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उत्तराखंड गौरव लोक गायक हीरा सिंह राणा

13/06/25
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
एक ऐसा राज्य जिसका हिस्सा बनना दुनिया के हर शख्स की चाहत होती है। भिन्न संस्कृति होने के बाद भी वह दूसरों को अपनी ओर खींचता है। यहां के लोकसंगीत केवल पहाड़ियों को हीं नही बल्कि किसी को भी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं। एक ऐसा ही गाना है रंगिली बिंदी घाघरी काई… जो हीरा सिंह राणा द्वारा गाया था और पूरी दुनिया में छा गया।हीरा सिंह राणा जी हर महफिल की जान होते थे। उत्तराखँड ना जाने कितने ऐसे सम्मान हैं, जो राणा जी को दिए जा चुके हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन और ना जाने कितने ही संचार माध्यमों के जरिए हीरा सिंह राणा जी ने उत्तराखँड की संस्कृति और सभ्यता को दुनिया के सामने पेश किया। शुरुआत में राणा जी ने सरकारी नौकरी की थी, लेकिन ये नौकरी इसलिए छोड़ी थी, क्योंकि उत्तराखंड के संगीत की साधना करनी है। जाने माने कवि और गीतकार हीरा सिंह राणा वर्तमान में गढ़वाली-कुमाऊँनी-जौनसारी’ भाषा अकादमी दिल्ली के पहले उपाध्यक्ष थे। कुमाऊनी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार, संगीतकार और गायक हीरा सिंह राणा को हृदयाघात हुआ जिसके बाद आज सुबह ढाई बजे दिल्ली में उनका निधन हो गया, राणा जी 77 साल के थे। हीरा सिंह राणा जी का जन्म 16 सितंबर 1942 को उत्तराखण्ड के कुमाऊं के एक खूबसूरत गांव मानिला डंढ़ोली में हुआ था, ये गांव अल्मोड़ा जिले में पड़ता है. उनकी माता का नाम स्व: नारंगी देवी और पिता स्व: मोहन सिंह थे। अल्मोड़ा जिले के मानिला डंढोली गांव में 16 सितंबर 1942 को नारंगी देवी व मोहन सिंह के घर जन्मे राणा की प्राथमिक शिक्षा गांव के ही स्कूल से हुई थी। 15 वर्ष की आयु में लोकगीतों की रचना करने लगे। रोजी-रोटी के दिल्ली गए। सेल्समैन की नौकरी की। बाद 1971 में ज्योली बुरुंश, 1974 में नवयुवक केंद्र ताड़ीखेत, 1985 में मानिला डांडी, 1992 हिमांगन कला संगम दिल्ली, 1987 में मनख्यू पड्याव जैसे लोक सांस्कृतिक समूहों का गठन कर लोक संगीत यात्रा को आगे बढ़ाया। पहाड़ व पहाड़वासियों की अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर राणा हमेशा सक्रिय रहे। उनकी कलम ने लोगों का दुख-दर्द लिखा और जुबान हौसला व साहस रूपी आवाज बनी। ””लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा, फिर भुला उजालि होलि कां ले रोलि राता..”” गीत में यह साफ झलकता है। राणा को अपनी मातृ भूमि से कितना लगाव था, उनकी बानगी उन्हीं के गीत ””मेरी मानिला डांडी तेरी बलाई ल्योंला, तू भगवती छै तू ई भवानी, हम तेरी बलाई ल्योंला”” से झलकती है।उत्तराखंड के लोगों का जंगल व जानवरों से गहरा जुड़ाव रहा है। राणा ने इस जुड़ाव को ””आ ली ली बाकरी ली ली छु छु”” गीत से बयां किया। हीरा सिंह राणा जी के कुमाउनी लोक गीतों के अल्बम रंगीली बिंदी, रंगदार मुखड़ी, सौमनो की चोरा, ढाई विसी बरस हाई कमाला, आहा रे ज़माना जबर्दस्त हिट रहे थे। उनके लोकगीत ‘रंगीली बिंदी घाघरी काई,’ ‘के संध्या झूली रे,’ ‘आजकल है रे ज्वाना,’ ‘के भलो मान्यो छ हो,’ ‘आ लिली बाकरी लिली,’ ‘मेरी मानिला डानी,’ कुमाऊनी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में शुमार हैं। हीरा सिंह राणा उत्तराखंडी लोक संगीत के चमकते सितारे का नाम था। अपने नाम के अनुरूप वह काम