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समकालीन यथार्थ की गहन पड़ताल करतीं कविताएं…..

19/01/23
in उत्तराखंड, पिथौरागढ़
Reading Time: 5min read
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 ‘अब पहुंची हो तुम ‘ महेश चंद्र पुनेठा  का 55 कविताओं का संग्रह है जो समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून से प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘भय अतल में’; ‘पंछी बनती मुक्ति की चाह’ और ‘समकाल की आवाज’। ‘अब पहुंची हो तुम’; पीड़ा, यातना, स्वीकृति,मोहभंग, आशा-निराशा, विश्वास तथा अविश्वास के स्वर से उपजी अंतर्मन की भावनाओं, चिंताओं एवं व्यग्रताओं की यथार्थ अभिव्यक्ति  है , जो हमारे समक्ष एक विशाल फलक को लेकर उपस्थित हुई है । भूख, गरीबी, लाचारी, बेरोजगारी,  विकास, विनाश, किसानों के दर्द की अभिव्यक्ति, बाजारवाद, प्राकृतिक एवं राजनीतिक सत्ता के बीच का द्वंद्व,  नारी जीवन की विवशताएं इत्यादि कविताओं के मुख्य विषय हैं ।
        संग्रह की प्रथम कविता ‘अमर कहानी’ सत्य के महत्व को प्रदर्शित करते हुए ,एक बालक के कहन को आधार बनाकर सम्पूर्ण मानव-जाति को उनके  दायित्व एवं कर्तव्यों का भान कराती है । सत्य कड़वी दवा की भांति होता है जो पूरे मुंह का स्वाद बिगाड़ देता है लेकिन अंदर के रोग को नष्ट कर पुनः ऊर्जावान बनाकर जीने की ललक पैदा करता है –
“न उस राजा के कारण
न पारदर्शी पोशाक के कारण
 न उस पोशाक के दर्जी के कारण
 न चापलूस मंत्रियों के कारण
 न डरपोक दरबारियों के कारण
कहानी अमर हुई बस
उस बच्चे के कारण
जिसने कहा राजा नंगा है।”(पृ.9)
           सत्य  हमेशा से ही कड़वा रहा  है, इसकी राह कठिन होती है। लेकिन सत्य अपनी ताकत से जीवन-जगत की विसंगतियों को यथार्थ के साथ चित्रित भी करता है जिस पर यह कविता पूर्णतः सफल हुई है।
        जीवन सुख और दुःख का संयोजन है, लेकिन दुःख हमेशा सुख पर ही भारी पड़ता है। जीवन-सागर पर उसका फैलाव अनंत है जिसकी अभिव्यक्ति कवि ने बहुत ही सहजता से की है-
“वह दुख लिखने लगी
लिखती रही
लिखती रही
लिखती ही रह गयी।”(पृ.10)
      ‘नचिकेता’ शीर्षक कविता में कवि ने मिथक के माध्यम से पुराकालीन जीवनशैली और भविष्य की ओर तकती उस आशा को देखने का प्रयास किया है जिसमें चुपचाप रहना ही एकमात्र विकल्प नहीं होता अगर परिवर्तन की चाह है तो प्रतिरोध करना बहुत जरुरी है और प्रतिरोध के लिए आवश्यक है प्रश्नों का होना। प्रश्नों के महत्व को रेखांकित करतीं ये पंक्तियां  मनुष्य के जीवन-दर्शन की ओर भी संकेत करती हैं –
“नचिकेता !
तुमने चाहे
प्रश्नों के उत्तर
इसलिए तुम
 हजारों साल बाद भी
जिंदा हो
जब तक प्रश्न रहेंगे
तब तक तुम भी रहोगे।”(पृ.11)
          पलायन के दर्द को बयां करती ‘गांव में सड़क’ कविता बहुत महत्वपूर्ण है । गांव में बुनियादी ढांचे  का न होना पलायन का मुख्य कारण है और उस पीड़ा को कवि ने बड़े ही सामान्य एवं अत्यंत प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्ति दी है-
” सड़क!
