डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
डिजिटल युग में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. बच्चे, युवा, महिलाएं सभी इसका खूब उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग लोगों को मानसिक और शारीरिक बीमारियां दे रहा है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, साथ ही मानसिक थकान भी बढ़ती है. मोबाइल का अधिक उपयोग व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को कमजोर करता है. बच्चों में रचनात्मकता कम हो रही है, क्योंकि वे खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों की बजाय मोबाइल पर ज्यादा समय बिता रहे हैं. इससे एकाग्रता भी घट रही है और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. युवा देर रात तक सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, जिससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती और वे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से घिर जाते हैं. लगातार मोबाइल उपयोग से महिलाओं में मानसिक थकान और असंतुलन बढ़ रहा है. आज घर घर में बच्चे और युवा धड़ल्ले से मोबाइल पर स्क्रीनिंग कर रहे है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है की यह उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई के लिए कितना खतरनाक है। मीडिया में युवा पीढ़ी को मोबाइल लत के खतरे से लगातार आगाह किया जा रहा है। अनेक युवा इसके दुष्परिणामों के शिकार होकर अस्पतालों में अवसाद का इलाज़ करा रहे है। सेंसर टावर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अपने देश में गत वर्ष मोबाइल पर 1.12 ट्रिलियन घंटे स्क्रीनिंग की गई जो दुनियाभर में सर्वाधिक आंकी गई है। इससे पता चलता है 18 वर्ष की आयु सीमा के 40 करोड़ बच्चे में से हर तीसरा बच्चा मोबाइल अवसाद का शिकार है, जिनकी संख्या 13 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इसी भांति एक अन्य नई रिसर्च के मुताबिक मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप जैसे गैजेट्स न केवल बच्चों के स्वास्थ्य अपितु उनके शैक्षिक जीवन के लिए भी खतरा बन रहे है। टेक्नोलॉजी के इस दौर में बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट से ही अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। खासकर कोविड में ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उनके बीच पीन टाइम बहुत बढ़ा है। पांच हजार से ज्यादा कनाडाई बच्चों पर साल 2008 से 2023 तक चली एक रिसर्च बताती हैं कि बढ़ते पीन टाइम के कारण बच्चों में बेसिक मैथ्स और पढ़ने की समझ ठीक से विकसित नहीं हो पा रही है। यहां तक कि स्क्रीन टाइम की वजह से बच्चों के मार्क्स में 10 फीसदी तक कमी आई है। एक अन्य रिपोर्ट में यह सामने आया है कि 73 प्रतिशत स्कूली बच्चे अश्लील सामग्री देखते हैं। वहीं, 80 प्रतिशत बच्चे रोज़ाना सोशल मीडिया पर कम से कम 2 घंटे बिताते हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर पड़ रहा है। मोबाइल आपका दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। एक स्टडी रिपोर्ट में एक बार फिर मोबाइल के खतरे से सावचेत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है पैरेंट्स बिना सोचे-समझे सिर्फ दो-ढाई साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। इसके बाद बिना मोबाइल यूज किए बच्चा खाना तक नहीं खाता है। हालांकि इंफॉर्मेशन, टेक्नॉलोजी और एआई के दौर में मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी है। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को मोबाइल देने की क्या जरूरत है? अगर आप भी मोबाइल एडिक्शन को सीरियसली नहीं ले रहे हैं, तो आपको बता दें कि सेलफोन आपके बच्चों का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। कच्ची उम्र में बच्चों को डिजिटल डिमेंशिया जैसी घातक बीमारी हो सकती है। ब्रिटेन में हुई स्टडी के मुताबिक दिन में 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम से वैस्कुलर डिमेंशिया और अल्जाइमर का जोखिम बढ़ जाता है। फोन पर घंटो पॉल करने पर ढेरों फोटोज, एप्स, वीडियोज सामने आते हैं जिससे आपके दिमाग के लिए सब कुछ याद रखना मुश्किल हो जाता है। परिणाम स्वरूप आपकी याद्दाश्त, कॉन्संट्रेशन और सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। स्क्रीन टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। पीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है। मोबाइल बच्चों का दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए अभिभावकों को इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है।