के भी हीरा थे। वह खुद मिजात (फैशन) पसंद नहीं थे, लेकिन उनके गीतों में मिजात की बात खूब होती। ‘आय हाय रे मिजाता ओ होय होय रे मिजाता’ गीत जब भी बजता बड़े-बूढ़े भी ठुमके लगाने लगते। मन यौवन से भर उठता। आज जब खुद को खूबसूरत दिखाने के लिए भारी भरकम मेकअप होता है, पार्लर व सैलून में मोटी धनराशि खर्च होती है। इसके बाद भी रंग-बिरंगी बिंदी, काली घाघरी और लाल किनारे वाली धोती में जो सौंदर्य निखरता है उसकी बात ही अलग होती है। तभी राणा ने गीत रचा ‘रंगीली बिंदी घाघरी काई, धोती लाल किनार वाली..।’ यह गीत आज की पीढ़ी को भी खूब पसंद है। राणाजी जहां भी जाते श्रोता इस गीत को सुनने की फरमाइश जरूरत करते। उन्हें अपनी जन्मभूमि से बेहद लगाव था। वह उसकी बलाई लेेते। समाज को अपनी मातृभूमि से जोडऩे के लिए उन्होंने गीत रचा ‘मेरी मानिला डानी हम तेरी बलाई ल्यूला, तू भगवती छ भवानी हम तेरी बलाई ल्यूना..।’ राणा कविताएं भी रचते थे। पहाड़ की महिला के संघर्ष को महसूस किया तो रचना फूटी ‘पहाड़ाक महिलाओंक तप और त्याग, आफी बड़ा जैले आपड़ भाग, राजुली सैक्याणी मालू घस्यारी, रामी बैराणा पहाड़ की नारी..।’ वह राज्य आंदोलन में भी सक्रिय रहे। नवोदित उत्तरांचल राज्य बनने की खुशी में गीत रचते हुए लिखा ‘उत्तरांचल राज्य हैगो गीत गाओ, फूंको हो रणसिंह नगाड़ ढोल बजाओ..।’ मगर राज्य बनने के बाद भी हालात नहीं बदले। पलायन, बेरोजगारी की पीड़ा को महसूस करते हुए उन्होंने मार्मिक कविता रची। ‘त्यर पहाड़ म्यर पहाड़, रयो दुखों को ड्यर पहाड़, बुजुर्गों लै जोड़ पहाड़, राजनीति लै तोड़ पहाड़, ठेकदारों लै फोड़ पहाड़, नानतिनू लै छोड़ पहाड़..। इसके बाद भी हीरा राणा हौसला और उम्मीद भरते हुए लिखते हैं ‘लस्का कमर बांधा हिम्मत का साथ, फिर भोल उज्याल होली कां लै रोली रात..।’ हीरा सिंह राणा भले हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके कालजयी गीत हमें सदा आनंदित करते रहेंगे। दिल्ली सरकार की ओर से गठित गढ़वाली-कुमाऊंनी, जौनसारी भाषा अकादमी के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद पिछले साल अक्टूबर में हीरा सिंह राणा हल्द्वानी आए थे। अभिव्यक्ति कार्यशाला संस्था की ओर से आयोजित लोक उत्सव में शामिल हीरा सिंह ने बताया था कि उन्होंने 1960 में पहली बार गायन किया। इतनी लंबी संगीत यात्रा के बावजूद दो साल पहले प्रदेश सरकार ने पेंशन मंजूर की। वह कहते कलाकार को प्रोत्साहित करना जरूरी है। उसे सम्मान के साथ बुनियादी सुविधाएं और कुछ धन भी चाहिए। हमें अपनी बोली-भाषा से नई पीढ़ी को परिचित करना होगा। संस्कृति के विकास के बिना लोक की जड़ें मजबूत नहीं हो सकती।

 

 

लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा.
फिरनी भोला उज्याला होली, कां रोली राता.
ऊं निछ आदिम कि, जो हिम्मत कै हारौ.
हाय मेरी तकदीर कनै, खोर आपण मारौ.
मेहनतै कि जोतलै जौ, आलसो अन्यारौ.
के निबणीनि बाता, धरिबे हातम हाता.
जे के मनम ठानि दिया, हैछ क्या ठुली बाता.
हण चैं मनम हौंस छु क्या, चीज घबराणौं.
धरि खुटी आगीला, फिर के पछिली आंणौं.
छौं आपण हातौ माजा, तकदीर बनाणौ.
जब क्वे नि मानो बाता, खुट-हाथ फौलादा.
शीर पाणिकी वां फुटैली, जा मारूल लाता.
यौ निहुनों उनिहुनों, झुलि मरौ किलै की.
माछि मनम डर निरैनी, चैमासी हिलै की.
टिके रौ हौ संसार आपण, आस मा दिलै की.
करबे करामाता, जैल रौ कि यादा.
के बणी के बणै बेरा, जाण चहीं बर्साता.
दुःख-सुख लागियै रौल, जबलै रूंल ज्यौना.
