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रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर

07/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
‘गुरुदेव’ के नाम से विख्यात कवि लेखक संगीतकार एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी तथा राष्ट्रगान जन गण मन के रचयिता और भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने साहित्य, शिक्षा, संगीत, कला, रंगमंच और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी बहुमुखी प्रतिभा से वह स्थान प्राप्त किया है जो विरले ही प्राप्त कर पाते हैं । अपने मानवतावादी दृष्टिकोण के चलते रविंद्र बाबू को विश्वकवि का दर्जा दिया गया है ।  टैगोर सही मायनों में भारत से पहले विश्वकवि हैं । उनके काव्य के मानवतावाद ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। दुनिया की अनेक भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हुआ । टैगोर की रचनाएं बांग्ला साहित्य में एक नई शैली एवं चिंतन लेकर आई।7 मई 1861 को कोलकाता में जन्मे, माता पिता की तेरहवीं संतान  रवींद्रनाथ टैगोर ने बचपन में ही ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए आठ वर्ष की उम्र  में पहली कविता लिखकर अपने कवि हृदय होने का परिचय दिया तो  मात्र 16 वर्ष की उम्र में उनकी पहली प्रथम रचना एक लघु कथा के रूप में प्रकाशित हुई । एक दर्जन से अधिक उपन्यासों में चोखेर बाली, घरे बाहिरे, गोरा आदि शामिल हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यासों में मध्यमवर्गीय समाज  का बहुत नज़दीकी से यथार्थपरक चित्रण किया गया है। टैगोर का कथा साहित्य  क्लासिक साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान रखता है। समीक्षकों के अनुसार उनकी कृति ‘गोरा’ एक अद्भुत रचना है और आज भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। रवींद्रनाथ टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा कविताओं एवं संगीत में सबसे ज्यादा मुखरित हुई । उनकी कविताओं में नदी और बादल की अठखेलियों से लेकर अध्यात्म तक के विभिन्न विषयों को बखूबी उकेरा गया है तो उपनिषद जैसी भावनाएं भी  अभिव्यक्त हुई हैं। साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक विधाओं में प्रमुख रूप से रचना की। टैगोर की कई कृतियों के अंग्रेजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। उनके नाटक मुख्यतया सांकेतिक हैं ,डाकघर, राजा, विसर्जन आदि इसके प्रमाण हैं। भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ तथा बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ रविंद्र नाथ टैगोर की ही कलम से निकले हैं। रवींद्र ने दो हजार से अधिक गीतों की रचना की। उनका रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। टैगोर की  प्रमुख  रचनाओं में गीतांजलि, गोरा एवं घरे बाईरे प्रमुख हैं । ‘गुरुदेव’ की कविताओं  में  एक अनूठी लय है। वर्ष 1877 में उनकी रचना ‘भिखारिन’ खासी चर्चित रही। उन्हें बंगाल का सांस्कृतिक उपदेशक भी कहा जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता शारदा देवी थीं। उनकी आरम्भिक शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया किन्तु 1880 में बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश लौट आए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। टैगोर परिवार बंगाल पुनर्जागरण के समय अग्रणी था। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया; बंगाली और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत एवं रंगमंच और पटकथाएं वहां नियमित रूप से प्रदर्शित हुईं थीं। टैगोर के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे एवं दूसरे भाई सत्येंद्रनाथ कुलीन और पूर्व में सभी यूरोपीय सिविल सेवा के लिए पहले भारतीय नियुक्त व्यक्ति थे। एक भाई ज्योतिरिंद्रनाथ, संगीतकार और नाटककार थे एवं इनकी बहिन स्वर्णकुमारी उपन्यासकार थीं। टैगोर ने लगभग 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रूवपद शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं।गुरुदेव टैगोर की कविताओं में हमें अस्तित्व के असीम सौन्दर्य, प्रकृति और भक्ति के दर्शन होते हैं। उनकी बहुत-सी कविताएं प्रकृति के सौन्दर्य से जुड़ी हैं। गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लान्ति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। टैगोर और महात्मा गाँधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। एक समय था जब शान्ति निकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे, उस समय गांधीजी ने टैगोर को एक बड़ी राशि का अनुदान का चेक दिया था।टैगोर के कई गीतों और कहानियों ने मानव चेतना को बदलने और कार्य करने के लिए साहस और प्रतिबद्धता को प्रेरित किया। उन्होंने कला का अभ्यास कला के लिए नहीं किया, न ही आत्म-अभिव्यक्ति के तरीके के रूप में और कम से कम मनोरंजन के लिए तो कत्तई नहीं किया, बल्कि उनकी कला भी नये मानव एवं नये विश्व की संरचना से प्रेरित थी। उनकी कला जीवन के गहरे अर्थ को स्पष्ट करने और आत्मा को ठीक करने की पेशकश थी। अपने शिल्प के उस्ताद के रूप में, टैगोर ने कविता की शुद्धता को जीने के उद्देश्य के साथ जोड़ा। उन्होंने न केवल अपने जीवन में मृत्यु, अवसाद और निराशा के कारण अनुभव किए गए दुख और पीड़ा को ठीक किया, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के भीतर अन्याय और असमानता के घावों को भरने के लिए भी काम किया। उन्होंने उन्नत कृषि, अच्छे स्कूलों, आरामदायक आर्थिक स्थितियों और बेहतर जीवन स्तर के माध्यम से मानव समुदायों के बाहरी विकास के लिए काम किया, लेकिन साथ ही उन्होंने आत्मा के नवीनीकरण, आत्मा की देखभाल, हृदय को पोषण और कल्पना को पोषित करने के माध्यम से आंतरिक विकास पर जोर दिया। वे एक ऐसे पुरुषार्थी पुरुष का महापुरुष के रूप में जाना पहचाना नाम है, जिन्होंने हर इंसान के महान् बनने का सपना संजोया और उसके लिये उनके हाथ में सुनहरे सपनों को साकार होने की जीवनशैली भी सौंपी।टैगोर गहन आध्यात्मिक एवं साधक पुरुष थे, उन्होंने अध्यात्म के गहन रहस्यों को उद्घाटित किया। उनके अनुसार मौन की भाषा शब्दों की भाषा से किसी भी रूप में कमजोर नहीं होती, बस उसे समझने वाला चाहिए। जिस प्रकार शब्दों की भाषा का शास्त्र होता है, उसी प्रकार मौन का भी भाषा विज्ञान होता है। मौन को समझा तो जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता। संभवतः इसीलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि मौन अनंत की भाषा है। टैगोर अध्यात्म एवं विज्ञान के समन्वयक थे। टैगोर ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और भौतिक कल्याण के साथ आध्यात्मिक विकास की आवश्यकता व्यक्त की। एक के बिना दूसरा एक पैर पर चलने जैसा है। वे आध्यात्मिक-वैज्ञानिक व्यक्तित्व निर्माण के प्रेरक थे। इस संतुलित और समग्र विश्वदृष्टि की अब पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, क्योंकि यह हमारे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी और लचीले भविष्य के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता एवं शर्त है। शुद्ध तर्क और शुद्ध भौतिकवाद उतने ही विनाशकारी हैं, जितने कि विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत मोक्ष की खोज। टैगोर ने विज्ञान और तर्क के माध्यम से सत्य की खोज करते हुए शब्दों और कर्मों में शाश्वत ज्ञान और कालातीत मूल्यों को व्यक्त किया। टैगोर का विश्वदृष्टि तर्क और धर्म, आत्मा और पदार्थ की एकता को देखना और उन्हें एक साथ नृत्य करने देना है। यह एक बड़ी दृष्टि है जहाँ विज्ञान आध्यात्मिकता का पूरक है, कला पारिस्थितिकी का पूरक है और स्वतंत्रता समानता का पूरकहै। