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सुसवा और सांग, गंगा में उढेल रही हैं देहरादून शहर की संपूर्ण गंदगी

अब वाडिया इंस्टिट्यूट कर रहा है सरफेस और ग्राउंड वाटर का सर्वेक्षण, रिपोर्ट दी जाएगी केंद्र और राज्य सरकारों को

15/10/25
in उत्तराखंड, डोईवाला, देहरादून, हरिद्वार, हेल्थ
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शंकर सिंह भाटिया

दूधली घाटी कभी देहरादून की बासमती के उत्पादन के लिए अपना विशेष स्थान रखती थी। अब इस पूरी घाटी में बासमती का एक खेत भी नहीं दिखाई देता। दूधली घाटी को अब कैंसर घाटी के नाम से भी जाना जाने लगा है, क्योंकि यहां लगातार कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। दूधली घाटी की चार ग्राम पंचायतों दूधली, नागल बुलंदावाला, नागल ज्वालापुर और सिमलास-झंडोद के अलावा इसके बाहर सत्तीवाला, बुल्लावाला, झाबरावाला, तेलीवाला के अलावा कांसरो नेपाली फार्म के आसपास के गांव देहरादून शहर से निकलकर आने वाली नदियों रिस्पना और बिंदाल में शहर का सीवर, घरों का गंदा पानी, फैक्टिरियों का वेस्टेज और शहर की गंदली उढ़ेल दी जाती है। मोथरोवाला में जब इन गंदगी से भरी रिस्पना और बिंदाल का मिलन होता है, तो यह सुसवा नदी बन जाती है। नदी कहने लायक अब इसमें कुछ भी नहीं बचा है, यह देहरादून शहर की गंदगी ढोने वाला गंदा नाला बन गया है। यह गंदा नाला दूधली घाटी के आगे सत्तीवाला, बुल्लावाला, तेलीवाला, झाबरावाला से आगे कांसरो और नेपाली फार्म के आसपास की बस्तियों को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। कांसरों में सुसवा और सांग नदियों का मिलन होता है, चूंकि सांग नदी सुसवा के मुकाबले कम प्रदूषित है, इसलिए इस संगम के बाद नदी के पानी की क्वालिटी थोड़ा ठीक होती है, आगे जब कुछ और बस्तियां इससे मिलती है, तो संगम के बाद जो अब सांग नदी कही जाती है, फिर उतना ही प्रदूषित हो जाती है। यह गंदा नाला गोहरी माफी में गंगा नदी में मिल जाता है।

देहरादून के राजधानी बनने के बाद आबादी बढ़ने के साथ पिछले 25 सालों से इन नदियों का स्वरूप लगातार बदलता चला गया है और साल दर साल सुसवा और गंदी होती चली गई है। सुसवा कभी दूधली घाटी की जीवनरेखा हुआ करती थी। सुसवा के पानी से इस उपजाउ घाटी में विश्व प्रसिद्ध बासमती धान की पैदावार होती थी। गंदे पानी में बासमती की पैदावार प्रभावित होने की वजह से अब कोई भी किसान यहां बासमती नहीं लगाता। इस गंदे पानी की वजह से अन्य पैदावार भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। फसलों में कई तरह की बीमारियां लग रही है, जिनका कृषि विभाग के पास कोई उपचार ही नहीं है।

सबसे बड़ी समस्या पेयजल को लेकर उठी है। सुसवा के किनारे दूधली घाटी में पांच से अधिक ट्यूबवैल जल संस्थान ने स्थापित किए है, जहां से प्रत्येक गांव के लिए पेयजल की आपूर्ति हो रही है। यही पेयजल घाटी के गांवों में कैंसर के साथ कई अन्य तरह की बीमारी की वजह बन रहा है, ऐसा लोगों का कहना है, हालांकि इस बात की सरकार या स्वास्थ विभाग की तरफ से पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन यह सत्य है कि घाटी में कैंसर मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा, पेट के रोग, चर्म रोग भी लगातार बढ़ रहे हैं।

