली तो नर्सरी पर सजा और जुर्माना लगेगा। लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के छोटे किसान आसानी से जैविक खेती अपना सकते हैं। उत्तराखण्ड में वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए ष्मिट्टी से बाजार तकष् की रणनीति पर काम किया जा रहा है। उत्तराखंड के किसानों के लिए बाज़ार तक पहुंचना ही बड़ी समस्या है। खेती से मुंह मोड़ रहे युवाओं को यदि उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेए तभी वे खेतों की ओर लौटेंगेण्वृक्षावरण में वृद्धि कर भूमि एवं जल संरक्षण व पर्यावरण संतुलन स्थापित करने के साथ ग्रामीण आंचल में उद्यमियों को प्रोत्साहन तथा वन आधारित लघु व कुटीर उद्योग की अर्थव्यवस्था को सशक्त किया जा सकता है। एक प्रगतिशील के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है। अत्यधिक अविवेकपूर्ण दोहन, अजैविक कारकों, मानव हस्तक्षेप, बाजार में बढ़ती माँग और प्राकृतिक आवासीय विघटन की गति में तेजी इत्यादि कारणों की वजह से यह पौधा लुप्त प्राय श्रेणी मंे सम्मिलित हो चुका है।

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