 अब पहुंची हो तुम गांव
जब पूरा गांव शहर जा चुका है
 सड़क मुस्कुराई
सचमुच कितने भोले हो भाई
पत्थर-लकड़ी और खड़िया तो बची है न!
        ‘जेरूसलम’ कविता एक गहरी भाव भूमि को लेकर हमारे समक्ष उपस्थित होती है और उसकी अंतिम पंक्तियों में वह गहन भाव स्पष्टत: दृष्टिगोचर होता है जिसमें वह अपनी सार्थकता खो चुके एक प्राचीन शहर के  यथार्थ को उद्घाटित करती हुई उसे उलाहना देती है-
” हे!दुनिया के प्राचीन शहर
क्या कभी तुम्हें लगता है
 कि पवित्र भूमि की जगह तुम
काश! एक निर्जन भूमि होते।”(पृ.14)
     स्त्री-जीवन विसंगतियों का अपार भंडार होता है । उनके सुख-दुख व यादों की कोई लिखित डायरी नहीं होती;या फिर उनके पास अपनी यादों को संजो पाने का अवकाश ही नहीं होता! बस उनका अंतर्मन ही होता है जिसमें वह इस अपार को समाए रहती हैं –
“याद नहीं कि देखी हों कभी
मां की पुरानी चिट्ठियां
 या पुरानी डायरियां
 मान लिया मां बहुत कम पढ़ी-लिखी थी
पर पत्नी की भी तो नहीं देखीं
जबकि बात-बात पर
वे अपनी स्मृतियों में जाती रहती हैं
और अक्सर नम आंखों से लौटती हैं
 कभी उन की छंटनी भी नहीं करती हैं”( पृ.16)
       पहाड़ी स्त्रियों का जीवन भी पहाड़ की ही भांति दुर्दांत होता है ।उनके पास उनके हिस्से की बेचैनी भी नहीं होती ; समय ही नहीं होता उनके पास बेचैन होने को भी! इस ओर भी कवि की दृष्टि गई है जिसे उन्होंने ‘उड़भाड़’ कविता में बड़ी संजीदगी से अभिव्यक्त किया है –
” एक औरत के लिए और भी बुरा होता है उड़भाड़
पुरुष हो तो
पूरी कर ले रात की बची नींद
 औरत के लिए तो यह भी संभव नहीं
 एक और डर कि
 देर तक सोती रह गयी कहीं
तो परिवार में पूरे दिन उड़भाड़ न हो जाय।” (पृ. 17)
         ‘जो दवाएं भी बटुवे के अनुसार खरीदती थी’ कविता स्त्री-जीवन का वह अनकहा-अनछुआ वृतांत है जिसके मर्म को समझकर कवि ने पहाड़ी स्त्रियों की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी का और उनसे उपजी व्यवस्थाओं के यथार्थ को उद्घाटित किया है।अपने जीवन में कई बार मरती स्त्रियों का वृतांत है यह कविता –
“उसकी परेशानियों को
 सुनने के बाद
डॉक्टर आधे दर्जन से अधिक
जांचों के लिए लिख देता है
वह गिड़गिड़ाती है
कुछ जांचें तो कम करवा दो साहब
डॉक्टर पर्ची वापस लेकर
कुछ पेनकिलर लिख
 घर जाने को कहता है
 वह राहत की एक लंबी सांस लेती है।”(पृ.18)
         पहाड़ की दिनचर्या इतनी व्यस्त होती है कि स्त्री को अपनी बीमारी जीने का अवकाश भी नहीं मिल पाता। उसकी जिम्मेदारियों का बोझ इतना बड़ा होता है जिसके सामने वह केवल अपने सुख-दुख को ही अनदेखा नहीं करती अपितु अपने स्वास्थ्य की गंभीरता को भी उपेक्षित कर देती है –
“बच्चेदानी में बहुत अधिक इंफेक्शन है जल्द से जल्द ऑपरेशन कराना ही होगा
 वह सोच ही रही थी-
 क्या करे ?
