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मेथी में औषधीय तत्वों की भरमार

03/11/19
in हेल्थ
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
सर्दियां आते ही बाजार में मेथी बहुतायत नजर आने लगती है। सब्जी से लेकर पराठे तक में इसका प्रयोग किया जाता है। जहां यह खाने में स्वादिष्ट है, वहीं आयुर्वेद के नजरिए से भी इसके कई फायदे हैं। भारत में सदियों से इसके पत्ते और दानों को आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसका पौधा दो.तीन फुट लंबा होता है और इसकी फली में छोटे.छोटे पीले.भूरे रंग के सुगंधित दाने होते हैं। भूमध्य क्षेत्र, दक्षिण यूरोप और पश्चिम एशिया में इसकी खेती बहुतायत में होती है। भारत में क्षेत्रवार के अनुसार मेथी को अलग.अलग नामों से बुलाया जाता है। जहां हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगाली और पंजाबी में इसे मेथी कहते हैं, वहीं संस्कृत में इसका नाम मेथिका है। कन्नड़ में इसे मेन्तिया, तेलुगु में मेंतुलु, तमिल में वेंडयम, मलयालम में वेन्तियम, अंग्रेजी में फेनुग्रीक और लेटिन में त्रायिगोनेल्ला फोएनम ग्रीकम के नाम से जाना जाता है।
त्वचा और बालों के लिए मेथी के फायदे शुगर के मरीजों को अक्सर अपनी डाइट में मेथी के दाने शामिल करने के लिए कहा जाता है। इसके सेवन से शुगर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। टाइप.2 डायबिटीज के लिए मेथी के दाने किस तरह से फायदेमंद है, इस पर वैज्ञानिकों ने कई शोध किए, जिसके सकारात्मक प्रभाव शोध में पाया गया कि मेथी के दाने में घुलनशील फाइबर होता है, जो पाचन की क्रिया को धीरे कर देता है। यह कार्बोहाइड्रेट के पाचन और अवशोषण की दर को कम कर देता है। मेथी के दाने रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करते हैं और इंसुलिन की संवेदनशीलता को बेहतर करते हैं।
मेथी के पौष्टिक तत्व
प्रति 100 ग्राम मेथी के दानों में पोषक तत्व
पोषक तत्व मात्रा प्रतिशत
ऊर्जा 323 कैलोरी 16
कार्बोहाइड्रेट 58.35जी 45
प्रोटीन 23जी 41
फैट 6.41जी 21
कोलेस्ट्रॉल 0 एमजी 0
डाइटरी फाइबर 24.6जी 65

विटामिन्स
फोलेट 57एमसीजी 14
नियासिन 1.640एमजी 7
पायरीडॉक्सीन 0.600एमजी 46
रिबोफ्लेविन 0.366एमजी 28
थायमिन 0.322एमजी 27
विटामिन.ए 60आईयू 2
विटामिन.सी 3एमजी 5

इलेक्ट्रोलाइट्स
सोडियम 67एमजी 4.5
पोटैशियम 770एमजी 16

मिनरल्स
कैल्शियम 176एमजी 18
कॉपर 1.110एमजी 123
आयरन 33.53एमजी 419
मैग्नीशियम 191एमजी 48
मैंगनीज 1.228एमजी 53
फास्फोरस 296एमजी 42
सेलेनियम 6.3एमसीजी 11
जिंक 2.50एमजी 23