आज के समय में घंटों मोबाइल का उपयोग, जंक फूड का बढ़ता शौक और शारीरिक सक्रियता में कमी युवाओं के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन गई है। देहरादून के अस्पतालों की ओपीडी में आने वाले 20 से 35 वर्ष के युवाओं में से लगभग 10 से 15 प्रतिशत मरीज फैटी लीवर, बढ़ते कोलेस्ट्रॉल और माइग्रेन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, डिजिटल स्क्रीन के सामने ज्यादा वक्त बिताने और गलत तरीके से बैठने के कारण युवाओं में गर्दन और कमर दर्द (सर्वाइकल) की समस्या तेजी से बढ़ रही है।देर रात तक जागना, मोबाइल देखते हुए खाना खाना और बाहर के जंक फूड पर निर्भरता ने युवाओं के मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ दिया है। घंटों सोशल मीडिया रील्स और वीडियो देखने की लत ने शारीरिक व्यायाम को लगभग खत्म कर दिया है, जिससे मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। यही कारण है कि युवाओं में अब वो बीमारियां देखी जा रही हैं जो पहले केवल अधिक उम्र के लोगों में होती थीं, जैसे कि लीवर की समस्याएं और हाई कोलेस्ट्रॉल।वे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में जीने लगे हैं जहां असली रिश्तों और धैर्य की कोई जगह नहीं बची है. आज की दुनिया में मोबाइल हर किसी को अपना गुलाम बना रहा है. मोबाइल की रोशनी सीधे तौर पर आंखों को नुकसान पहुंचाती है. इसका सबसे बुरा असर छोटे बच्चों पर हो रहा है क्योंकि वे इसके आदि हो चुके हैं. उन्हें खाना खाने से लेकर पढ़ाई तक, हर काम में बस मोबाइल चाहिए.डॉक्टर ने सलाह दी है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए सबसे पहले माता-पिता को उनके सामने मोबाइल का इस्तेमाल कम करना होगा. छोटे बच्चों को कम से कम 2 से 3 साल की उम्र तक टीवी या मोबाइल की स्क्रीन बिल्कुल न दिखाएं. बच्चों के हाथ में मोबाइल देने के बजाय उनके साथ समय बिताएं, उनके साथ खेलें और उन्हें पढ़ाई में मदद करें. अगर घर के बड़े ही बच्चों को मोबाइल चलाना सिखाएंगे, तो उसका सीधा असर उनकी आंखों और दिमाग पर पड़ेगा. इससे बच्चा जिद्दी हो जाता है, सबसे दूरियां बनाने लगता है और वह शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है. इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 में कहा गया है कि तेज़ी से ऑनलाइन होती दुनिया में रहने वाले भारत के युवाओं के लिए डिजिटल लत एक बड़ी और बढ़ती समस्या बन रही है. सर्वे में कहा गया है कि भारत को सिर्फ डिजिटल सुविधा देने पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार से जुड़ी सेहत की समस्याओं जैसे डिजिटल लत, कंटेंट की क्वालिटी, लोगों की भलाई पर पड़ने वाले असर और डिजिटल साफ-सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए. इस समस्या से निपटने के लिए, युवाओं को मोबाइल फोन के उपयोग को सीमित करने के लिए जागरूकता और स्व-नियंत्रण की आवश्यकता है। अभिभावकों और शिक्षकों को भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए, ताकि युवा अपने समय का सदुपयोग कर सकें और एक स्वस्थ और संतुलित जीवन जी सकें। सर्वे में कहा गया है, “जहां मोटापा और सही पोषण की कमी युवाओं के शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, वहीं डिजिटल लत उनके मानसिक और सामाजिक विकास को कमजोर करती है. ये सभी एक-दूसरे से जुड़ी समस्याएं हैं और अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य और मानव संसाधन को बचाने के लिए पॉलिसी की ज़रूरत को दिखाती हैं.” भारत की चुनौती यह है कि युवाओं की भागीदारी को दोबारा संतुलित किया जाए, जहां सुरक्षा से जुड़े नियम भी हों और ऑफलाइन सकारात्मक मौके भी मिलें, न कि तकनीक को पूरी तरह गलत बताया जाए.”लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