रूड़ि गोय चौमास आंछ, चौमास बे ह्यूना.
जब झड़नी पाता, डाइ हैंछ उभ्याता.
एक ऋतु बसंत एैंछ, पतझड़ का बादा.
हिम्मत के साथ अपनी कमर को कसकर बांधो, कल फिर उजाला होगा और रात कोने में बैठ जायेगी. वो आदमी नहीं है जो हिम्मत को हार जाता है और हाय! मेरी तकदीर कह कर अपने सिर को ही पीटता है. मेहनत से ही आलस भरा अंधेरा दूर हो सकता है. हाथ पर हाथ रखकर कोई भी बात नहीं बनती है अगर मन मैं ठान दिया तो कोई भी बात बड़ी नहीं है. अगर मन में जोश है तो किस चीज से घबराना. एक पैर आगे रखो फिर पिछला पैर स्वयं ही आगे आयेगा. अपने हाथ से तकदीर बनाने का मजा ही कुछ और है. जब कहीं से बात न बने तो अपने हाथ-पैर ही फौलाद हैं. पानी की धार वहीं फूटेगी जहां हम लात मारेंगे. दुःख- सुख लगे रहते हैं, जब तक जिदंगी है गर्मी के बाद चौमास आता है, चौमास के बाद जाड़ा, जब पत्ते झड़ जाते हैं तो पेड़ ऊंचा लगने लगता है और उसी पतझड़ के बाद खुशहाली की ऋतु बंसत आती है. राज्य स्थापना दिवस 2019 के अवसर पर संस्कृत विभाग उत्तराखंड द्वारा साहित्य सम्मेलन आयोजित किया गया था इस अवसर पर स्व0 श्री हीरा सिंह राणा जी को सम्मानित भी किया गया। इसके अलावा समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण मंच पर उन्हें सम्मानित किया गया । उन्होंने कहा कि कुमाऊनी लोकगीत को उन्होंने अपनी मधुर आवाज देकर विशिष्ट पहचान बनाई ।उनकी सुप्रसिद्ध रचना आज काल हरै जवान मेरी नौली पराण, जैसे अनेक गीतों ने उन्हें ख्याति प्रदान की। फरवरी 2020 में भारत सरकार द्वारा उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सलाहकार नियुक्त किया गया था. परन्तु विधि का विधान कुछ और ही था. 13 जून 2020 को 78 वर्ष की अवस्था में हीरा सिंह राणा ने अपनी कर्मभूमि दिल्ली में ही अंतिम सांस ली और अपने हजारों लाखों प्रेमियों को निराश कर के अनन्त की यात्रा पर निकल पड़े.महानगरीय संस्कृति के प्रभाव से आज कुमाउँनी भाषा और संस्कृति अपनी पहचान खोने के दौर से गुजर रही है. ऐसे कठिन दौर में हमारे बीच से हीरा सिंह राणा जैसे लोककवि और दुदबोलि भाषा के उन्नायक लोक गायक का अचानक ही चला जाना बहुत ही दुःखद था. उनके साहित्यिक और लोकगायिकी से कुमाउँनी भाषा और संस्कृति को लोकप्रियता के नए आयाम मिले हैंलोक गायक हीरा  सिंह राणा उत्तराखंड की शीर्ष लोक गायक के साथ साहित्यकार भी रहे । उनके गीतों और कविताओं ने उत्तराखंड की जनमानस को झकझोर के  रखा था उत्तराखंड राज्य गठन आंदोलन से लेकर उत्तराखंड के हक हक हक के संघर्ष में उत्तराखंड की शीर्ष लोक गायक हीरा सिंह राणा  व नरेंद्र सिंह नेगी की जोड़ी सदैव जनता का मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन अपने गीतों से करते थे।उनके अपार योगदान को देखते ही दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली के विशाल आयोजन में उन्हें उत्तराखंड गौरव से सम्मानित किया था।अपनी पत्नी और बेटे के साथ हीरा सिंह राणा जी  पूर्वी दिल्ली में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री  की विधानसभा क्षेत्र में निवास करते थे।फक्कड़ स्वभाव के हीरा सिंह राणा उत्तराखंड को समर्पित रहते थे और  वे ताउम्र गायकी कोही  समर्पित रहे। श्री हीरा सिंह राणा के समर्पण को देखकर ही दिल्ली के वरिष्ठ समाजसेवी उद्यमी चंद्र बल्लभ टम्टा सहित तमाम संस्था मजबूती से खड़ी रहती थी।,इसलिए यह पर्वतीय लोकसंस्कृति के लिए भी अपूरणीय क्षति थी. आज उत्तराखंड के लोकगायक श्री हीरा सिंह राणा को शत शत नमन! अभिवंदन! . *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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