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उत्तराखंड में परंपरागत फसलें विलुप्ति की कगार पर हैं

28/09/24
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला। नगदी फसलों की होड़ में पहाड़ी गांव से पोषक तत्वों का खजाना कही जाने वाली परंपरागत फसलें चीणा और कौणी विलुप्ति की कगार पर हैं। परंपरागत फसलों के उत्पादन के प्रति किसानों के कम रुझान और बदलते परिवेश की वजह से यह फसलें खेतों से गायब है। स्थिति यह है कि इन फसलों के बीज भी अब कहीं नहीं मिल पा रहे हैं। स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद कही जाने वाली चीणा और कौणी की फसल को उगाने के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए इस फसल का उत्पादन उखड़ भूमि पर किया जाता है। मई जून में बोई जाने वाली यह फसल अगस्त सितंबर में पक कर तैयार हो जाती है। पहाड़ की पारंपरिक फसल चीणा अब खेतों से गायब हो गई है। चीणा में पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में होती हैं। चीणा का वानस्पतिक नाम पेनिकम मैलेशियम है। इसका पौधा एक से दो मीटर तक ऊंचा होता है।एक समय था जब हर गांव का हर परिवार चीणा उगाता था, लेकिन आज दूरस्थ के गांव में ही कहीं भी चीणा नजर नहीं आती। यह मोटे अनाजों में प्रमुख फसल मानी जा सकती है। यह सबसे कम तीन माह में तैयार होने वाली फसल है। इसको बोने के बाद सीधे पकने पर काटते है। खास बात यह है कि इसे उगाने में कम मेहनत की जरूरत होती है यहां तक कि इसे निराई गुड़ाई की जरूरत भी नही पड़ती है। किसान पहले इसी फसल को उपयोग में लाते थे और आज उन्होंने इसे उगाना ही छोड़ दिया है। आज वैज्ञानिक भी मोटे अनाजों को उगाने की बात कर रहे हैं उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन के खतरों को झेलने और खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से चीणा जैसे मोटे अनाज उगाने जरूरी हो गए हैं।

काश्तकार दयाल सिंह, सुन्दर सिंह आदि का कहना है कि पहले लोग विविधतापूर्ण फसलें उगाते थे, इससे उनकी हर तरह की जरूरतें पूरी होती थी,लेकिन जब से नई खेती चलन में आई चीणा को लोग भूल गए। नई पीढ़ी के लोगों ने चीणा को देखा तक नही है। जनपद के प्रतापनगर, जौनपुर, मलेथा आदि जगहों पर चीणा को सबसे अधिक उगाया जाता रहा है, लेकिन अब नई पीढ़ी के के बच्चे चीणा को पसंद नहीं करते इसलिए लोगों ने इसकी फसल उगानी भी बंद कर दी। यही वजह है कि बिरले लोग ही चीणा का उत्पादन कर रहे है।चीणा में पाए जाने वाले पोषक तत्वइसमें प्रोटीन 4.6 प्रतिशत, बसा 1.1 प्रतिशत, कार्बोहाइट्रेट 68.9 प्रतिशत, रेशा 2.2 प्रतिशत और भस्म 3.4 प्रतिशत होती है। खसरा रोग में भी इसका उपयोग किया जाता रहा है। इसको रोटियों के अलावा चावल की तरह भी प्रयोग में लाया जाता है। पहले विविधता पूर्ण फसलें उगाते थे लेकिन अब खेती में मोनोकल्चर आ गया है। इसलिए चीणा जैसी फसल नही उगाई जा रही है इसकी जगह लोगों ने नगदी फसलों को बढ़ावा दिया है। हालांकि यह अनाज खाद्य सुरक्षा व पोषण की दृष्टि से बहुत उपयोगी है। हमारे देश में अनाजों की विविधता की