डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में आपदा से बुग्याल (पहाड़ों में हरे घास के मैदान) जख्मी हो रहे हैं। उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित द्यारा बुग्याल भी इससे अछूता नहीं है। वहां पिछले कुछ वर्षों से भूस्खलन हो रहा है। जमीन दरकने से घास के इस मैदान की हरियाली पर भी असर पड़ा है। वन महकमे द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है। इसे देखते हुए अब विशेषज्ञों की देखरेख में द्यारा के उपचार की कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। महकमे के मुखिया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक ने इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि बरसात थमने के बाद इस बुग्याल में उपचारात्मक कार्य शुरू किए जाएंगे। करीब 28 वर्ग किलोमीटर में फैला द्यारा बुग्याल जहां औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों का भंडार है, वहीं सैलानियों के आकर्षण का केंद्र भी है। यहां से हिमालय का मनोरम नजारा हर किसी को अपने मोहपाश में बांध लेता है। कुदरत का यह अनमोल खजाना कुदरत की मार से जूझ रहा है। वहां पिछले कुछ सालों से भूस्खलन के साथ ही कई जगह भू-धंसाव भी हो रहा है। इसके चलते राज्य के इस अहम बुग्याल के लिए खतरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। वन विभाग की ओर से हाल में कराए गए सर्वे में ये बात भी सामने आई कि जमीन दरकने और भू-धंसाव के कारण इसके घास के मैदान की हरियाली पर असर पड़ा है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक के अनुसार द्यारा बुग्याल को लेकर विभाग सजग है। सर्वे रिपोर्ट आने के बाद इसके उपचार के लिए कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक ने कहा कि इस बुग्याल का संरक्षण विशेषज्ञों की मौजूदगी में वैज्ञानिक ढंग से किया जाएगा। इसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। इस कड़ी में ग्रामीणों की बुग्याल संरक्षण समितियोंं की मदद ली जाएगी। कोशिश ये है कि इस साल के आखिर तक द्यारा के संरक्षण से संबंधित कार्य संपन्न करा लिए जाएं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में ट्री-लाइन व स्नो लाइन के मध्य पाए जाने वाले मखमली हरी घास के मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। न सिर्फ द्यारा, बल्कि औली, हरकी दून, फूलों की घाटी, वेदनी समेत 36 बुग्याल भी भूक्षरण की गिरफ्त में हैं। अब इनका सर्वे कराया जाएगा कि इन्हें कितना नुकसान पहुंचा है। बुग्याल भी भूक्षरण की गिरफ्त में इन दिनों कोविड 19 की वजह से पर्यटन ठप है वरना अमूमन दयारा बुग्याल में साल भर दस से बारह हजार पर्यटकों की आवाजाही लगी रहती है।दयारा बुग्याल पर पिछले दो दशकों से भू धंसाव का खतरा लगातार मंडरा रहा था। भूधसांव ने इस कुदरत के नायाब तोहफे को कुरूप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शुरूआती दौर में भू क्षरण रोकने को कुछ चैक डैम बनाने के काम हुए लेकिन वह सफल नहीं हो सके। पारंपरिक रूप से पत्थरों से बनाए यह चैक डैम भी बुग्याल में हुए भूक्षरण के साथ ही खत्म हो गए।ऐसे में अब वन विभाग बिल्कुल नये विचार के साथ सामने आया है। भू धसांव को रोकने को यह विचार अपनी ओर आकर्षित भी करता है। नारियल व जूट के रेशों से तैयार किए गए केयर नेट, पिरूल से चैक डैम बंडल, बांस के खंूट से बुग्याल में धंसाव रोकने की कवायद की जा रही है।पूरी तरह से ईको फ्रेंडली यह ढांचा कितना प्रभावी होगा यह समय ही बताए लेकिन यह बुग्याल को बिना कोई नुकसान पहुंचाए धंसाव रोकने का प्रभावी तरीका तो लगता ही है। इस ईको फ्रेंडली तरीके से धंसाव को रूकेगा साथ ही बुग्याल में धंसाव वाले इलाके हरे भरे भी हो सकेंगे। ग्रामीणों की ओर से तैयार किए गए केयर नेट, चैक डैम बंडल लगाने का काम भी रैथल के ग्रामीणों ने ही किया है।पता चला है कि बुग्यालों में भू धंसाव रोकने का यह अनोखा तरीका पहली बार दयारा में ही प्रयोग में लाया जा रहा है, इसके बाद देश भर में बुग्यालों में हो रहे भू क्षरण में इस तकनीकि को प्रयोग में लाया जाएगा।वनाग्नि के लिए दोषी माने जाने वाली चीड़ की पत्तियों का भी सदुपयोग है। चीड़ की पत्तियों के बंडल तैयार कर चैक डैम बनाने से वनाग्नि का बड़ा कारण बनने वाला यह चीड़ बुग्यालों के संरक्षण में खपाया जा सकेगा। बरसात और पानी के बहाव से जमीन की सतह का पतली परतों के रूप में निरंतर होने वाले कटाव और भूस्खलन से बड़े पैमाने पर मिट्टी का क्षरण होता है। इससे कृषि भूमि की उत्पादकता में गिरावट होती है। जंगलों की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियां भी मिट्टी के कटाव के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। कमजोर भौगोलिक गठन, भूकंपीय सक्रियता, अधिक बरसात और बादलों के फटने जैसी प्राकृतिक घटनाएं मिट्टी के कटाव का प्रमुख कारण होती हैं। बुग्यालों को प्रभावी संवेदनशील सोच विकसित कर बनाये बचाये रखना है. जब से आवाजाही बढ़ी इस दुर्लभ सम्पदा का सबसे बड़ा शत्रु साफ दिखाई देता है. अपने निजी हित व स्वार्थ से दुर्लभ व बेशकीमती जड़ी बूटियों व भेषज का अंधाधुंध दोहन कर कई प्रजातियां समाप्तप्राय कर दी गईं हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग (आईआईआरएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाली मिट्टी के कटाव की अनुमानित मात्रा 14.7 करोड़ (147 मिलियन) हेक्टेयर थी। इस व्यापक आंकड़े के तहत,9.4 करोड़ (94 मिलियन ) हेक्टेयर पानी से कटाव,1.6 करोड़ (16 मिलियन) हेक्टेयर में अम्लीकरण,.4 करोड़ (14 मिलियन ) हेक्टेयर में बाढ़ और 90 लाख (9 मिलियन) हेक्टेयर में हवा के कटाव का दावा किया गया। 29 प्रतिशत मिट्टी का समुद्र में मिल कर नष्ट होना बताया गया है, जबकि सिर्फ 61 प्रतिशत मिट्टी दूसरी जगह जमा होती है।बेसल विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक कहते हैं भूमि कटाव को स्थायी भूमि में खेती और सही नीतियों के द्वारा कम किया जा सकता है। उम्मीद है कि हमारे अनुमान खतरे की भयावहता को पहचानने, भूकटाव के प्रभाव को कम करने के लिए प्रभावी उपाय बनाने में नीति निर्माताओं को मदद करेंगे।
लेखक,वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।











