
देहरादून, 27 फरवरी, 2026.
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से प्रोफे. (डॉ.) बी.के. जोशी की संस्मरणों पर केन्द्रित पुस्तक बार्लोगंज एंड बियॉन्ड
का लोकार्पण और बाद में उस पर चर्चा का आयोजन किया। गया.
केन्द्र के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में सुपरिचित अंग्रेजी साहित्य के कवि प्रो. अरविंद के मेहरोत्रा, वरिष्ठ लेखक एलन सीली तथा लेखिका मंजरी मेहता ने पुस्तक पर गहन बातचीत की. इस बातचीत का संचालन पत्रकार रंजोना बनर्जी ने किया.
प्रो. बी. के. जोशी की यह पुस्तक मसूरी के बार्लोगंज और आगे के कई खट्टे-मीठे अनुभवो किस्से प्रस्तुत करती है।
यह पुस्तक न केवल हिमालय के पाद प्रदेश से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में एक व्यक्तिगत यात्रा का वर्णन कराती है, अपितु यह विद्वता और सार्वजनिक जीवन के लिए समर्पित संस्थानों के साथ एक जीवनभर के गहन जुड़ाव को भी दर्शाती है।
देखा जाय तो प्रो जोशी की यह पुतन एक सुंदर पहाड़ी कस्बे मसूरी के बार्लोगंज से शुरू होकर, उनकी आत्मकथा, शिक्षा, बौद्धिक उत्सुकता, और संस्थान-निर्माण से आकारित एक यात्रा का सजल वर्णन करती है। यह कहानी हिमालय में बिताये बचपन से लेकर विश्वविद्यालय के जीवन, सार्वजनिक सेवा, और भारत और विदेशों में विभिन्न पदों पर काम करने की एक सतत कहानी जैसी है। यह पुस्तक महत्वाकांक्षा, असफलताओं, मित्रता, मार्गदर्शकों, और सीखने के केंद्रों के निर्माण और समर्थन के मद्दम, श्रमपरक काम को दर्शाती है।
सुपरिचित इतिहासकार पर्यावरण के जानकार रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक को “एक विद्वान-से-संस्थान-निर्माता की आकर्षक आत्मकथा” की संज्ञा प्रदान की है, जो “भौगोलिक और विषयगत रूप से एक विस्तृत दायरे में विस्तृत हुई है”, विशेष रूप से “हिमालय में एक आदर्श बचपन” और “एक अग्रणी पुस्तकालय-सह-शोध केंद्र” के निर्माण की कहानी को “प्रेम और अंतर्दृष्टि” के साथ सुनाने का उपक्रम करती है।
साफ और सधी हुई गद्य शैली में लिखी यह आत्मकथा न तो नॉस्टैल्जिया में डूबी है और न ही आत्म-प्रदर्शन में। इसके बजाय, यह एक स्थिर और स्पष्ट विवरण देती हुई प्रतीत होती है, कि कैसे व्यक्तिगत इतिहास भारत की स्वतंत्रता के बाद के बड़े संस्थागत और ऐतिहासिक बदलावों के साथ जुड़ते हैं।
खट्टे और मीठे उपशीर्षकों के तहत यह पुस्तक निजी और अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों का एक संग्रह है। प्रो. बी के जोशी का करियर शिक्षा, शोध, नीति निर्माण, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में फैला हुआ है। कई दशकों में, उन्होंने भारत और विदेशों में शिक्षा और शोध पहल में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस आत्मकथा में, वह उन व्यक्तियों और संस्थानों पर विचार करते हैं जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया, और बौद्धिक समुदायों के निर्माण की जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते हैं।
कार्यक्रम का सफल संचालन निकोलस हॉफलैण्ड ने किया कार्यक्रम के प्रारम्भ में टेथिस बुक्स की ओर से नीता गुप्ता और दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से चंद्रशेखर तिवारी ने स्वागत किया. नीता गुप्ता ने कहा कि अपने शैक्षिक संस्थानों और साहित्यिक व संस्कृति के लिए प्रसिद्ध इस शहर में, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में बार्लोगंज एण्ड बियाण्ड का लोकार्पण आत्मकथ्य के केंद्रीय विषय को सहज रूप से उजागर करती है।
चर्चा के दौरान एलन सीली और प्रो. मेहरोत्रा ने पुस्तक के कुछ अंशों का वाचन भी किया.
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के मार्गदर्शक मण्डल के वरिष्ठ जनों, स्टॉफ सदस्यों, बाल अनुभाग के पाठकों, आम पाठक सदस्यों तथा बातचीत में शामिल चर्चाकारों ने प्रो. जोशी को बधाई देते हुए उनका स्वागत किया. केन्द्र के निदेशक एन. रवि शंकर, पूर्व प्रमुख सचिव श्रीमती विभा पुरी दास, केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष,श्री जेबी गोयल व डॉ. डी. के. पाण्डे ने भी प्रो.जोशी का स्वागत किया. पुस्तक के औपचारिक लोकापर्ण कार्यक्रम / चर्चा के बाद सभागार में उपस्थित श्रोताओं ने सवाल-जबाब भी किये.
कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्य सचिव इन्दु कुमार पाण्डे, एन एस. नपलच्याल, डॉ. इन्दु सिंह, बीनू जोशी, मालविका चौहान, नादिर बिलमोरिया, डॉ. डी.एन. भटकोटी, बिजू नेगी, रानू बिष्ट,हरि राज सिंह, डॉ. सुधारानी पाण्डे, डॉ. योगेश धस्माना, डॉ. सुभाष थलेड़ी, अरविन्दर सिंह, कल्याण बुटोला, राजीव नागिया, पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह, योगिता थपलियाल, सुमन भारद्वाज, मीनाक्षी कुकरेती, गीताजंलि भट्ट, मधु डंगवाल, शंकुतला दरियाल,मेघा, मधन सिंह, गामा चंद, पंकज शर्मा, स्वीटी जुयाल, प्रियंका, रेणुका, राकेश कुमार,अवतार सिंह, विजय बहादुर साहित पुस्तकालय के युवा पाठक तथा अन्य साहित्यकार, साहित्यप्रेमी, व अन्य प्रबुद्ध लोग उपस्थित रहे.












