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सर्वाधिक बेशकीमत कीड़ा जड़ी सामिल है: डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

30/07/24
in उत्तराखंड
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

ब्यूरो रिपोर्ट। चीन अपने आर्थिक लाभ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, ये पूरी दुनिया देख रही है. चीन की नजर हिमालय की बर्फीली चोटियों पर पाई जाने वाली हिमालयन वियाग्रा (के नाम से प्रसिद्ध कीड़ा-जड़ी पर भी है. चीन कीड़ा जड़ी का हजारों करोड़ का व्यापार करता है. उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत की ऊंची हिमालयी चोटियों पर भी कीड़ा जड़ी पाई जाती है. चीन की नजर इन जिलों पर भी हो सकती है. ऐसा इसलिए अनुमान लग रहा है क्योंकि अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों की हालिया घुसपैठों की वजह का आईपीसीएससी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ. जिसकी वजह हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली कीड़ा जड़ी पर एकाधिकार करना ही बताई गई है. कीड़ा जड़ी सेक्स वर्धक के रूप में पूरी दुनिया में जानी जाती है.यारसा गंबू हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाला एक वन विभाग की विलुप्त संरक्षित प्रजातियों का पौधा है. जिसकी कीमत दिन पर दिन लगातार बढ़ती जा रही है.उच्च हिमालय क्षेत्र से उसकी बड़ी मात्रा में तस्करी की जाती है. यारसा गंबू में महत्वपूर्ण औषधि माना जाता है. बाजारों में इस औषधि की कीमत बहुत ज्यादा है. इस औषधि को कीड़ा जड़ी भी कहा जाता है, ये बेहद कीमती औषधि है. दुनिया के कई देशों में हिमालयन वियाग्रा के नाम से मशहूर कीड़ा जड़ी को सेक्स वर्धक होने के साथ-साथ ट्यूमर, टीबी, कैंसर और हेपेटाइटिस जैसी जानलेवा बीमारियों में उपयोग में लाया जाता है. इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 30 से 40 लाख रुपये प्रति किलो तक मानी जाती है. कीड़ा जड़ी विलुप्त जड़ी बूटियों की श्रेणी में आती है, जो उच्च हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है. इसकी बड़े पैमाने में तस्करी होती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीड़ा जड़ी की बड़ी डिमांड है. कीड़ा जड़ी का उपयोग दिल की धड़कन बढ़ाने के इलाज में किया जाता है. साथ ही श्वसन, किडनी और लीवर के रोगों में सबसे ज्यादा फायदेमंद होती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीड़ा जड़ी की कीमत40 लाख रुपये प्रति किलोग्राम होती है. कोई भी प्रजाति जिसका जरुरत से ज्यादा दोहन किया जाएगा वह अंततः समाप्त हो जायेगी चाहे वह कितनी ही प्रतिरोधी,लचीली और परिस्थितयों के अनुसार अनुकूलन करने वाली क्यों न हो। देखने में आया है कि इसके दोहन को लेकर अपनाए जा रहे तरीके इसके पुनर्जनन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं जिससे कालान्तर में इसकी पैदावार कम होती चली जायेगी और धीरे-धीरे इसे विलुप्ति की ओर ले जाएगी। पिथौरागढ़ जनपद के बड़े हिस्से में जहाँ इसका दोहन किया जा रहा है यह प्रभाव दिखने भी लगा है। कई इलाके ऐसे हैं जहाँ अब यार्त्सा गुंबू उपलब्ध नहीं है।दरअसल यार्त्सा गुंबू की उपलब्धता और पहाड़ी की ढलानों के बीच अंतर्सबंध व्युत्क्रमानुपाती है। 