मैं अर्थात इस लेख के लेखक शंकर सिंह भाटिया ने दो बार देहरादून की संस्था स्पेक्स की मदद से पानी के नमूने लिए, जिनमें भूमिगत जल में सीवर मौजूद होने और कैंसरकारक रसायनों की जल में उपस्थिति की पुष्टि हुई थी। उनका प्रसारण भी किया गया। उसके बाद हमने मानवाधिकार आयोग में एक मुकदमा दर्ज कराया। इस मामले की सुनवाई करते हुए पहले यही समझना मुश्किल हो गया कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन विभाग है। अंत में पता चला कि जल संस्थान की यह जिम्मेदारी है। मानवाधिकार आयोग में सुनवाई के समय हमसे पूछा गया कि आप क्या चाहते हैं? हमने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बिंदाल एक सूखा नाला है, घरों का वेस्ट और सीवर ही इसमें बहता है, जबकि रिस्पना में लीन पीरियड में भी अच्छा खासा पानी रहता है। जल संस्थान इसका संपूर्ण पानी पेयजल आपूर्ति के लिए डायवर्ट कर देता है। जबकि नदी के जीवन को बचाने के लिए जल संसाधन मंत्रालय का एक आदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि किसी भी नदी में लाजिकल फ्लो बनाए रखना आवश्यक है। विभिन्न मामलों में अदालतों ने भी इस निर्णय का पुष्टि की है। लाजिकल फ्लो का मतलब है नदी में मौजूद पानी की 40 प्रतिशत जल राशि मूल धारा में छोड़ी जानी चाहिए। लेकिन जल संस्थान ने इस निर्णय को कभी नहीं माना। अभी भी रिस्पना का संपूर्ण पानी संस्थान डावर्ट कर देता है। इसके बाद हमने एनजीटी में भी जाने की कोशिश की, लेकिन इससे पहले कोई और लोग एनजीटी में जा चुके थे। एनजीटी के कुछ निर्णय भी आए लेकिन उसके नतीजे अभी तक सामने नहीं आए हैं।

इन सब घटनाक्रमों ने हमें बहुत अधिक निराश किया। निराश होने की एक वजह यह भी रही कि स्थानीय आबादी जो इस सबसे बुरी तरह प्रभावित है, उनमें से कोई भी साथ देने को आगे नहीं आता। निराशा के इस दौर में एक साल पहले मेरी मुलाकात सुप्रसिद्ध वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ जल विज्ञानी डा. समीर तिवारी से हुई। उनके सामने हमने सुसवा की पूरी कहनी रखी। उनके करीब एक साल के संघर्ष के बाद इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली है। जिसमें डा. समीर तिवारी के नेतृत्व में वाडिया की एक टीम पांच साल तक अलग-अलग सीजन में रिस्पना, बिंदाल, सांग और आसन नदियों के आरिजन से लेकर अलग-अलग स्थानों पर भूजल एवं सरफेस वाटर के नमूने एकत्र करेंगे। इनका परीक्षण किया जाएगा और रिजल्ट केंद्र सरकार के साथ उत्तराखंड सरकार को सौंपे जाएंगे। आगे किस तरह से इन जीवन दायिनी नदियों को फिर से इस पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा बनाना है, इन सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार कदम उठाने हैं, यह निर्णय सरकारों को लेने हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुसवा और सांग नदियां नौका से लेकर सत्यनारायण तक राजाजी नेशनल पार्क को छूकर जाती हैं। इस पानी का उपयोग पार्क के जंगली जानवरों के साथ स्थानीय किसानों के जानवर भी करते हैं। दूसरी बात गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार अरबों, खरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन सुसवा सांग जैसी अत्यधिक प्रदूषित नदियां गंगा की ट्रिब्यूट्री हैं, जो गंगा में पूरे देहरादून की गंदगी को बिना किसी ट्रीटमेंट के प्रवाहित कर रही हैं।

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फ़ोन- 9837887384

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