सत्यपाल नेगी/रुद्रप्रयाग
कवि की कर्मस्थली को 73 साल बाद मिला कुछ सम्मान….. हिंदी साहित्य के चितेरे हिमवंत कवि स्व चन्द्र कुँवर बर्त्वाल ने भले ही अपनी रचनाओं व कविताओं की छाप छोटी से उम्र में हिंदुस्तान में छोड़ गये हों, मगर उनकी कर्मस्थली पंवालिया पिछले 73 सालों से सरकारों की उपेक्षा का दंश झेल रही है।

आपको बता दे कि जनपद रुद्रप्रयाग के मालकोटी गाँव में जन्मे हिमवंत कवि स्व चन्द्र कुँवर बर्त्वाल ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद मन्दाकिनी के पंवालिया तोक भीरी को अपनी लेखनी की कर्मभूमि बना दिया था।
कवि बर्त्वाल की मुत्यु के बाद से उनकी कर्मस्थली पंवालिया धीरे.धीरे सरकारों व जन सरोकारों की यादों से दूर होती रही, बेशक कुछ समाजसेवियों द्वारा अपने कम संसाधनों के बल पर यहॉ समय समय पर कवि को जरूर याद किया जाता रहा है।

मगर महान चितेरे कवि बर्त्वाल जी को जो सम्मान मिलना चाहिए था, आज भी उनकी 102वीं जन्मतिथि एवं 73 वीं पुण्य तिथि पर नहीं मिल सका। उनके खण्डहर पड़े मकान को लेकर बार.बार कवि के चाहने वालों ने सरकारों/जनप्रतिनिधियों को यहॉ पर म्यूजियम बनाने की यादें दिलाई, लेकिन किसी ने भी आश्वासन के सिवा कुछ नहीं किया।
दशकों बाद केदारनाथ के विधायक मनोज रावत ने पिछले वर्ष पंवालिया में हुए कार्यक्रम में आश्वासन दिया था कि वे यहाँ पर एक सुन्दर हाल कवि की याद में और समाजसेवियों द्वारा किये जाने वाले कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए करेंगे। इस साल विधायक केदारनाथ मनोज रावत ने हिमवंत कवि की कर्मस्थली पंवालिया में एक सुन्दर कोटेड टीन शेड बनाकर कवि को याद करने की शुरुआत कर दी।

वही सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र कंडारी एवं चंद्रकुंवर बर्त्वाल सांस्कृतिक समिति के सदस्यों का कहना है कि आने वाले सालों में यहॉ पर कवि के खण्डर घर को पहाड़ी शैली में निर्मित करके भव्य म्यूजियम बनाया जाये, जिसके लिए समिति लगातार आवाज उठा रही है।
वर्तमान मे हिमवंत कवि स्वण्चन्द्र कुँवर बर्त्वाल जी कर्मस्थली पंवालिया कृषि विभाग के पास है मगर 50 नाली से अधिक भूमि मात्र सौ पीस बन गई हैएजरूरत है कि इस भूमि को आधुनिक शैली मे उपयोग किया जाये।
विधायक मनोज रावत कहते है कि हमने पूरा डेटा तैयार किया है कैसे इस स्थान को फिर से कवि की यादो को ताजा रखने के लिए स्तेमाल हो सकेएओर सरकार को भी इस सम्बन्ध मे अवगत करा दिया हैएसब कुछ ठीक रहा तो आने वाले समय मे पंवालिया मे कवि के खण्डर पड़े घर को भव्य पहाड़ी आकृति के साथ उनकी रचनाओं, कविताओं के लेखों को यहॉ एक म्यूजियम बनाकर आने वाली पीढ़ी के मार्ग दर्शन के लिए तैयार किया जायेगा।