15 डिग्री ढलान वाले इलाकों में इसकी उपलब्धता सर्वाधिक होती है और कोण बढ़ने के साथ-साथ यह कम होती चली जाती है। यही नहीं यार्त्सा गुंबू खोदने वाले लोग भी अधिकांशतः अपने टेंट इन्हीं ढलान में लगाते हैं परिणामस्वरूप इसके उत्पादन में व्यापक नकारात्मक प्रभाव पडा है। बुग्यालों में कीड़ाजड़ी निकालने गए लोग, दूसरी औषधीय वनस्पतियों को और जलावन हेतु और प्रजातियों का दोहन करते हैं। इन सब गतिविधियों ने यार्त्सा गुंबू के लार्वा के प्राकृतिक आवास को बुरी तरह प्रभावित किया है ।बुग्यालों में लम्बे समय तक होने वाली मानवीय गतिविधियों या जानवरों के प्रवास से वहां की मिटटी की गुणवत्ता में भी बड़ी गिरावट आई है, परिणामस्वरूप उत्पादकता तेजी से गिरी हैं। यह गिरावट केवल यार्त्सा गुंबू या औषधीय और सगंध पौधों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी वनस्पतियों और सूक्ष्मजीवों के लिए आवश्यक प्राकृतिक आवासस्थल और पारिस्थितिकी में तेजी से ह्राश हुआ है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि बुग्याल सर्वाधिक संवेदनशील इलाके हैं और उनसे की जानी वाले किसी भी तरह की छेड़ा-खानी के गंभीर और दीर्घकालिक परिणाम होंगे। खास बात यह है कि न केवल चीन से लगे हुए हिस्से पर चीनी सेना की घुसपैठ कीड़ा जड़ी को लेकर हो सकती है, बल्कि नेपाल से भी भारी मात्रा में इसकी तस्करी की खबरें सामने आती रहती हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो उत्तराखंड के उच्च हिमालय में मौजूद यह बेशकीमती संपदा चीन के निशाने पर हो सकती है और उत्तराखंड के इन पहाड़ी क्षेत्रों से चीन कीड़ा जड़ी को चुराने की कोशिश कर सकता है. कीड़ा जड़ी को कई नामों से जाना जाता है, अंग्रेजी में इसे कैटरपिलर फंगस कहते हैं तो नेपाल और चीन में इसे यार्सागुंबा के नाम से जाना जाता है. यही नहीं इसे भारत में कीड़ा जड़ी के साथ-साथ हिमालयन गोल्ड और हिमालयन वियाग्रा के नाम से भी पुकारा जाता है. माना जाता है कि यूं तो 14वीं शताब्दी के बाद से ही कीड़ा जड़ी का परंपरागत रूप से तिब्बत और चीन में उपयोग होता रहा है लेकिन दुनिया भर में इसको लेकर तब चर्चाएं तेज हुई जब 1993 में चीन के कई एथलीट्स ने गोल्ड जीतकर सभी को चौंका दिया. बताया गया कि इसके बाद इनके कोच की तरफ से कीड़ा जड़ी के सेवन की बात कही गई थी. माना गया कि कीड़ा जड़ी से शरीर को बेहद ताकत मिलती है और डोप टेस्ट के दौरान यह पकड़ में भी नहीं आता. यही नहीं कीड़ा जड़ी के लिए कई बार हिंसक घटनाएं भी हुई हैं और कई हत्याओं के चलते कीड़ा जड़ी दुनियाभर में चर्चाएं बटोरती रही है. इस कीड़ा जड़ी की लंबाई 10 से 15 सेंटीमीटर तक हो सकती हैं। बिना कीड़े एवं बिना जड़ी के कीड़ा जड़ी का महत्व नही होता हैं।इस लिए इनके चुगान के दौरान ग्रामीणों को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती हैं। इस साल जोड़ों के सीजन में बारिश एवं बर्फबारी कम होने के कारण बुग्यालों में कीड़ा जड़ी कम मिल रही, चुगान से लौटे ग्रामीणों ने कहा कि इस अनुकूल मौसम के अभाव में कीड़ा जड़ी के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ रही हैं। कीड़ा जड़ी को यौन क्षमता को बढ़ाने के लिए बेहद कारगर माना जाता हैं इसके अलावा केंसर सहित अन्य कई रोगों के उपचार के लिए भी इससे रामबाण औषधियों का निर्माण किया जाता हैं।इसी लिए इसकी कीमत काफी अधिक हैं। कथित तौर पर तीन प्रमुख जिलों में पिछले वर्ष कोई रॉयल्टी एकत्र नहीं की गई थी, जहां कथित तौर पर यार्त्सा गनबू एकत्र किया गया था। संक्षेप में कहें तो कहानी वही है. इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।)

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