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भूस्खलन से मकान खतरे की जद में

11/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मानसून में देश के पहाड़ी राज्यों में पहाड़ों से चट्टानों के खिसकने से भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। साल दर साल भूस्खलन से सैकड़ों लोगों मौत के मुंह में समा जाते हैं तो वहीं करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। दरअसल, आधुनिक विकास कार्यों के चलते पहाड़ी अंचलों में होने वाले खनन, जंगलों की कटाई और पनबिजली योजनाओं से पहाड़ की पारिस्थितिकी प्रभावित हुई है। जिससे हर वर्ष प्रकृति का यह कहर मानवता को भारी कीमत देकर चुकानी पड़ रही है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में पिछले दिनों कई बार भूस्खलन की घटनाएं देखने को मिली हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य और भारी बारिश से पहाड़ों से चट्टानों की घटनाएं हर साल बढ़ती जा रही हैं। भूस्खलन से सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों में हो रहा है। पिछले कुछ समय से दुनिया भर में इसके कारण होने वाले नुकसान के संबंध में चर्चा की जा रही है और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। रेल सेवाएं, हाईवे समेत कई सड़क मार्ग बंद हो जाते हैं और कई बार नदियां अपना रास्ता बदल लेती हैं। भूस्खलन के कारण भारत को हर साल 150-200 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है पिथौरागढ़ जिले के दारमा घाटी के दर गांव के करीब हो रहे भूस्खलन से 35 मकान खतरे की जद में हैं। पानी का रिसाव भूमिगत हो जाने से भूस्खलन की समस्या खड़ी हुई है। प्रशासनिक अधिकारियों के साथ गांव पहुंची भू-वैज्ञानिकों की टीम ने खतरे में आए परिवारों को विस्थापित किए जाने की आवश्यकता बताई है। भूस्खलन से चीन सीमा को जोडऩे के लिए बनाई गई सड़क भी खतरे की जद में है। अक्टूबर माह में हुई बारिश से दर गांव के पास विशाल चट्टान दरक गई थी। इस चट््टान से भूस्खलन थम नहीं रहा है। मौसम साफ हो जाने के बाद भी हर रोज भारी मात्रा में बोल्डर और मलबा गिर रहा है। चीन सीमा को जोडऩे वाली सड़क पर कई टन मलबा जमा है। सड़क का नामो निशान फिलहाल नहीं दिखाई दे रहा है। पैदल आवागमन भी लोगों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है।लगातार हो रहे भूस्खलन को देखते हुए प्रशासन ने जिला भूर्गभ अधिकारी को भूगर्भीय जांच के लिए दर गांव भेजा था। दो दिनों तक भूगर्भीय जांच के बाद उन्होंने बताया कि जमीन की ऊपरी सतह पर बहने वाला पानी गांव के समीप भारी मात्रा में भूगर्भ में जमा हो गया है। पानी का रिसाव जमीन के भीतर ही भीतर हो रहा है। जिससे चट्टान दरक रही है। इसी के चलते गांवों के मकानों के लिए खतरा खड़ा हो गया है। खतरे में आए परिवारों का विस्थापन करना होगा। उन्होंने कहा कि भूगर्भीय स्थितियों के चलते फिलहाल सड़क पर भी खतरा बना हुआ है। उन्होंने बताया कि शीघ्र ही पूरी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी जाएगी। निरीक्षण के दौरान धारचूला के उपजिलाधिकारी भी मौजूद रहे। एसडीएम, धारचूला ने बताया कि दर गांव के समीप हो रहे भू-स्खलन के कारणों का पता लगाने के लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण कराया गया है। भू-वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी। बीते मानसून सीजन में मसूरी रोड पर भूस्खलन जोन खासा सक्रिय रहा। इसके चलते कई दफा सड़क बाधित रही और पहाड़ी से खिसके मलबे के चलते एक वाहन भी क्षतिग्रस्त हो गया। लोनिवि के लिए सिरदर्द बने भूस्खलन जोन की गंभीरता को देखते हुए सितंबर माह के प्रथम सप्ताह में मुख्यमंत्री ने निरीक्षण करते हुए अधिकारियों को पहाड़ी के उपचार के लिए हरसंभव प्रयास किए निर्देश दिए थे। उन्होंने आश्वासन भी दिया था कि इस काम के लिए बजट की कमी नहीं होने दी जाएगी। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद लोनिवि प्रांतीय खंड देहरादून ने विभिन्न कंपनियों से रिक्वेस्ट फार परपोजल (आरएफपी) मांगे थे। उपचार के लिए प्री-बिडिंग मीटिंग भी की गई। ताकि इच्छुक कंपनियों को भूस्खलन जोन की स्थिति बताई जा सके। प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता ने बताया कि उपचारात्मक कार्यों के लिए कंपनी का चयन कर लिया गया है। संबंधित कंपनी मौके पर जाकर मिट्टी का परीक्षण करेगी। जियो टेक्निकल सर्वे किया जाएगा और भूस्खलन की प्रकृति के मुताबिक उपचार के लिए डीपीआर तैयार की जाएगी। डीपीआर तैयार हो जाने के बाद उपचार में सक्षम कंपनियों को टेंडर के जरिये आमंत्रित किया जाएगा। डीपीआर के आधार पर भी उपचार की राशि तय की जा सकेगी। भूस्खलन जोन पहाड़ी के 100 मीटर ऊंचाई व 80 मीटर लंबाई के हिस्से में फैला है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना स्थायी उपचार के यहां पर कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। भूस्खलन जोन को पहाड़ी के बीच फूटने वाले जलस्रोत भी खतरनाक बना देते हैं। लोनिवि यहां तक सिर्फ सुरक्षा दीवार आदि बनाने तक सीमित रहा है और हर दफा मलबे के दबाव के चलते हालात पहले जैसे हो जाते हैं। इस तरह के अस्थायी कार्यों के चलते सरकारी धन की बर्बादी भी होती है।
*लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।*

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