घर से संदेश आ गया
 कि गाय ब्या गई है उसकी
लेकिन
उठन नहीं पाई है अभी तक ….”(पृ.19)
          उसकी जिम्मेदारियां भुला देती हैं दर्द को, नासुर होती बीमारी को; जो जानलेवा भी हो सकती है। वह अकेले ही ठेलते रहती है पीड़ा को अपनी पीठ पर आजीवन ; कई प्रकार की पीड़ाओं को ठेलती वह अपने जीवन में कई बार मरती है-
 “अब की बार हालत
इतनी बिगड़ गई उसकी
कि भर्ती कराना पड़ा अस्पताल में
आज पहली बार
उसका पति भी उसके साथ था
नहीं लौट पायी वह
अबकी बार पेन किलर लेकर
पति को उसकी लाश लेकर लौटना पड़ा।
आज अचानक नहीं मरी
हां आज अंतिम बार मरी
उसको जानने वाले कहते हैं
मरी क्या बेचारी तर गई ।”(पृ.20)
           संग्रह में संकलित कविताओं की भाव-भूमि विभिन्न संदर्भों से आच्छादित है लेकिन संवेदनशीलता कवि-कर्म की मुख्य विशेषता है । कहीं कहीं तो उनकी कविताओं की अंतिम पंक्तियां जिस तरीके से विराम लेती हैं ; एक अप्रतिम भाव-भूमि का विस्तार देकर अंतर्मन को उद्वेलित कर देती हैं।
          परिवेश में व्याप्त स्वार्थान्धता, कमीशनखोरी, योजनाओं के स्वीकृत होने के सत्य को कवि ने संकेतों के माध्यम से बड़ी ही सरलतापूर्वक उजागर किया है-
“मीलों दूर से
पानी सारते-सारते
थक गये कंधे…..
नहीं मिली एक पेयजल योजना
मगर
बिन मांगे मिल गया
लाखों के बजट का
एक भव्य मंदिर….”(पृ.25) ‌
        ‘ग्रेफीटी’ शीर्षक कविता जहां एक परीक्षा ड्यूटी देते हुए अध्यापक द्वारा कक्षाओं की बेंच पर, दीवारों पर खुदी कलात्मक इबारतों को पढ़ते हुए बच्चों के मनोविज्ञान को पकड़ने-समझने की कोशिश और अनेक सवालों का जन्म  है-
” अनेक सवाल उठ रहे थे
क्या दुनिया के उन समाजों में भी
इसी तरह भरे होते होंगे
मेजें और दीवारें
जहां प्रेम और आक्रोश की
सहज होती होगी अभिव्यक्ति
जहां बच्चों को
जबरदस्ती न बैठना पड़ता होगा
बंद कक्षाओं में
या कुछ और है इसका मनोविज्ञान?”(पृ.29) वहीं ‘परीक्षा कक्ष के बाहर पड़े मोजे-जूते’ कविता स्कूल/काॅलेजों में वाहनों के शोरगुल से पड़ते व्यवधान और सर्दियों में होने वाली परीक्षाओं पर एक व्यंग्य भी है; जिसमें कवि ने अपनी आत्मपरक दृष्टि से परीक्षार्थियों की व्यथा को समझते हुए व्यवस्था की संवेदनहीनता पर सटीक एवं जरूरी प्रश्न दागा है –
“बार-बार टूट रही तुम्हारी तन्मयता
हमें महसूस हो रही है
ठंड कैसे तुम्हारे पैरों के पोरों से
पहुंच रही है हाथों की
अंगुलियों तक
लगता है जैसे बर्फीली हवाएं भी
ले रही हैं तुम्हारी परीक्षा
पता नहीं तुम पर गढ़ी दो-दो जोड़ी आंखें
ये सब देख पा रही हैं या नहीं.
या फिर देखकर भी अनदेखा कर रही हैं
किसी मजबूरी में………………..