जैविक खेती से होने वाले फायदे और नुकसान एक बार फिर से चर्चा में हैं। रासायनिक छिड़काव और पेस्टीसाइड से भले ही किसानों को अधिक पैदावार मिल जाती है, लेकिन अक्सर इसमें लाभ से कहीं अधिक नुकसान ही रहा है। एक तरफ जहां इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति ख़त्म होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर यह भूजल में मिलकर प्राकृतिक जल स्रोतों को दूषित कर रहा है। इन दोनों सूरतों में खामियाज़ा इंसानी ज़िंदगी को गंभीर बिमारी के रूप में चुकाना पड़ रहा है। दूसरी ओर जैविक खेती से अपेक्षाकृत लाभ तो कम हैए लेकिन धीरे धीरे इसे फायदे का सौदे के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल क़िला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी किसानों को रसायन और पेस्टीसाइड के कम से कम प्रयोग की सलाह दे चुके हैं। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने अपील की थी कि हमें धरती मां को बीमार बनाने का हक़ नहीं है। प्रधानमंत्री के संबोधन से साफ़ है कि सरकार इस दिशा में किसी ठोस परिणाम के लिए गंभीर हैं श के कई राज्यों में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके लिए राज्य सरकार के साथ साथ केंद्र की ओर से भी विशेष पैकेज दिए जा रहे हैं। देव भूमि कहे जाने वाले पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी जैविक खेती को बढ़ावा देने पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है। इसके लिए केंद्र की ओर से 1500 करोड़ रूपए की योजना भी स्वीकृत की गई है। जिसमें 10 हज़ार ऑर्गेनिक क्लस्टर बनाने की दिशा में कार्य प्रगति पर है। इसके लिए राज्य के कई स्वयंसेवी संस्थाओं को भी जोड़ा गया है। रानीखेत से लगभग 21 किमी की दूरी पर स्थित अल्मोड़ा ज़िले के द्वाराहाट ब्लॉक में उगता सूरज स्वायत्य सहकारिता संस्था द्वारा कामा गांव में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए 2018 से विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिसमें रीजनल काउंसलिंग के तौर पर सर्टिफिकेशन दिलाने का काम सुविधा संस्था द्वारा किया जा रहा है।
उगता सूरज की ओर से योजना के अंतर्गत तीन क्लस्टरों के माध्यम से गांव के सदस्यों को जोड़ा जा रहा है। ताकि धीरे धीरे लोग इसके प्रति जागरूक हो सकें। रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान पर चर्चा करते हुए उगता सूरज संस्था की अध्यक्षा कमला देवी का कहना था कि दस साल पहले की अपेक्षा वर्तमान में उत्पादन कम होता जा रहा है। कम समय में अधिक फसल की लालच में किसानों ने रसायनों का अत्यधिक प्रयोग कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ख़त्म कर दिया है। ऐसे में उन्हें रासायनिक खेती से जैविक खेती की तरफ मोड़ना एक बड़ी चुनौती थी। उगता सूरज ने किसानों को इसका लाभ बताने के लिए ज़मीनी स्तर पर कई कार्यक्रमों का आयोजन करना शुरू किया। उन्हें एक तरफ जहां जैविक खेती के लाभ बताये गए वहीं रासायनिक खेती से होने वाले नुकसानों से भी अवगत कराया गया। इसके साथ ही सरकार द्वारा किसानों को जैविक खेती के लिए मुफ्त उपलब्ध कराये जाने वाले बीज, खाद और प्राकृतिक रूप से तैयार कीटनाशक दवाओं की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाने लगी। ताकि किसान की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुए बिना उनके उत्पादन को बढ़ाया जा सके। किसानों को गोबर से बनने वाली खाद की उपयोगिता से भी अवगत कराया जाने लगा। ध्यान रहे कि गोबर की खाद का प्रयोग करने से जहां ज़मीन में नमी की मात्रा बढ़ती हैए वहीं पानी की भी कम आवश्यकता पड़ती है। जैविक खेती के तहत लगभग एक तिहाई भाग में पानी की आवश्यकता होती है। जो कि वर्षा के पानी को रेन वॉटर हार्वेसिं्टग टैंक और बरसाती टैंक बनाकर वर्ष में दो फसल उगाई जा सकती है। उगता सूरज स्वायत्य सहकारिता संस्था द्वारा की जा रही इस पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। पहले की अपेक्षा अधिक से अधिक किसान अब जैविक खेती पर ज़ोर देने लगे हैं। इसका एक लाभ यह भी हुआ है कि महुआ और झुंगरा जैसी परंपरागत खेती की तरफ किसान एक बार फिर मुड़ने लगे हैं।
