डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में तेजी से हो रहे पलायन के बावजूद ग्राम पंचायतों में मतदाताओं की संख्या में हुई वृद्धि राहत देने वाली खबर है. राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा आगामी पंचायत चुनावों को ध्यान में रखते हुए मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराया गया, जिससे 12 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 47,32,387 हो गई है. यह संख्या 2019 की तुलना में 4,17,727 अधिक है, जब 43,14,660 मतदाता पंजीकृत थे.राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में छूटे हुए नामों को जोड़ने और त्रुटियों को सुधारने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इसके पूरा होने पर मतदाताओं की संख्या में और वृद्धि होने की संभावना है. हरिद्वार जिले में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव उत्तराखंड के अन्य जिलों के साथ नहीं होते. यह चुनाव उत्तर प्रदेश के साथ होते आए हैं और वहां 2022 में पंचायत चुनाव संपन्न हुए थे. शेष जिलों में पंचायतों का कार्यकाल दिसंबर 2024 में समाप्त हो गया था, जिसके बाद प्रशासकों की नियुक्ति कर दी गई थी. दिलचस्प बात यह है कि इस बार मतदाताओं की संख्या के साथ ग्राम पंचायतों की संख्या भी बढ़ी है. 2019 में जहां 7485 ग्राम पंचायतें थीं, वहीं अब यह बढ़कर 7499 हो गई हैं. सबसे ज्यादा वृद्धि उन जिलों में देखी गई है, जहां पलायन अधिक हुआ है, जैसे कि पौड़ी और अल्मोड़ा. इसके अलावा, देहरादून, नैनीताल, उत्तरकाशी और ऊधम सिंह नगर में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यहां 10.45 प्रतिशत से लेकर 18.07 प्रतिशत तक मतदाता बढ़े हैं. वहीं, अन्य 8 जिलों में यह वृद्धि 5.19 प्रतिशत से 9.68 प्रतिशत के बीच रही. राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देहरादून, नैनीताल, उत्तरकाशी व ऊधम सिंह नगर जिलों में 10.45 से 18.07 प्रतिशत तक के बीच मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। अन्य आठ जिलों में 5.19 प्रतिशत से लेकर 9.68 प्रतिशत तक मतदाता बढ़े हैं। रोजगार के लिए पढ़ा-लिखा अधिकांश वर्ग गाँव से बाहर रहकर प्राइवेट नौकरी कर रहे है ये युवा या तो उत्तराखंड के शहरी क्षेत्र या उत्तराखंड के बाहर जहां काम मिल जाये काम की तलाश में निकल जाते है और कभी साल-छह महीने में गाँव पहुच पाते हैं। ऐसे करके अगर देखा जाए तो उत्तराखंड के गांवो से पचास से साठ फीसदी लोग बेहतर भविष्य की तलाश में पलायन कर चुके हैं।”।देवभूमि उत्तराखंड में दिख रहे जनसांख्यिकीय बदलाव और इसके चलते हो रहा पलायन कुछ वर्षों से बुद्धिजीवियों के बीच विमर्श का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही सरकार इस मामले में जल्द ही कुछ बड़ा निर्णय ले सकती है. यह किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र पलायन की मार से जूझ रहा है. इस परिदृश्य के बीच बड़े पैमाने पर बाहर से आए व्यक्तियों, विशेषकर एक समुदाय विशेष के व्यक्तियों ने पिछले 10-11 वर्षों में यहां न सिर्फ ताबड़तोड़ जमीनें खरीदीं, बल्कि उनकी बसावट भी तेज हुई है.इस सबको देखते हुए पिछले वर्ष से उत्तराखंड में लैंड जिहाद शब्द लगातार चर्चा में है. इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर तो इसे लेकर बहस का क्रम जारी है तो अब आमजन के बीच भी यह चिंता का विषय बनकर उभरा है. क्योंकि हाल ही में विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के प्रतिबंधित क्षेत्र में कथिर मजारें बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं. ये वो क्षेत्र हैं जहां बिना अनुमति लोगों के जाने पर भी मनाही है. ऐसे में इन क्षेत्रों में कथित मजारें बनाने से जनसांख्यिकीय बदलाव की खबरों कुछ हद तक पुख्ता भी हो रही हैं. जनसांख्यिकीय बदलाव कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं है. उत्तराखंड में इस परिवर्तन की नींव अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान पड़ गई थी. नैनीताल में पहाड़ के अलावा मैदानी इलाकों में समुदाय विशेष के लोगों ने जमीनें खरीदी हैं. उत्तर प्रदेश के बरेली, रामपुर, पीलीभीत और मुरादाबाद के लोगों ने यहां आकर घर बना लिए हैं. हल्द्वानी के गौलापार, लामाचौड़, रामनगर और कालाढूंगी क्षेत्र में विशेष समुदाय ने जमीनें खरीदीं हैं. वन क्षेत्र बागजाला में पहले जहां दो मकान थे. अब बड़ी बस्ती विशेष समुदाय की स्थापित हो गई है. रहमपुर, बरेली, मुरादाबाद, पीलीभीत से विशेष समुदाय के लोग आकर किराए के कमरे में रह रहे हैं और वहीं कुछ लोगों ने अपने मकान बना लिये हैं. उत्तराखंड राज्य गठन के बाद इस दिशा में तेजी आई है. लेकिन सरकारें जाने-अनजाने इसकी अनदेखी करती रहीं. प्रदेश में यह परिवर्तन दो तरह का है. देहरादून, हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर जैसे जिलों में बाहरी प्रदेशों से लोग विभिन्न कारणों से आ बसे हैं. यह प्रक्रिया सामान्य है, लेकिन एक समुदाय विशेष के लोग इन जिलों के क्षेत्र विशेष में जमीन खरीद कर या अतिक्रमण कर भी बड़ी संख्या में बसे हैं. इस कारण वहां पहले से बसे लोगों ने अपनी भूमि औने-पौने दामों पर बेच कर अन्यत्र बसना उचित समझा. अब इन जिलों के कुछ क्षेत्रों में मिश्रित जनसंख्या के बजाय समुदाय विशेष की किलेबंदी जैसी दिखने लगी है. इतना ही नहीं पहाड़ के उन खाली गांव में भी कुछ अनजान लोग अपना डेरा डाले हुए हैं, जो कभी आसपास भी देखे नहीं गए थे. इस बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने इस बात के लिए हामी भरी थी कि राज्य में जल्द ही वह इस पर कोई ठोस निर्णय ले सकते हैं. हालांकि 2011 के बाद 2021 में राज्य में जनगणना होनी थी. जो कोरोना और अन्य दूसरों कारणों के चलते नहीं हो पायी है.उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रही आबादीएक आंकड़े के मुताबिक असम के बाद उत्तराखंड में सबसे तेजी से मुस्लिम आबादी में इजाफा हुआ है. सबसे अधिक इजाफा अगर किसी जिले में हुआ है तो वह हरिद्वार है. एक अनुमान के मुताबिक हरिद्वार जिले में मुस्लिमों की संख्या लगभग 20 लाख के करीब पहुंच गई है. बताया जा रहा है कि बीते सालों में 40% विशेष समुदाय की संख्या बढ़ी है. एक आंकड़े के मुताबिक उत्तराखंड राज्य में कुल आबादी के हिसाब से अगर देखा जाए तो 13.9% विशेष समुदाय की आबादी है. जबकि साल 2001 में यह आबादी कुल जनसंख्या के 11.9% थी. उत्तराखंड सरकार ने मैदानी व पहाड़ी जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तन को लेकर जिला प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं. असुविधाओं के पहाड़ से जिस तेजी से यहां के लोग शहरी क्षेत्रों के लिए पलायन कर रहे हैं, उसी अनुपात में बाहर के लोग सीमांत के हर कस्बे तक पहुंचने लगे हैं. इनमें मजदूर से लेकर व्यापारी तक शामिल हैं. खुफिया एजेंसियां भी मानती हैं कि पिछले कुछ सालों में कारीगर, नाई, सब्जी, फेरी व्यवसाय सहित अन्य छोटे-मोटे व्यापार में बाहर से आए लोगों की भीड़ बढ़ी है. जिला व पुलिस प्रशासन को जिला स्तरीय समितियों के गठन, अन्य राज्यों से आकर बसे व्यक्तियों के सत्यापन और धोखा देकर रह रहे विदेशियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं.सरकार के इस कदम का एक और ठोस आधार देश की सीमाओं की सुरक्षा भी है. नेपाल एवं चीन की सीमा से लगने वाले इस राज्य की सीमाओं में मूल निवासियों के पलायन को रोकना जितना जरूरी है, उतना ही तर्कसंगत बाहर से आकर बसने वालों की स्क्रीनिंग करना भी है. इस राज्य के सीमांत जिलों के हर गांव-परिवार के स्वजन सीमाओं पर सैनिक के रूप में तैनात हैं. जो गांवों में हैं वे बिना वर्दी के समर्पित सैनिक हैं. इनकी भूमिका को सेना द्वारा सराहा जाता रहा है. इन क्षेत्रों में सुनियोजित बाहरी बसावट की ओर यूं ही आंख मूंद कर नहीं बैठा जा सकता है. *लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*