क्या यह ठंड
या परिसर में गूंजती आवाजें नहीं प्रभावित करती हैं
किसी परीक्षा परिणाम को…..।”(पृ.53-54
          ‘मेरी रसोई-मेरा देश’ शीर्षक कविता एक विस्तृत फलक को हमारे समक्ष रखती है; जिसमें जीवन-जगत के कई-कई रंग हैं। इस कविता को संग्रह की प्रतिनिधि एवं जरूरी कविता कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। रसोई एवं उसमें निहित सामग्रियों का सहारा लेकर कवि ने परिवार से लेकर राष्ट्र तक की असंगतियों को जिस प्रकार से उजागर किया है वह अद्भुत है। ये कविता प्रतीकों के माध्यम से जहां एक ओर सामाजिक विसंगति के कई संदर्भों को उकेरती है वहीं समरसता व सहिष्णुता के भावों का भी प्रतिपादन करती है-
“कितने सारे रूप
कितने सारे रंग
कितनी सारी गंध
कितने सारे स्वाद
कितनी सारी ध्वनियां
बसी हैं रसोई में
क्या कभी कोई
खड़े दिखे
एक दूसरे के खिलाफ?
मिलकर ही बनाया सबने
रसोई को खुशहाल।”(पृ.33)
       घर-परिवार हो या फिर सामाजिक संगठन, सत्ता पक्ष की बात हो या विपक्ष की   या फिर  टी.वी.चैनलों में डिवेड से जुड़ी बातें ; सब अपना- अपना राग अलापते हैं। तवा, कढ़ाही, रसोई,रोटी-सब्जी जैसे उपमानों का सहारा लेकर कवि ने गहन व्यंजना के साथ परिवेशगत यथार्थ को उद्घाटित किया है –
“तवा कहे-देखो कढ़ाही कितनी काली है
 कढ़ाही भी वही दोहराए
 देखो तवा कितना काला है
तवा और कढ़ाही की लड़ाई में
 पूरी रसोई शर्माए
रोटी-सब्जी के कुछ समझ ना आये।”(पृ.43)
        किसान आंदोलन के दौरान सत्ता पक्ष का उपेक्षित एवं उदासीन रवैया और किसान की दुर्दशा व व्यथा का जीवंत चित्रण कवि ने ‘त्रासद’ कविता में बड़ी बेबाकी  के साथ किया है-
” अक्सर खेतों में
घाम में पसीना बहाता….
दिन-रात खटकर
खेती करता देखा जिसको।
आज राजपथ में
वाटर कैनन से जूझते
लाठियां खाते
आंसू गैस झेलते
खेती बचाने को लड़ते देखा उसको
खुद ही खटना
खुद ही लड़ना
क्या नहीं यह त्रासद घटना?”(पृ.64)
            ‘ठिठकी स्मृतियां’ ग्रामीण जीवन की स्मृतियों को ताजा करती बेहतरीन कविता है –
“बचपन की स्मृतियां ठिठक रही हैं
 ठिठकी स्मृतियां ढूंढ रही हैं उन किनारों को
 जहां संगी साथियों के साथ
 गाय-बछियों को चराया करते थे
जहां मई-जून के तपते दिनों में भी झलुआ-काली-सेती
 ढूंढ लेती थी हरे घास के तिनके
गाज्यौ-पराल-नलों के अभाव में भी
 पल जाते थे गोठभर जानवर….।”(पृ.66)
         ‘आपसी मामला’ कविता में कवि ने आधुनिकता का जामा पहने संकुचित लोगों की उस संकुचित विचारधारा और असंवेदनशीलता की ओर संकेत किया है जिसमें सड़क पर गुंडों-लफंगों द्वारा परेशान की जाती लड़कियों को उनका निजी मामला है कहकर अनदेखा कर आगे की ओर बढ़ जाते हैं लोग-
” भला हम क्या कर सकते हैं
ये वही लोग हैं जो
सड़क पर किसी लड़की को
 गुंडों द्वारा छेड़ते हुए देख
अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं”(पृ.50)
        ‘कुएं के भीतर कुएं’ कविता हमारे परिवेश में व्याप्त विभिन्न संकीर्णताओं की ओर इशारा करते हुए कहती है –
“मुझे शक है
कि तुम खुद को भी देख पाते हो या नहीं
लोग कहते हैं तुम जिंदा हो
पर मुझे विश्वास नहीं होता है
एक जिंदा आदमी
इतने संकीर्ण कुएं में
कैसे रह सकता है भला!”(पृ.52)