संस्था की अध्यक्षा कमला देवी के अनुसार जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ साथ संस्था उन्हें बाज़ार भी उपलब्ध कराती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में सबसे अधिक समस्या मार्केट की होती है। ऐसे में उन्हें स्थानीय बाज़ार उपलब्ध कराकर उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पहल से किसानों में आशा जगी है कि जो स्थानीय स्तर पर उत्पादन किया जा रहा हैए उसमें सहकारिता संस्था उन्हें बाज़ार उपलब्ध कराने में सहयोग करेगी। जिससे उत्पादन का उन्हें उचित दाम मिलेगा। वास्तव में आज रासायनिक खेती की अपेक्षा जैविक उत्पादन की पहचान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है। जिससे किसानों को लाभ हो रहा है। वहीं आने वाले समय में उन्हें और अधिक पहचान मिलेगी। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में जहां सुधार होगा वहीं लोगों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
यही कारण है कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए इसे सतत विकास लक्ष्य में भी प्रमुखता से जोड़ा गया है।अरबी और मेथी के पत्तों को मिलाकर बनाई हुई अरबी मेथी की लटपटी सब्जी खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके में इसे गडेरी मेथी की सब्जी भी कहते हैंण् अंतरराष्ट्री य बाजार की बात करें तो वहां मेथी का भाव 1.59 डॉलर प्रति किलोग्राम बोला जा रहा है। लेकिन इस भाव के नई मेथी की आवक तेज होने पर टिकने की उम्मीमद कम है। इस साल बढ़ी बोआई और कैरी फारवर्ड स्टॉेक मेथी के दाम ज्या दा दिन ऊंचे स्तमर पर इसे रहने नहीं देंगे। नेशनल हार्टिकल्च र बोर्ड, दिल्लीा के पहले एडंवास अनुमान के मुताबिक देश में 66 हजार हैक्टेलयर में मेथी की बोआई हुई है और यह उत्पालदन 90 हजार टन रहने का अनुमान है। वर्ष 2013.14 में देश में मेथी की बोआई 65.94 हजार हैक्टेरयर मे हुई थी और इसका उत्पा2दन 89.61 हजार टन रहा था। यह बोआई वर्ष 2012.13 में 93 हजार हैक्टेयर और उत्पामदन 11,2870 टन था।
भारतीय मसाला बोर्ड के मुताबिक वर्ष 2015-16 में मेथी का निर्यात 35,575 टन और वर्ष 2012.13 में 13811 टन रहा। मसाला बोर्ड के मुताबिक वर्ष 2014.15 में मेथी का निर्यात लक्ष्य 32 हजार टन है। इस लक्ष्यस में से अप्रैल से सितंबर 2014 के दौरान मेथी का निर्यात 10950 टन ही हुआ। यह निर्यात अप्रैल से सितंबर 2017 के दौरान 18,289 टन था मेथी के लड्डू का नाम सुन कर ही मुह में पानी आ जात्ता है और जिन लोगों ने कभी भी ये लडू खाये होंगे उनको इसके आयुर्वेदिक गुण का भी पता होगाण्हिमालयी राज्य उत्तराखंड में आज पलायन एक बड़ी समस्या बन चुकी है। गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं खेत.खलिहान बंजर हो रहे हैं और आबाद क्षेत्र अब वीरान हो रहे हैंण् पलायन रोकने की कोशिश तो बहुत हो रही लेकिन चुनौतियां प्रयासों पर भारी पड़ती नज़र आ रही हैं। यह पलायन रुकने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिमालय राज्य के लिए यह जीवनदान होगा। उन्होंने कहा कि विभिन्न मंत्रालयों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों से संवाद कर इस कड़ी को आगे बढ़ाया हैण् सांसद बलूनी की माने तो अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी। कुल मिलकर पर्वतीय राज्य की जिस अवधारणा के साथ उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई लड़ी गयी थी वह धरातल से कोसों दूर ही है। पलायन ने हिमालयी राज्य की अवधारणा को ध्वस्त कर दिया है। 18 साल पहले राज्य बना लेकिन परंपरागत पर्वतीय जनजीवन की खुशहाली के लिए कुछ भी ठोस दिशा नीति तय की गई है।

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