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने हमें नस्ल, रंग, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा और राष्ट्र की अपनी क्षुद्र पहचान से ऊपर उठने और अपनी सामान्य मानवता के साथ पहचान बनाने का आग्रह किया। उन्होंने मानवता की एकता और स्वतंत्रता, न्याय और शांति के सर्वोपरि महत्व की घोषणा करते हुए अमेरिका से रूस, चीन से अर्जेंटीना तक समूचे विश्व की अथक यात्रा की। उन्होंने अपने लाखों देशवासियों को अपने संकीर्ण स्वार्थ को त्यागने और राष्ट्रीयता, समानता, एकजुटता और नैतिकता को अपनाने के लिए अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आत्म-भोग को त्याग दिया और सामाजिक विभाजन को दूर करने के लिए अथक प्रयास किया। विशेष रूप से उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के बीच की खाई को भरने की कोशिश की। रबीन्द्रनाथ टैगोर प्रेरणाएं इतनी विविधमुखी थी कि उनसे जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा। चाहे वह आपसी संबंध हो, सामाजिक संबंध हो, आर्थिक संबंध हो या राजनीतिक संबंध हो- हर तरह के जीवन को उन्होंने प्रेरक बनाने का उपक्रम किया। वे कभी घटना से, कभी शब्दों से, कभी क्रिया से, कभी पत्रों से, तो कभी किसी उदाहरण या संस्मरण से व्यक्ति की चेतना को झकझोर कर आदर्श और ज्ञान के प्रति अनुराग और जोश जगाते थे। वे इस कला में निष्णात थे कि कब किसको किन शब्दों में उचित प्रेरणा दी जाए। रवीन्द्रनाथ टैगोर के पुरुषार्थी जीवन की एक पहचान थी गत्यात्मकता। वे अपने जीवन में कभी कहीं रुके नहीं, झुके नहीं। प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने अपने लक्ष्य का चिराग सुरक्षित रखा। इसलिए उनकी हर सांस अपने दायित्वों और कर्तव्यों पर चौकसी रखती थी। खून पसीना बनकर बहता था। रातें जागती थी। दिन संवरते थे। प्रयत्न पुरुषार्थ बनते थे और संकल्प साधना में ढलते थे। यही कारण है कि आज उनके प्रयत्नों से न केवल भारतीय समाज बल्कि विश्व मानवता का जीवन प्रेरक बना है, सार्थक बना है और वे सभी उस महामानव को दिल से याद करते हैं।भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांङ्ला’ के रचयिता एवं भारतीय साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्म जयंती हर साल 7 मई को मनाई जाती है। वे एक महान एवं विश्वविख्यात कवि, लेखक, साहित्यकार, दार्शनिक, समाज सुधारक और चित्रकार थे। उन्हें बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा, युगस्रष्टा एवं युग-निर्माता माना जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी अनूठी, हृदयस्पर्शी एवं आध्यात्मिक रचनाओं के लिए लोग गुरुदेव कहकर पुकारते हैं। उनका जन्मदिन केवल जन्म का जश्न मनाने के लिए नहीं है, बल्कि उनके विचारों और मूल्यों को याद करने और उनके सद्भाव, संपूर्णता और अखंडता के आदर्शों और आकांक्षाओं के अमूल्य योगदान का सम्मान करने का भी एक अवसर है। टैगोर एक ऐसे दिव्य एवं अलौकिक व्यक्ति एवं समाजक्रांति के प्रेरक थे, रोशनी जिनके साथ चलती थी। इंग्लैंड में अपनी औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद टैगोर को अपनी बंगाली जड़ों से गहरा जुड़ाव था। टैगोर सिर्फ कलात्मक गद्य और कविता में ही माहिर नहीं थे, बल्कि उनके लेखन में व्यापक राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियां भी शामिल होती थीं, जो तत्कालीन ब्रिटिश शासन पर करारा चोट करती थी। उनकी कविताओं का संग्रह गीतांजलि ने बंगाली साहित्य को समृद्ध बनाने का काम किया। ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई होने के साथ-साथ रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य में अपने अनुकरणीय योगदान के लिए यह पुरस्कार पाने वाले पहले गैर-यूरोपीय भी थे। 