           ‘मां की बीमारी’ शीर्षक कविता में कवि ने बीमारी के दौरान हाल-चाल लेने पहुंचे रिश्तेदारों, आस-पड़ोस के लोगों द्वारा कही जाने वाली सकारात्मक एवं नकारात्मक बातों का बीमार मनुष्य के अन्तर्मन में पड़ने वाले व्यापक प्रभाव की गहन एवं यथार्थ पड़ताल की है। ‘कितना खतरनाक है’ हमारे समाज के मजदूर वर्ग की प्रतिनिधि कविता है।कवि की दृष्टि से मजदूर महिलाओं और उनके बच्चों की व्यथा छुप नहीं पायी है। इस कविता में कवि ने एक श्रमजीवी महिला एवं उसके छोटे बच्चे का जो चित्र खींचा है वह मार्मिक होने के साथ-साथ एक ऐसा सत्य भी है जिसको जीना मानो उनकी नियति हो –
“खेलते खेलते नींद में चला जाता है वह
 गिट्टियां तोड़ती मां
एक कपड़े का टुकड़ा डाल
सुला देती है उसे
 गिट्टियों के ही ऊपर
 पता नहीं कहां खो जाती है गिट्टियों की चुभन …….”(पृ.72)
        ‘भीमताल’ कविता में कवि ने प्रकृति के अनेक रंग और उन रंगों को लेकर  निखरती-संवरती प्रकृति मानव-मन को रोमांचित  ही नहीं करती अपितु एक सहचरी के रूप में कैसे हर पल साथ रहती है; उसका जीवंत चित्रण किया है –
“एक कैनवास सी फैली तू
 हर पल एक नया चित्र होता जिसमें
न जाने कौन था वो
पुराने को मिटा
नया बना जाता था जो
चुपचाप ।
सुबह जहां तैल रंगों से बना लैंडस्केप होता
शाम के आते-आते वहां
 बिजलियों के पेड़ उग आते
और चांदनी रात में
चांद दिख जाता
खुद को निहारते हुए तुझमें।”(पृ.74)                                                                                                                  ‘दीपावली’ कविता में कवि ने संसार में गहनता से विद्यमान उस अंधेरे की ओर संकेत किया है जिसे मोमबत्ती, दिए एवं चमचमाते बल्बों की रोशनी दूर नहीं कर सकती क्योंकि मानव ने  अपने मन के अंधेरों को दीप्त करना नहीं सीखा है अभी –
 ” देखता हूं
जहां जले हैं
सबसे अधिक दीये
मोमबत्तियां
विद्युत मालाएं और बल्ब
पाता हूं
वहीं छिपा है
सबसे अधिक अंधेरा।”(पृ.77)
         ‘किस मिट्टी के बने हैं पिताजी’ शीर्षक कविता में कवि ने श्रम के महत्व को प्रदर्शित करते हुए बताया है कि जिसने आजीवन श्रम किया है,श्रम ही जिसका जीवन रहा है उन्हें शहरों की भौतिक सुविधाएं बांध नहीं पाती हैं बल्कि उन्हें तो शहरों में घुटन महसूस होती है –
“शहर आते हैं हमारे पास
पल भर ठहरना जैसे मुश्किल होता है उनके लिए
 कहते हैं मेरा दम घुटने लगता है
 इन बहुमंजिली इमारतों के बीच
 आने से पहले ही
चल पड़ते हैं गांव की ओर”(पृ.80)
           ऊंचे-ऊंचे,हरे- भरे पहाड़ , गहरी घाटियां,झर-झर झरते झरने सबको आकर्षित तो करते हैं; लेकिन वहां रहकर  देखें तो वहां का जीवन बहुत कठिन होता है । पहाड़ों में बुनियादी जरूरतों का अभाव होने के कारण  वहां का जीवन बहुत दुर्दांत होता है; किसान की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी साल भर का अनाज नसीब नहीं हो पाता उन्हें। कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि , प्रकृति की मार से फसल बच भी जाय तो जंगली जानवरों की मार सब  बरबाद कर देती है। घास काटती औरतों का पैर तनिक भी फिसल जाय तो उन्हें काल का ग्रास बनने से कोई नहीं रोक सकता –
“एकदम सीधे खड़े पहाड़
देख रहे हो ना!