संस्कृति रही है। चावल, गेहूं के अतिरिक्त ज्वार, बाजरा, कोदरा (रागी), चीणा, स्वांक ( झंगोरा) आदि कई अनाज उगाये जाते थे और उनके पोषक तत्वों के ज्ञान के आधार पर उनका मौसम या तासीर के हिसाब से भोजन में उपयोग किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से हरित क्रांति के दौर में न जाने कहां से यह भ्रमपूर्ण विचार फैल गया कि गेहूं-चावल ही उत्कृष्ट अन्न हैं और बाकी को मोटा अनाज कहकर हीन दृष्टि से देखा जाने लगा। कुछ लोग तो अज्ञानवश यह सोचने लग पड़े कि मोटा अन्न गरीबों का भोजन हैं। अत: इन अनाजों की न केवल अनदेखी हुई बल्कि इन्हें हिकारत की दृष्टि से देखा जाने लगा। किन्तु एक जानकार वर्ग इनके संरक्षण और गुणवत्ता के ज्ञान का रक्षक बना रहा और आज फिर से इन अनाजों के प्रति चेतना फैलना शुरू हुई है। इन अनाजों को रासायनिक खादों और दवाइयों की भी जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इनमें कीड़ा नहीं लगता और ये कम उपजाऊ जमीन में भी बढ़िया पैदावार देते हैं। यह पौष्टिक भोजन और और चारा भी देते हैं। यदि इनके मुकाबले में गेहूं और चावल के पोषक तत्वों को देखें तो इनमें 4-5 गुणा ज्यादा पौष्टिक पाए जाते हैं। प्रति सौ ग्राम कोदरा-रागी में धातु: कोदरा- 2.7 ग्राम, कंगनी- 3.3 ग्राम, स्वांक-झंगोरा- 4.4 ग्राम, चावल- 0.7 ग्राम, गेहूं- 1.5 ग्राम। आयरन: कोदरा- 3.9 मिली ग्राम, कंगनी- 2.8 मिली ग्राम, झंगोरा- 15.2 मिली ग्राम, गेहूं- 5.3 मिली ग्राम, चावल- 0.7 मिली ग्राम, कैल्शियम: कोदरा और रागी-344 मिली ग्राम, कंगनी- 31 मिली ग्राम, झंगोरा-11 मिली ग्राम, गेहूं-10 मिली ग्राम, चावल- 41 मिली ग्राम, रामदाना-159 मिली ग्राम, फाइबर: कोदरा- 3.6 ग्राम, कंगनी- 8 ग्राम, स्वांक और झंगोरा-10.1 ग्राम, गेहूं- 1.2 ग्राम, चावल- 0.2 ग्राम, जौ- 15.6 ग्राम। इससे साफ है कि जरूरी पौष्टिक तत्वों के मामले में इन अनाजों की अनदेखी करके हम अपने ही स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।हमें इन पौष्टिक तत्वों की कमी होने की सूरत में बनावटी दवाइयों के रूप में इन पौष्टिक तत्वों को डॉक्टर के कहने पर खाना पड़ता है। गेहूं और चावल की खेती में तो रासायनिक दवाइयों की भरमार हो रही है। ये मोटे अनाज तो बिना दवाइयों और रासायनिक खादों के ही हो जाते हैं। रासायनिक जहर मानव शरीर के लिए खतरनाक है। रासायनिक खेती की वजह से पंजाब की बठिंडा पट्टी तो कैंसर पट्टी के नाम से मशहूर हो गई है। इस क्षेत्र में हर घर में कोई न कोई कैंसर रोग से पीड़ित मिल जाएगा। खेती विरासत मिशन जैसी संस्थाएं इन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक तरीके से करने का प्रचार कर रही हैं। उन्हें समाज से भी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। हम जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर चुके हैं।