2004 में शांतिनिकेतन में हुई चोरी में टैगोर का नोबेल पुरस्कार पदक चोरी हो गया था। जिसके बाद स्वीडिश अकादमी ने उन्हें दो प्रतिकृतियों, एक स्वर्ण और एक रजत, के रूप में फिर से पुरस्कार दिया। ब्रिटिश सरकार ने 1915 में उन्हें नाइट की उपाधि दी। हालांकि, बाद में उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में इसे त्याग दिया था। उस दौर में जिस शख्स के पास नाइट हुड की उपाधि होती थी, उसके नाम के साथ सर लगाया जाता था लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला हत्याकांड की निंदा करते हुए अंग्रेजों को ये सम्मान वापस लौटा दिया था।टैगोर ने दो देशों के राष्ट्रगान लिखे थे। जिसमें भारत के लिए “जन गण मन” और बांग्लादेश के लिए “आमार सोनार बांग्ला” शामिल है। इसके अलावा, कई लोग इस तथ्य को नहीं जानते हैं कि उन्होंने श्रीलंका के “श्रीलंका मठ” राष्ट्रगान के लिए प्रेरणा के रूप में कार्य किया। श्रीलंकाई संगीतकार आनंद समरकोन बंगाली कवि रवींद्रनाथ टैगोर से प्रभावित होकर राष्ट्रीय गान ‘श्रीलंका मठ’ के संगीत और गीत लिखे थे।रवींद्रनाथ टैगोर ने 1921 में ‘शांति निकेतन’ की नींव रखी थी। जिसे आज सेंट्रल यूनिवर्सिटी ‘विश्व भारती’ के नाम से जाना जाता है। टैगोर विश्वभ्रमण करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने पांच महाद्वीपों के 30 से अधिक देशों की यात्रा की थी। उन्होंने उस समय की जानी मानी हस्तियों में शामिल अल्बर्ट आइंस्टीन, रोमेन रोलांड, रॉबर्ट फ्रॉस्ट, जीबी शॉ, थॉमस मान समेत कई लोगों से मुलाकात की और वैश्विक परिपेक्ष्य में विचार विनिमय किया। इसके साथ रवींद्रनाथ टैगोर का राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ बहुत ही अनोखा रिश्ता था। नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर का घर शांति निकेतन अब विश्व विरासत बन गया है। रविवार को यूनेस्को ने घोषणा की कि शांति निकेतन को विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है। टैगोर का घर शांति निकेतन पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित है। इस सांस्कृतिक स्थल को यूनेस्को का टैग दिलाने के लिए लंबे समय से संघर्ष चल रहा था।कवि और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर ने 1863 में बीरभूम जिले में शांति निकेतन की स्थापना की थी। यह कोलकाता से 100 किमी की दूरी पर उत्तर की ओर स्थित है। हालांकि बाद में जब रवींद्र नाथ टैगोर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की तो यह शहर मशहूर हो गया। शांति निकेतन भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में गहरी जड़ें रखने वाला एक अद्वितीय संस्थान है। शुरुआत में यह एक आवासीय विद्यालय था। टैगोर ने यहीं रहकर अपनी कालजयी रचनाएं गढ़ी हैं। शुरुआत में शांति निकेतन सात एकड़ भूमि में फैला था। अब इसका विस्तार हो चुका है। रवींद्रनाथ ने 1901 में सिर्फ पांच बच्चों को लेकर विश्व भारती स्कूल खोला था। पांच बच्चों में उनका बेटा भी था। 1921 में विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। इस समय यहां 6 हजार से अधिक बच्चे पढ़ते हैं।यूनेस्को का पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन है। इसका गठन 16 नवंबर 1945 को हुआ था। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक खजानों के संरक्षण के लिए समर्पित है। इस समय यूनेस्को के 195 सदस्य और 8 सहयोगी सदस्य देश हैं। इसका मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में है। जयंती पर उन्हें शत-शत नमन। भारतीय साहित्य की अप्रतीम अनमोल मणियों में रवीन्द्रनाथ एक बहुमूल्य मणि थे. ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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