घास काटती हैं औरतें
तनिक असुंतलन बिगड़ने का मतलब
  नीचे गधेरा या उफनती नदी
 ऐसी घटनाएं
आम होती हैं यहां “(पृ.85) अंतिम पंक्तियों में गहरी व्यंजना छिपी  है जिसमें कवि हृदय पहाड़ों की सुंदरता को देखकर आकर्षित होते हुए सैलानियों का आह्वान करता है –
” दुख
अभाव
 संघर्ष
क्या क्या बताऊं
 सैलानी!
 समय हो अगर
 तुम्हारे पास
 तो ठहरो कुछ दिन
 देखो
पहाड़ को
 जीकर ।” (पृ.88)
           ‘डर, नफरत और लोकतंत्र के पहरुवे ‘ कविता में कवि ने सत्ता पर बैठे ढोंगी समाजवादियों और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल उड़ाने वालों, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों के ऊपर अपनी लेखनी चलाई है । सत्ता पक्ष के द्वारा की जाने वाली  घृणित राजनीति के असल चेहरे को उजागर किया है। सत्ता में बने रहने हेतु राजनेताओं द्वारा वैमनस्यता के बीज बोए जाते हैं और सद्भावना को उजागर होने ही नहीं दिया जाता उसका पर्दाफाश भी कवि ने बड़ी बेबाकी से किया है –
“सत्ताएं
 डरती रही हैं
 सत्य से
 अहिंसा से
और सबसे अधिक प्रेम से
 असत्य, हिंसा
 और सबसे अधिक नफरत
 सत्ता के मजबूत हथियार रहे हैं।”(पृ.90)
         कवि अपने परिवेश के प्रति सजग और सतर्क है जिस कारण  आसपास व्याप्त तनाव, अंतर्विरोधों , द्वंद्वों और विकृत विसंगतियों को ज्यादा सजकता और चौकन्नेपन के साथ कविताओं में अभिव्यक्ति मिली है ।’प्याज का खेत’ शीर्षक कविता में कवि ने प्याज के माध्यम से हाशिए के लोगों के प्रति चिंता व्यक्त की है-
“सदा रहा होगा काश्तकार का ध्यान
खेत के मुख्य भाग पर
नहीं पहुंच पाई होगी
पर्याप्त खाद और पानी……..