गर्मी बढ़ने के साथ-साथ इसमें वर्षा भी अनिश्चित हो जाएगी। इसका सामना करना भी पड़ रहा है। यह क्रम बढ़ता जाएगा। इससे खेती के लिए पानी का संकट भी बढ़ता जाएगा, क्योंकि बारिशों के दिन कम हो जाएंगे और बौछार बढ़ जाएगी। भारत में पहले ही 80 प्रतिशत बारिश मनसून के तीन महीनों में ही हो जाती है। शेष वर्ष पानी की कमी बनी रहती है। इसके चलते अन्तर्राज्यीय टकराव और अंतर व्यावसायिक टकराव भी बढ़ते जाएंगे। उद्योगों और घरेलू प्रयोग के लिए भी पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। खेती में हम जिन फसलों को अपना रहे हैं वे सब ज्यादा पानी की मांग करती हैं। जबकि ये पौष्टिक मोटे अनाज थोड़े पानी में भी अच्छी फसल दे जाते हैं। गन्ने को इन पौष्टिक अनाजों के मुकाबले पांच गुणा, और धान को तीन गुणा पानी चाहिए। जैसे वर्ष में कुछ महीने ही हमारे देश में पानी की बहुतायत होती है, वैसे ही क्षेत्रवार भी हमें काफी असमानता झेलनी पड़ती है।सतही जल के 71 प्रतिशत जल संसाधन 36 प्रतिशत क्षेत्र को ही उपलब्ध हैं और 64 प्रतिशत क्षेत्र 29 प्रतिशत साधनों पर निर्भर है। देश में 56.7 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। इसलिए बहुत तेज गति से भूजल दोहन बढ़ा है। भारतवर्ष दुनिया का सबसे बड़ा भू-जल उपयोगकर्ता बन गया है। 75.80 प्रतिशत सिंचाई भूजल से हो रही है। इससे भूजल स्तर भी तेजी से घट रहा है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में भूजल स्तर 2002-2008 के आकलन के मुताबिक प्रतिवर्ष 33 सेंटीमीटर की दर से घट रहा है। अबतक यह दर और भी बढ़ चुकी होगी। इसी कारण देश के 33 प्रतिशत जिले भूजल की दृष्टि से असुरक्षित घोषित है चुके हैं। दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी हमारे देश में बसती है और सतही जल के 4 प्रतिशत संसाधन ही हमारे पास हैं। प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष जल उपलब्धता 1170 घन मीटर ही है जबकि 1700 घन मीटर से कम जल उपलब्धता जल संकट माना जाता है। इस वस्तुस्थिति को देखते हुए कृषि जैसी जीवनोपयोगी गतिविधि को टिकाऊ बनाकर रखने की चुनौती देश के सामने है, और पौष्टिक भोजन उपलब्ध करवाने की महती जिम्मेदारी भी। अत: सब तरह से पौष्टिक अन्न उगाना जिनकी मोटे अनाज कह कर अनदेखी की गई, समय की मांग है। पौष्टिक अन्न और जहर मुक्त वैज्ञानिक खेती इस समय का घोष वाक्य होना चाहिए। नई पीढी शहरी जनजीवन मे ढल रही है और खेत बंजर होते जा रहे है इससे प्रदेश मे न केवल खेती सिमट रही है. बल्कि इससे यहां की खास पहचान रही बारह नाजा यानि 12 प्रकार के अनाजों की पारंपरिक फसलों पर भी संकट गहरा रहा है. पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरा के रूप मे खेती होती थी जिसमे 12 प्रकार के ऐसे अनाज जिन्हें भारत ही नहीं बल्कि बाहरी देश पोषक तत्वों के लिए बहुतायत मात्रा मे आयात करता है, ये अनाज अब खत्म होने की कगार पर है. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों मे इन फसलों को उगाने वाले ग्रामीण इन फसलों के महत्व को भलीभातिं जानते हैं लेकिन नयी पीढ़ी के इन अनाजों का उपयोग न करने से अब ग्रामीण परिवेश में रह रहे लोग इनका उपभोग नहीं करते है.(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।)

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