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केदारनाथ धाम में श्रद्धालु छोड़ गए सैकड़ों टन कूड़ा

18/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है. उत्तराखंड के चारधामों में क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं का आना हिमालय की पारिस्थितिकी और पर्यावरण के लिए भविष्य में खतरा बन सकते हैंविश्व विख्यात केदारनाथ धाम में इस बार 17.68 लाख तीर्थ यात्रियों ने दर्शन किए. वहीं यात्रियों के धाम पहुंचने से हजारों टन कूड़ा भी जमा हुआ है. पिछले वर्षों की तुलना में इस बार अत्यधिक कूड़ा जमा हुआ है. जिस कारण कपाट बंद होने के बाद भी लगभग दस दिनों तक केदारनाथ धाम और यात्रा मार्ग पर सफाई अभियान चलाया गया.विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट 23 अक्टूबर को बंद हो गये थे. लगभग छह माह के यात्रा सीजन में केदारनाथ धाम समेत केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग और यात्रा के मुख्य पड़ावों व बाजारों से 2324 टून कूड़ा एकत्रित किया गया है. इसमें प्लास्टिक, घोड़े-खच्चरों की लीद समेत अन्य कूड़ा शामिल है. पिछले यात्रा सीजन की तुलना में 325 टन से अधिक कूड़ा धाम और यात्रा मार्ग से एकत्रित हुआ है. हालांकि धाम सहित केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग और यात्रा मार्ग के बुग्यालों में यात्रियों की ओर से फैलाये गये कूड़े को अब साफ कर दिया गया है.विश्व विख्यात केदारनाथ धाम में इस बार 17.68 लाख तीर्थ यात्रियों ने दर्शन किए. वहीं यात्रियों के धाम पहुंचने से हजारों टन कूड़ा भी जमा हुआ है. पिछले वर्षों की तुलना में इस बार अत्यधिक कूड़ा जमा हुआ है. जिस कारण कपाट बंद होने के बाद भी लगभग दस दिनों तक केदारनाथ धाम और यात्रा मार्ग पर सफाई अभियान चलाया गया. केदारनाथ धाम हिमालयी क्षेत्र में स्थित है. प्रत्येक वर्ष यहां हजारों की संख्या में तीर्थ यात्री पहुंचते हैं. तीर्थ यात्री अपने साथ प्लास्टिक की बोतल, रेनकोट सहित अन्य प्लास्टिक का सामान ले जाते हैं, जिसे वहीं छोड़ देते हैं. केदारनाथ धाम में नगर पंचायत केदारनाथ और यात्रा मार्ग समेत धाम और सोनप्रयाग, गौरीकुंड, सीतापुर, फाटा, रामपुर आदि बाजारों में सफाई का जिम्मा सुलभ इंटरनेशनल का है. प्रत्येक यात्रा सीजन में सुलभ के 450 से अधिक पर्यावरण मित्र कार्य करते हैं. विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट 23 अक्टूबर को बंद हो गये थे. लगभग छह माह के यात्रा सीजन में केदारनाथ धाम समेत केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग और यात्रा के मुख्य पड़ावों व बाजारों से 2324 टून कूड़ा एकत्रित किया गया है. इसमें प्लास्टिक, घोड़े-खच्चरों की लीद समेत अन्य कूड़ा शामिल है. पिछले यात्रा सीजन की तुलना में 325 टन से अधिक कूड़ा धाम और यात्रा मार्ग से एकत्रित हुआ है. हालांकि धाम सहित केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग और यात्रा मार्ग के बुग्यालों में यात्रियों की ओर से फैलाये गये घोड़े-खच्चरों की लीद को अलग एकत्रित किया जाता है. जबकि प्लास्टिक और जैविक कूड़ा अलग-अलग किया जाता है. प्लास्टिक और घोड़े-खच्चरों की लीद का निस्तारण सोनप्रयाग के आसपास ही मशीनों द्वारा किया जाता है. जबकि जैविक कूड़े को सोनप्रयाग से लगभग 70 किमी दूर जिला मुख्यालय के रैंतोली लाया जाता है. कूड़े को यहां तक पहुंचाने में ही लाखों का खर्चा आ जाता है.अधिक संख्या में यात्रियों के पहुंचने के साथ ही धाम में अधिक मात्रा में कूड़ा भी फैल रहा है. पिछले वर्ष की तुलना में 325 टन कूड़ा अधिक एकत्रित हुआ है, जो कि एक चिंता का भी विषय है. हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ती मानवीय गतिवधियों के कारण पर्यावरण संतुलन में भी दिक्कतें आ रही हैं. सुलभ इंटरनेशल के प्रभारी धनंजय पाठक ने बताया कि धाम से घोड़े-खच्चरों और पर्यावरण मित्रों के जरिये कूड़े को गौरीकुंड तक पहुंचाया जाता है. फिर यहां से जैविक कूड़े को वाहन के जरिये जिला मुख्यालय रुद्रप्रयाग पहुंचाया जाता है. प्रत्येक वर्ष 450 से अधिक पर्यावरण मित्र धाम और यात्रा मार्ग पर कार्य करते हैं. भक्तों की बढ़ती संख्या और कचरे की मात्रा के कारण केदारनाथ धाम के पर्यावरण पर गंभीर दबाव बढ़ गया है. उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक और अन्य कचरे का निस्तारण कठिन होने के कारण यह प्रशासन और स्थानीय पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. भविष्य में कचरे के प्रभाव को कम करने और धाम की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठाना आवश्यक है. यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी ज्यादा रही. मगर, चिंता की बात यह है कि श्रद्धालुओं ने गंदगी करने में बिल्कुल कोताही नहीं बरती. हर यात्री ने औसतन डेढ़ किलो कचरा छोड़ा, जो पिछले साल की तुलना में करीब 150 ग्राम अधिक है. इससे पता चलता है कि आज हम कितने लापरवाह हो गए हैं. हम अपने भगवान की जगह को साफ नहीं रख पा रहे तो और क्या ही उम्मीद कर सकते. भक्तों की बढ़ती संख्या और कचरे की मात्रा के कारण केदारनाथ धाम के पर्यावरण पर गंभीर दबाव बढ़ गया है. उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक और अन्य कचरे का निस्तारण कठिन होने के कारण यह प्रशासन और स्थानीय पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. भविष्य में कचरे के प्रभाव को कम करने और धाम की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठाना आवश्यक है.. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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