कितना सुंदर होता यह दृश्य
हाशिए पर खड़े पौधों ने भी
गर पाई होती
मुख्य भाग के पौधों सी कद-काठी।”(पृ.119)
         ‘अथ पंचेश्वर घाटी कथा’ कविता में उन्होंने नई बसासत को लेकर जहां कई सवाल उठाए हैं –
“बेलों की घंटी की रुनझुन…………
 पूछती है बस एक सवाल
तुम्हारे नए शहर में कहां होगा इनका स्थान
है क्या किसी डीपीआर में इसका जवाब ?”(पृ.102) वहीं भ्रमजाल फैलाती योजनाओं पर शक भी  है –
“जिन्होंने कभी पूरा नहीं किया
एक अदद सपना
 एक स्कूल का
एक अस्पताल का
एक सड़क का
 मांगती रह गई जनता
 वे आज गांव-गांव घूम रहे हैं
एक नए लोक का
सपना दिखाने
 डूब क्षेत्र के लोगों को।”(पृ.104)
          जिन्होंने जीवन भर लूटना-चूसना जाना वे आज देश के लिए आमजन को उनके कर्तव्यों के बारे में बता रहे हैं। आगामी बांध परियोजना के चलते डूबते क्षेत्रों की निशानदेही होने पर कवि हृदय पीड़ा से भर उठता है और एक गहरी व्यंजना के साथ व्यवस्था पर तंज़ कसता है। जो योजनाओं को साकार करने में लगे लोगों को भी निश्चित ही एक बार सोचने को विवश कर देती है –
“पेड़ों की निशान देही होने लगी है
 डूब क्षेत्र में खड़े पेड़
 पूछ रहे हैं एक-दूसरे से
अपनी जरुरत के लिए
 एक पेड़ काटना
कानूनी अपराध है
पर समूह के समूह नष्ट कर डालना
 राष्ट्र का विकास है
यह कैसा मजाक है?” (पृ.106 )
     कवि की दृष्टि से कोई भी क्षेत्र नहीं बच पाया है चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक;  सामाजिक हो या धार्मिक; सभी संदर्भों पर उनकी लेखनी चली है। वर्तमान में उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे जीवन पर पूर्णतः हावी है जिसके कारण मानव स्वकेंद्रित होते जा रहा है। हमारे सामाजिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं जो भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने जिस मुक्त बाजार की परिकल्पना को हमारी समक्ष  रखा है वह हमारे दैनिक जीवन का विशेष अंग बन चुका है । बाजार ने आदमी की नब्ज पकड़ ली है –
“सस्ते कम्बलों का रहस्य भले कुछ भी हो
यह कहना ही पड़ेगा
 कि आदमी की नब्ज पकड़ना तो बाजार ही जानता है”(पृ.122)
     व्याकरणिक दृष्टि से देखा जाय तो कहीं कहीं पर पदों, शब्दों के  क्रमों का सही एवं संयोजित न होना कविता की लयात्मकता को बाधित अवश्य करता  है लेकिन कविताओं का कथ्य इतना सशक्त  है कि वह बाधा भी दृष्टि से ओझल हो जाती है। कविताओं को उनके कथ्य के अनुरूप श्रेणीबद्ध
किया जाता तो भावप्रवणता में आसानी होती …….कवि से यह आशा है कि आने वाले संग्रहों में इस आंशिक कमी को पूरी कर कविता को और सशक्त करेंगे।
           निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि कुछ सामान्य और कुछ गहन व्यंजनाओं से आप्लावित कविताओं का यह संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है।कविताएं जहां परिवेश में व्याप्त विसंगतियों के यथार्थ को उजागर करती हैं वहीं विषम और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। इसकी बानगी ‘हरेपन को बचाना’ शीर्षक कविता में देखी जा सकती है; जिसमें कवि के अनुसार उम्मीद ही सबसे बड़ा सहारा है जिसे बचाए रखना जरूरी है-
“पेड़ अपनी पत्तियां खो देते हैं
फिर बहुत दिनों तक
 उदास-उदास रहते हैं
मगर उनके हरेपन को
अपने भीतर बचाए रखते हैं
और इस तरह
वे सूखने से बच जाते हैं।”(पृ.110)
   महेश चंद्र पुनेठा जी को इस संग्रह हेतु हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं। उनकी लेखनी का प्रकाश समकालीन कविता को यूं ही अपने उजास से भरता रहे।
– डॉ.ममता पंत
पुस्तक – अब पहुंची हो तुम
प्रकाशन- समय साक्ष्य, देहरादून
लेखक- महेश चंद्र पुनेठा
पृष्ठ- 123
मूल्य -125
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पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

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उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
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